लॉर्ड मैकाले के मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन की 191वीं वर्षगाँठ पर विशेष
– विवेकानंद सिंह*
1835 का शिक्षा निर्णय: भारत पर उसका प्रभाव
पिछले कई वर्षों से सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर एक दावा बार-बार दोहराया जाता रहा है कि लॉर्ड मैकाले ने 2 फ़रवरी 1835 को लंदन स्थित ब्रिटिश संसद में दिए गए अपने भाषण में भारत की महानता स्वीकार करते हुए उसकी प्राचीन शिक्षा प्रणाली को बदलकर उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समूल नष्ट करने की योजना प्रस्तुत की थी। इस कथन के साथ यह भी जोड़ा जाता है कि यह भाषण ब्रिटिश संसद में दिया गया था।
हालाँकि ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच करने पर यह दावा असंगत सिद्ध होता है। हंसार्ड्स के अभिलेखों के अनुसार 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद के दोनों सदन—हाउस ऑफ़ कॉमन्स और हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स—बंद थे। वास्तविकता यह है कि लॉर्ड मैकाले ने यह वक्तव्य लंदन में नहीं, बल्कि कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) स्थित गवर्नर्स हाउस में इंडियन काउंसिल की बैठक के दौरान प्रस्तुत किया था।
लॉर्ड मैकाले, जिनका पूरा नाम थॉमस बैबिंगटन मैकाले था और जो फ़र्स्ट बैरन मैकाले, पीसी, एफआरएस तथा एफआरएसई थे, 1834 में भारत आए और 1838 तक यहीं रहे। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त भारत के पहले ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम हेनरी कैवेंडिश-बेंटिंक की काउंसिल के लॉ मेंबर थे तथा कमिटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन यानी तत्कालीन लोक शिक्षा समिति के अध्यक्ष भी थे। 2 फ़रवरी 1835 को इसी परिषद की बैठक में उन्होंने अपना प्रसिद्ध “मिनट्स ऑन इंडियन एजुकेशन” प्रस्तुत किया।
शिक्षा ब्यूरो द्वारा उपलब्ध तथा एच. शार्प के संपादन में 1920 में कलकत्ता से प्रकाशित पुस्तक शैक्षिक अभिलेखों से चयनित अंश, वॉल्यूम-I (1781–1839) में मैकाले के इस कार्यवृत्त का विवरण मिलता है। इसमें मैकाले ने कहा कि लोक शिक्षा समिति के कुछ सदस्य मानते हैं कि अब तक अपनाई गई कार्यप्रणाली 1813 के संसद अधिनियम से बँधी हुई है और यदि उसमें परिवर्तन करना हो तो विधायी अधिनियम आवश्यक होगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि एक लाख रुपये की राशि “साहित्य के पुनरुद्धार और संवर्धन, भारत के विद्वान मूल निवासियों के प्रोत्साहन तथा ब्रिटिश क्षेत्रों के निवासियों के बीच विज्ञान के ज्ञान के प्रसार” के लिए निर्धारित की गई थी। उनके अनुसार यही शब्द उन सभी परिवर्तनों को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त थे जिनका वे समर्थन कर रहे थे।
मैकाले ने प्रश्न उठाया कि सरकार के पास जो निधि है, उसका सबसे उपयोगी उपयोग क्या होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष इस बात पर सहमत प्रतीत होते हैं कि भारत की स्थानीय बोलियों में न तो पर्याप्त साहित्यिक ज्ञान है और न वैज्ञानिक ज्ञान, और वे इतनी अपरिष्कृत हैं कि उनमें किसी महत्वपूर्ण कृति का अनुवाद सरल नहीं है। उनका तर्क था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम वर्गों का बौद्धिक विकास उनकी मातृभाषा के माध्यम से संभव नहीं है और इसके लिए किसी अन्य भाषा की आवश्यकता है।
इसके बाद उन्होंने पूछा कि वह भाषा कौन-सी होनी चाहिए। समिति के आधे सदस्य अंग्रेज़ी के पक्ष में थे, जबकि शेष आधे अरबी और संस्कृत का समर्थन कर रहे थे। मैकाले के अनुसार असली प्रश्न यह था कि कौन-सी भाषा जानना सबसे अधिक लाभदायक है।
उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें संस्कृत और अरबी का ज्ञान नहीं है, किंतु उन्होंने उनके महत्व का मूल्यांकन करने का प्रयास किया। उन्होंने अरबी और संस्कृत की प्रसिद्ध रचनाओं के अनुवाद पढ़े और प्राच्य विद्वानों से संवाद किया। उनके अनुसार किसी भी प्राच्यविद् ने यह नहीं कहा कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी भारत और अरब के संपूर्ण साहित्य के बराबर है।
मैकाले का तर्क था कि जब भारत के लोगों को एक विदेशी भाषा सिखानी ही है, तो वह अंग्रेज़ी होनी चाहिए, क्योंकि यह शासक वर्ग की भाषा है और सरकार के उच्च पदों पर कार्यरत भारतीयों द्वारा भी बोली जाती है। उन्होंने प्रश्न किया कि जब सरकार के पास सही दर्शन और सच्चे इतिहास को संरक्षित करने की शक्ति है, तो क्या वह सार्वजनिक धन से ऐसे चिकित्सा सिद्धांतों, खगोल विज्ञान और इतिहास को समर्थन दे, जिन्हें वे अवैज्ञानिक और हास्यास्पद मानते थे—जिनमें तीस फीट ऊँचे राजा, तीस हजार वर्षों के शासनकाल और गुड़-मक्खन के समुद्रों का वर्णन हो।
उन्होंने यूरोप के पुनर्जागरण काल का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि इंग्लैंड ने ग्रीक और लैटिन को त्यागकर केवल अपनी पुरानी बोलियों तक शिक्षा सीमित रखी होती, तो वह कभी वर्तमान स्थिति तक नहीं पहुँच पाता। उनके अनुसार जिस प्रकार उस समय इंग्लैंड के लिए ग्रीक और लैटिन महत्वपूर्ण थे, उसी प्रकार भारत के लिए अंग्रेज़ी महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें संदेह है कि संस्कृत साहित्य उनके सैक्सन और नॉर्मन पूर्वजों के साहित्य से अधिक मूल्यवान है।
अंततः मैकाले ने निष्कर्ष निकाला कि 1813 के संसद अधिनियम से वे बँधे नहीं हैं और सरकार अपने धन का उपयोग अपनी इच्छानुसार कर सकती है। उनके अनुसार अंग्रेज़ी संस्कृत और अरबी से अधिक जानने योग्य है, भारत के निवासी अंग्रेज़ी सीखने के इच्छुक हैं और उन्हें अंग्रेज़ी का कुशल विद्वान बनाया जा सकता है। उन्होंने प्रसिद्ध वाक्य में कहा कि सरकार को ऐसा वर्ग तैयार करना चाहिए जो रक्त और रंग से भारतीय हो, परंतु रुचि, मत, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो, ताकि वह शासकों और शासितों के बीच सेतु बन सके।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे उन लोगों के साथ उदार व्यवहार करेंगे जिन्हें आर्थिक सहायता की उचित अपेक्षा रही है, किंतु अरबी और संस्कृत पुस्तकों की छपाई तुरंत बंद कर देंगे। उन्होंने कलकत्ता मदरसा और संस्कृत महाविद्यालय को समाप्त करने तथा केवल बनारस और दिल्ली में सीमित रूप से पूर्वी भाषाओं के अध्ययन को जारी रखने की अनुशंसा की। उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में इन संस्थानों के छात्रों को वजीफा न दिया जाए और शिक्षा की प्रतिद्वंद्वी प्रणालियों में लोगों को स्वतंत्र रूप से चुनाव करने दिया जाए। इससे बची हुई धनराशि से कलकत्ता के हिंदू कॉलेज को प्रोत्साहन दिया जाए और फोर्ट विलियम तथा आगरा प्रेसीडेंसी के प्रमुख नगरों में ऐसे विद्यालय स्थापित किए जाएँ जहाँ अंग्रेज़ी भाषा को पूरी तरह पढ़ाया जा सके।
इसके पश्चात 7 मार्च 1835 को इंग्लिश एजुकेशन एक्ट लागू कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेज़ी को शिक्षा का आधिकारिक माध्यम बना दिया गया, संस्कृत और अरबी की पारंपरिक शिक्षा को मिलने वाली सरकारी सहायता समाप्त कर दी गई और पश्चिमी साहित्य तथा विज्ञान को बढ़ावा मिला। प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अंग्रेज़ी जानने वाले भारतीयों का एक नया शिक्षित मध्यम वर्ग—जिसे बाबू वर्ग कहा गया—उत्पन्न हुआ और भारतीय समाज धीरे-धीरे मानसिक दासता के शिकंजे में जकड़ता चला गया।
*पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से 1947 तक की घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेखन तथा पुस्तक प्रकाशन।
