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2 thoughts on “रविवारीय: बचपन बनाम डिजिटल दुनिया

  1. स्वानुभवों पर आधारित श्री वर्मा जी का यह आलेख हमें उस सहज, सरल और जीवंत बचपन की याद दिलाता है, जहाँ रिश्तों की गर्माहट, खेलों की मासूमियत और समय की प्रचुरता थी। आज वही बचपन स्क्रीन के भीतर सिमटता जा रहा है। सोशल मीडिया ने सुविधाएँ तो दी हैं, पर साथ ही बच्चों से उनका स्वाभाविक विकास, सामाजिक जुड़ाव और वास्तविक अनुभव भी छीनने लगा है। पहले जहाँ समय “जीया” जाता था, आज वह “स्क्रॉल” में बीत रहा है। संवाद आमने-सामने होता था, अब आभासी हो गया है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि संतुलित उपयोग सीखें। बच्चों को स्क्रीन नहीं, संस्कार, संवाद और वास्तविक अनुभवों से जोड़ें। सोशल मीडिया साधन बने, साध्य नहीं।

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