पेड़ों का विनाश: सभ्यता का अंतिम संदेश?
हमारी सभ्यता और संस्कृति के आधार कहे जाने वाले पेड़ आज संकट में हैं, जैसे कोई अनमोल विरासत लुट रही हो। हमारे यहां पेड़ों की पूजा होती है और पर्यावरण, जलवायु और संपूर्ण पारिस्थितिकीय तंत्र को संतुलित करने में वैसे तो इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, मानो ये धरती के प्राण हों। जीवन के लिए प्राण वायु प्रदान करने में इनके महत्व को समूची दुनिया ने न केवल माना है बल्कि कोरोना काल में इनकी उपादेयता को स्वीकार भी किया है, जब हर सांस की कीमत समझ आई। लेकिन खेद है कि यह सब जानते-समझते हुये भी हम इनके अस्तित्व को ही मिटाने पर तुले हुये हैं, जैसे अपनी ही जड़ें काट रहे हों।
दुनिया भर में विकास के नाम पर पेड़ों का हो रहा अंधाधुंध कटान इस बात का जीता-जागता सबूत है, जो हर पल हमारी लापरवाही की कहानी चीखता है। इसके अलावा जो सबसे बड़ी समस्या है, वह यह कि आपदायें पेड़ों की सबसे बड़ी दुश्मन बन कर सामने आ रही हैं, मानो प्रकृति स्वयं क्रोधित हो। बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ की दिनोंदिन बढ़ती घटनायें तो पेड़ों के विनाश में अहम भूमिका निबाहती हैं हीं, इसके चलते हर साल लाखों-करोड़ों पेड़ों का इनकी विनाश लीला की चपेट में आकर अस्तित्व ही मिट जाता है, जैसे कोई अनमोल धरोहर हमेशा के लिए खो जाए।
आसमान से आफत बनकर गिरने वाली बिजली भी हर साल 32 करोड़ पेड़ों को भस्म कर रही है, जैसे प्रकृति का प्रकोप हमारी अनदेखी का दंड हो। इसका खुलासा म्यूनिख की टैक्निकल यूनिवर्सिटी के अध्ययन में हुआ है, जो हमें ललकारता है। इस अध्ययन की रिपोर्ट बीते दिनों ग्लोबल चेंज बायोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है जिसमें कहा गया है कि हर साल बिजली गिरने से जितने पेड़ मरते हैं, वो संख्या दुनिया भर के कुल पेड़ों के नुकसान का 2.9 फीसदी है, जो एक भयावह चेतावनी है। ये पेड़ जब जलते हैं तो ये 1.09 अरब टन कार्बन आक्साइड छोड़ते हैं जिससे वातावरण को काफी नुकसान पहुंचता है, जैसे हमारी धरती की सांसें और घुट रही हों।
अध्ययन के अनुसार हर साल 28.6 से 32.8 करोड़ बार बिजली जमीन पर गिरती है और इससे 30 से 34 करोड़ से ज्यादा पेड़ मर जाते हैं, जैसे प्रकृति का हर प्रहार हमारी गलतियों का हिसाब मांगता हो। एक बार बिजली की चपेट में आकर औसतन 3.5 पेड़ों की मौत हो जाती है, क्योंकि बिजली एक पेड़ से दूसरे पेड़ों तक फैल जाती है, मानो मृत्यु का यह नृत्य रुकने का नाम न ले। बिजली गिरने से अक्सर बड़े पेड़ों को काफी नुकसान होता है, जो धरती के प्रहरी हैं। वे काफी तादाद में मर जाते हैं, जैसे हमारी सभ्यता के आधार डगमगा रहे हों।
हर साल 2.4 से 3.6 करोड़ बड़े पेड़ इसकी चपेट में आते हैं जो अमूमन 60 सेंटीमीटर से ज्यादा मोटे तने वाले होते हैं, जिनका एक-एक पेड़ सैकड़ों वर्षों की कहानी समेटे होता है। ये बड़े पेड़ ज्यादातर खुले मैदानों और पहाड़ी इलाकों में होते हैं, जहां वे प्रकृति की मार के सबसे आसान शिकार बन जाते हैं। चूंकि खेतों, जंगलों, पहाड़ और तटीय इलाकों में बिजली ज्यादा गिरती है, इसलिए बिजली की चपेट में ये ज्यादा आ जाते हैं, जैसे कोई नियति इनका पीछा कर रही हो। ऐसी स्थिति में पेड़ों के अंदर का पानी तेजी से गर्म होकर भाप बनने लग जाता है और जब भाप फैलने लगती है तब पेड़ों के तनों में आग लगने लगती है, जैसे प्रकृति का क्रोध लपटों में प्रकट हो।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से अब बिजली गिरने की घटनायें उत्तरी और ठंडी जगहों पर ज्यादातर होगीं, जैसे प्रकृति का प्रकोप अब नए क्षेत्रों को निशाना बनाएगा। नतीजतन आने वाले दिनों में बड़े पेड़ों की मौत का आंकड़ा 9 से बढ़ कर 18 फीसदी तक हो सकता है, जो एक भयंकर भविष्य की ओर इशारा करता है। देखा जाये तो भारत में पूर्वोत्तर के इलाके, मध्य भारत और तटीय इलाकों में बिजली गिरने की घटनायें आम हैं, जो हमारे जंगलों को निगल रही हैं। फॉरेस्ट सर्वे आफ इंडिया की मानें तो देश में कुल वन क्षेत्र लगभग आठ लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है, पर यह आंकड़ा तेजी से सिकुड़ रहा है।
हमारे देश ने साल 2000 से 2020 के बीच पेड़ों की कटाई और आग की वजह से तकरीबन 1.98 हैक्टेयर जंगल खोया है, जैसे हमने अपनी धरोहर को स्वयं नष्ट कर दिया। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों की तादाद कम होती जा रही है, उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है, जो हमारी नींव को हिला रहा है। जहां तक जंगलों के खत्म होने का सवाल है, उसकी गति देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे, जैसे हमारी सभ्यता का इतिहास मिट्टी में मिल जाएगा।
हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं, और संयुक्त राष्ट्र भी इसकी पुष्टि करता है, जो हमें ललकारता है। अपने देश में तो विकास यज्ञ में समिधा बने लाखों पेड़ों को छोड़ भी दें तो भी उसके अलावा बीते पांच सालों में देश में नीम, जामुन, शीशम, महुआ, पीपल, बरगद और पाकड़ सहित करीब पांच लाख से भी ज्यादा छायादार पेडो़ं का अस्तित्व ही खत्म कर दिया गया है, जैसे हमने अपनी संस्कृति को ही उखाड़ फेंका। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसका खुलासा किया है, जो हमें आइना दिखाता है।
दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है, जैसे हम स्वयं अपने विनाश के बीज बो रहे हों। जबकि जैव विविधता का संरक्षण ही हमें बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जैसे यह हमारी अंतिम रक्षा रेखा हो। इसीलिए जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि यह हमारी सभ्यता का आधार है। सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों का होना हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बेहद जरूरी है, जैसे सांसों के बिना जीवन की कल्पना असंभव है।
यह न केवल हमें गर्मी से राहत प्रदान करते हैं बल्कि जैव विविधता को बनाये रखने, कृषि की स्थिरता सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और जलवायु को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम योगदान देते हैं, जैसे ये धरती के संरक्षक हों। विडम्बना यह है कि यह सब जानते समझते हुए भी हम पेड़ों के दुश्मन क्यों बने हुए हैं, यह समझ से परे है, जैसे हम अपनी ही मृत्यु को गले लगा रहे हों। इसके बारे में बीते कई बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और वनस्पति व जीव विज्ञानी चेता रहे हैं कि अब हमारे पास पुरानी परिस्थिति को वापस लाने के लिए समय बहुत ही कम बचा है, जैसे घड़ी की सुइयां हमारा इम्तिहान ले रही हों।
यह भी कि हम जहां पहुंच चुके हैं वहां से वापस आना आसान नहीं, बहुत ही टेडा़ काम है, जैसे हम अनंत खाई के किनारे खड़े हों। कारण वहां से हमारी वापसी की उम्मीद केवल और केवल पांच फीसदी से भी कम ही बची है, जो हमें चेताने के लिए काफी है। दुनिया के स्तर पर जैव विविधता की बात करें तो अमरीका की ए एण्ड एम यूनिवर्सिटी स्कूल आफ पब्लिक हैल्थ के एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पेड़-पौधों की मौजूदगी लोगों को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने में सहायक होती है, जैसे हरियाली हमारी आत्मा को सुकून देती हो।
6.13 करोड़ मानसिक रोगियों पर किये गये अध्ययन में कहा गया है कि हरियाली के बीच रहने वाले लोगों में अवसाद की आशंका बहुत कम पायी गयी है, जैसे प्रकृति हमें जीवन का उपहार देती हो। जिन लोगों के घरों के आसपास 100 मीटर के दायरे में पेड़-पौधों की संख्या अधिकाधिक पायी गयी, उन लोगों को अवसाद की दवा लेने की जरूरत ही नहीं रही है, जैसे पेड़ हमारी चिकित्सा हों। इस बारे में मानसिक स्वास्थ्य की जानी मानी प्रोफेसर एंड्रिया मेचली का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हम वैश्विक स्तर पर जैव विविधता में तेजी से गिरावट को देख रहे हैं, जो हमें भयभीत करता है।
जैव विविधता न सिर्फ हमारे प्राकृतिक वातावरण के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इन वातावरण में रहने वाले लोगों के मानसिक कल्याण के लिए भी उतनी ही अहम है, जैसे यह हमारी सभ्यता का प्राण है। क्योंकि जैव विविधता धरती और मानव स्वास्थ्य के लिए सह-लाभ के तत्व हैं और इसे महत्वपूर्ण बुनियादी मान कर इसकी रक्षा करनी चाहिए, जैसे यह हमारा अंतिम कर्तव्य हो। पर्यावरण विज्ञानी बर्नार्डों फ्लोर्स की मानें तो एक बार यदि हम खतरे के दायरे में पहुंच गये तो हमारे पास करने को कुछ नहीं रहेगा, जैसे हम स्वयं को विनाश के हवाले कर चुके हों।
हम यह क्यों नहीं समझते कि यदि अब भी हम नहीं चेते तो हमारा यह मौन हमें कहां ले जायेगा और क्या मानव सभ्यता बची रह पायेगी? चिंता की असली वजह तो यही है, जो हमें आज नींद से जगाने को काफी है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।

