– संजय राणा
जलवायु परिवर्तन से हिमालय में बाढ़ का खतरा दोगुना
400 से अधिक ग्लेशियर-स्रोतित हिमालयी झीलें बनीं संभावित विनाश का कारण
नवीनतम वैज्ञानिक केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के अध्ययन बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में अब तक 400 से अधिक ग्लेशियर-स्रोतित झीलें बन चुकी हैं। इनमें से कई झीलों को “संभावित रूप से खतरनाक” यानी पोटेंशियली डेंजरस ग्लेशियर लेक (पीडीजीएल) की श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि इनमें से किसी एक झील का प्राकृतिक बाँध टूटता है, तो कुछ ही मिनटों में नीचे की घाटियों में भीषण तबाही मच सकती है। पिघलते ग्लेशियरों से बनने वाली नई झीलों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, वह इस खतरे को और गंभीर बना रही है।
जैसे-जैसे शरद ऋतु ढलान पर है और ग्रीष्म ऋतु दस्तक दे रही है, हिमालय की गोद में बसे भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्रों पर इस नए विनाश का खतरा मंडराने लगा है। विशेष रूप से भारत के उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्य इस संकट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील माने जा रहे हैं। दुनिया भर के शोध और अध्ययन इस ओर स्पष्ट संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन की तेज होती रफ्तार अब हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
वास्तविकता यह है कि हिमालय के ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। इनके पिघलने से निकलने वाला पानी जब घाटियों में जमा होता है, तो मोराइन या बर्फीले अवरोधों के पीछे झील का रूप ले लेता है। समय के साथ इन झीलों का आकार और गहराई बढ़ती जाती है, जिससे उनमें जल-दबाव भी निरंतर बढ़ता रहता है। यदि किसी कारणवश—जैसे भूकंप, भूस्खलन या भारी वर्षा—ये प्राकृतिक बाँध टूट जाएँ, तो ग्लेशियर झील फूटने से उत्पन्न बाढ़ नीचे स्थित बस्तियों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुँचा सकती है। सिक्किम की साउथ ल्होनाक झील से जुड़ी घटनाएँ इसका उदाहरण हैं।
केदारनाथ और चमोली की त्रासदियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भी समय रहते संभल जाना जरूरी है। चेतावनी के रूप में 2013 के केदारनाथ-चमोली हादसे ने देश को भविष्य के खतरों के प्रति आगाह किया था, जिसकी हृदयविदारक स्मृतियाँ आज भी स्मृति-पटल से ओझल नहीं हुई हैं। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले की धौलीगंगा घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर चेताया कि हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय अस्थिरता और ग्लेशियर-संबंधी परिवर्तन कितने घातक हो सकते हैं। उस घटना में कई दर्जन लोगों की जान गई और दो जलविद्युत परियोजनाएँ बह गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये घटनाएँ हिमालय में हो रहे भौगोलिक बदलावों की स्पष्ट चेतावनी थीं।
यह खतरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। हिमालय पर्वत-श्रृंखला नेपाल, भूटान, चीन (तिब्बत) और पाकिस्तान तक फैली हुई है। इन सभी देशों में ग्लेशियर झीलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यदि किसी ऊँचाई पर स्थित झील का बाँध टूटता है, तो उसका पानी सीमाओं को पार कर नीचे के क्षेत्रों में बाढ़ ला सकता है। भारत, नेपाल और भूटान के कई हिस्से गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में आने के कारण सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ इस स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं।
भारत के पर्वतीय राज्य इस संकट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील माने जा रहे हैं। उत्तराखंड में धौलीगंगा और अलकनंदा घाटियाँ पहले से ही उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में गिनी जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में चंद्रा, भागा और स्पीति घाटियों में कई झीलें तेजी से फैल रही हैं। सिक्किम में पूर्वी हिमालय की झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है, जहाँ कई जलविद्युत परियोजनाएँ स्थित हैं। अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी सहायक नदियों के क्षेत्र में संभावित बाढ़ का खतरा बना रहता है। लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में कराकोरम और ज़ंस्कार घाटियों में भी कई अस्थिर झीलें पाई गई हैं।
वैज्ञानिक विशेष रूप से गंगा बेसिन, ब्रह्मपुत्र बेसिन और सिंधु बेसिन को सबसे अधिक खतरे वाले क्षेत्र मान रहे हैं। गंगा बेसिन में उत्तराखंड से निकलने वाली अलकनंदा, धौलीगंगा और भागीरथी नदियाँ, ब्रह्मपुत्र बेसिन में सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश की ऊँचाई वाली झीलें तथा सिंधु बेसिन में लद्दाख और जम्मू-कश्मीर की सहायक नदियाँ सर्वाधिक प्रभावित मानी जा रही हैं। इन घाटियों में घनी आबादी और अनेक जलविद्युत परियोजनाएँ होने के कारण संभावित नुकसान की आशंका और भी बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि ऐसी स्थिति में पूरे हिमालयी क्षेत्र में मजबूत निगरानी तंत्र और प्रभावी चेतावनी प्रणाली विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि हर वर्ष उपग्रह-आधारित सर्वेक्षण के माध्यम से झीलों की स्थिति की निगरानी की जानी चाहिए। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और आईसीआईएमओडी जैसी संस्थाओं ने कई झीलों को ‘अत्यधिक संवेदनशील’ श्रेणी में रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार संभावित खतरनाक झीलों की पहचान कर वहाँ स्थानीय अलार्म प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जोखिम मानचित्रण किया जाना चाहिए ताकि नीचे बसे गाँवों और परियोजनाओं को समय रहते चेताया जा सके, इंजीनियरिंग उपायों से कुछ झीलों से नियंत्रित जल-निकासी की व्यवस्था की जाए और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया जाए, क्योंकि यह समस्या राष्ट्रीय सीमाओं से परे है।
इस पूरी समस्या की जड़ जलवायु परिवर्तन है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पिछले तीन दशकों में हिमालय के औसत तापमान में लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके कारण ग्लेशियरों का पिघलना तेज हुआ है और झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो आने वाले दो दशकों में ऐसी झीलों की संख्या दोगुनी हो सकती है।
हिमालय केवल बर्फ से ढकी चोटियों का समूह नहीं है, बल्कि वह दक्षिण एशिया की करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियाँ यहीं से जन्म लेती हैं। यदि हिमालय का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है, तो इसका प्रभाव मैदानों में बसे करोड़ों लोगों पर पड़ेगा। 400 से अधिक ग्लेशियर-स्रोतित झीलों की यह चेतावनी स्पष्ट संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान का भीषण संकट बन चुका है। इसकी अनदेखी अंततः भयावह विनाश का कारण बन सकती है।
*लेखक समाज विज्ञानी एवं पर्यावरणविद हैं।
