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January 11, 2026

1 thought on “रविवारीय: औरत का चरित्र और मर्द का भाग्य…

  1. श्री वर्मा जी ने एक पुरानी कहावत “त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम; देवो न जानाति कुतो मनुष्यः” की व्याख्या के साथ आज के सामाजिक तनाव को बहुत सटीक ढंग से उजागर किया है। डिजिटल युग में रिश्तों के बदलते आयाम, अपराध वाले हालिया मामलों की पड़ताल और रसातल में जा रहे रिश्तों की मर्यादा पर लेखक की चिंताएँ बिल्कुल सामयिक हैं। विशेष रूप से यह बात प्रेरक लगी कि समाधान केवल कानून या तकनीक में नहीं, बल्कि संवाद, आत्म-संयम और पारिवारिक मूल्यों के पुनर्संस्कार में है। यह ब्लॉग सोचने पर मजबूर करता है कि अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी बराबर अहमियत दी जाए—यही संतुलन भविष्य में रिश्तों के साथ ही सामाजिक सेहत का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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