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4 thoughts on “संस्मरण: गाँव की रामलीला

  1. वाह… बहुत ही शानदार व्यंग्य 👏👏👏👏👌👌

  2. प्रस्तुत लेख में गांव की रामलीला का वर्णन किया गया है। गांव में खेली जाने वाली रामलीला शहरों की रामलीला से भिन्न होती है। शहरों में रामलीला बहुत ही व्यवस्थित और अनुशासित होती है। वह आम जीवन से कटी होती है। इसके विपरीत गांव की रामलीला में पूरे गांव का चरित्र उभरकर आता है। इसीलिए हम पाते हैं कि किसी के निजी जीवन की समस्या मंच से संबोधित होने लगती है तो आवारा फिर रही गायों का प्रसंग भी आ जाता है। यही नहीं गांव सुलभ भोलापन भी दर्शकों के आपसी संवाद में देखने को मिलता है। गांव में रामलीला के कलाकारों से अपेक्षाएं भी अलग क़िस्म की होती हैं और वे उनके अनुसार रामलीला का मंचन चाहते हैं भले ही वह उसका हो या न हो। कुल मिलाकर ग्रामीण रामलीला में ग्रामीण जीवन के रंग और छटाएं देखने को मिलती हैं।

      1. कहानी बहुत बढ़िया लगी।
        मैं तो कुछ देर तक उसी गाँव के मेला में अपने आप को खो दी थी। कहानी काफ़ी रोचक थी। आभार आदरणीया इस तरह की रचना के लिए… !

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