बारां-शाहबाद यात्रा में जंगल बचाने की मांग
पावर प्रोजेक्ट विरोध में राष्ट्रपति को ज्ञापन
जयपुर/बारां: अंतरराष्ट्रीय जल दिवस और विश्व वानिकी दिवस के अवसर पर शाहबाद जंगल बचाओ आंदोलन के तहत बारां से शाहबाद तक निकाली गई जनजागृति विरासत यात्रा को लेकर आयोजकों ने क्षेत्र में व्यापक जनसक्रियता पैदा होने का दावा किया है।
शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के आह्वान पर आयोजित इस यात्रा में सैकड़ों लोगों की भागीदारी बताई गई है। कार्यक्रम में कोटा सहित विभिन्न स्थानों से पर्यावरण कार्यकर्ता, किसान और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। इस सन्दर्भ में ज़ारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि प्रतिभागियों ने सरकार और ग्रीनको के खिलाफ नारेबाजी करते हुए शाहबाद के जंगलों की कटाई रोकने की मांग उठाई। ग्रीनको का उल्लेख विज्ञप्ति में प्रस्तावित पावर प्रोजेक्ट से जुड़े पक्ष के रूप में किया गया है। आयोजकों ने शाहबाद घाटी के जंगलों को “राष्ट्रीय विरासत” बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया और कहा कि इन्हें किसी भी स्थिति में नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
यात्रा की शुरुआत बारां स्थित श्रीराम स्टेडियम से हुई और यह विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए शाहबाद तक पहुंची, जिससे मार्ग में कई कस्बों और बाजारों में जनसंपर्क अभियान चलाया गया। समिति के संरक्षक एवं पर्यावरणविद बृजेश विजयवर्गीय ने कहा, “विकास के नाम पर विनाश अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जंगल बचेंगे तभी जीवन बचेगा।” विजयवर्गीय ने यह भी कहा कि विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
किशनगंज में यात्रा के पहुंचने पर आयोजित कार्यक्रम में, विज्ञप्ति के अनुसार, राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता रोबिन सिंह ने शाहबाद घाटी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा,“शाहबाद घाटी केवल बारां की नहीं, पूरे देश की प्राकृतिक धरोहर है। यहां पावर प्लांट लगाना पर्यावरणीय अपराध होगा।”
इसके बाद भंवरगढ़ में हुई सभा में जागो किसान आंदोलन के अध्यक्ष वरदान सिंह हाडा ने किसानों के दृष्टिकोण को सामने रखते हुए कहा, “जंगल कटे तो खेती, पानी और भविष्य—तीनों खत्म हो जाएंगे।”
यात्रा के अगले पड़ाव केलवाड़ा में, विज्ञप्ति के अनुसार, लेडी इंटेक की चेयरमैन नीता शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण में सामाजिक भागीदारी पर जोर देते हुए कहा, “जंगल बचाना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है, नहीं तो आने वाली नस्लें हमें माफ़ नहीं करेंगी।” इस दौरान विभिन्न बाजारों में जुलूस निकालकर नागरिकों से समर्थन भी मांगा गया।
समरानिया में आयोजित सभा के दौरान गब्बरसिंह यदुवंशी ने आंदोलन की आगे की दिशा को लेकर चेतावनी भरे स्वर में कहा, “यदि जंगल काटने का प्रयास हुआ तो जनआंदोलन और उग्र रूप लेगा।”

यात्रा अंततः शाहबाद पहुंचकर समाप्त हुई, जहां प्रतिभागियों ने अपनी मांगों को दोहराया और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जब्बरसिंह को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। विज्ञप्ति के अनुसार, ज्ञापन में शाहबाद क्षेत्र में प्रस्तावित पावर प्रोजेक्ट को अन्यत्र स्थापित करने और संबंधित क्षेत्र में जंगलों की कटाई पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।
आंदोलन में कोटा सहित विभिन्न स्थानों से पर्यावरण कार्यकर्ता, किसान और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। डॉ. सुधीर गुप्ता, डॉ. अनुज खंडेलवाल, पृथ्वी पाल सिंह और मुकेश सुमन सहित अन्य लोगों की उपस्थिति का विज्ञप्ति में उल्लेख किया गया है। बाघ-चीता मित्र, राष्ट्रीय जल बिरादरी और कोटा एनवायरनमेंटल सेनीटेशन सोसायटी जैसे संगठनों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की जानकारी भी दी गई है।
समाचार लिखे जाने तक इस संबंध में प्रशासन, राज्य सरकार या ग्रीनको की ओर से कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकी।
आंदोलनकारियों ने कहा कि शाहबाद घाटी के जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि जीवन, पानी और भविष्य की गारंटी हैं और इनके संरक्षण के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
