– डॉ. राजेंद्र सिंह*
धरती से जुड़ाव ही पूर्ण जीवन का आधार
धरती से टूटता नाता, जीवन का सबसे बड़ा खतरा
आज मानव के लिए सबसे खतरनाक स्थिति उसका जमीन से उखड़ जाना है। जैसे किसी वृक्ष की जड़ मिट्टी से कटते ही उसकी हरियाली, उसका संतुलन और उसका जीवन धीरे-धीरे सूखने लगता है, वैसे ही मनुष्य का अस्तित्व भी धरती से संबंध टूटते ही भीतर से रिक्त, असंतुलित और अंततः विकृत होने लगता है। आधुनिक जीवन की चमक-दमक, ऊँची इमारतें, बंद कमरों की कृत्रिम हवा और प्रकृति से बढ़ती दूरी ने मनुष्य को उसके मूल से अलग कर दिया है। यही अलगाव आज शारीरिक रोगों, मानसिक असंतुलन, सामाजिक अशांति और आध्यात्मिक रिक्तता के रूप में सामने आ रहा है। मनुष्य को खेती से अलग करना वस्तुतः पेड़ को जमीन से अलग करने जैसा है।
हमारे ऋषियों ने इस सत्य को बहुत पहले पहचान लिया था। इसलिए वेद में उद्घोष है— “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ और पृथ्वी मेरी माता है। यह केवल भावनात्मक कथन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का मूल सूत्र है। पृथ्वी के लिए संस्कृत में अनेक नाम हैं। ‘पृथ्वी’ यानी फैली हुई, ‘धरा’ यानी धारण करने वाली, ‘भूमि’ यानी अनेक प्रकार के पदार्थों को जन्म देने वाली, ‘गुर्वी’ यानी भारी, ‘उर्वी’ यानी विशाल, और ‘क्षमा’ यानी सहन करने वाली। पृथ्वी का प्रत्येक नाम उसके किसी गुण का द्योतक है। हम प्रतिदिन उसे खोदते हैं, ताड़ित करते हैं, उससे लेते ही रहते हैं, फिर भी वह हमें क्षमा करती है और पोषण देती है। इसलिए वह ‘पूषा’ है— पोषण करने वाली, अहिंसा की आदर्श-मूर्ति, ध्यानमूर्ति।
वेद में प्रार्थना है कि पृथ्वी हमारे लिए सुखकारक बने, निष्कंटक बने, निःस्वप्न निद्रा देने वाली बने और हमारे इस विशाल मंदिर की रक्षा करे। यहाँ ऋषि अपने छोटे घर की नहीं, पूरी धरती को अपना घर मानकर प्रार्थना करता है। खुले आकाश के नीचे बैठकर वह कहता है— “विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे”। हे पृथ्वीमाता, हमारे पादस्पर्श को क्षमा करो। यह उस धरती की वंदना है जिसके पालक स्वयं विष्णु हैं, न कि कोई साम्राज्य या राजा।
वेद में किसी एक देश की नहीं, पूरी पृथ्वी की स्तुति है— “नानाधर्माणां पृथिवीं विवाचसम्”। अर्थात हे पृथ्वीमाता, तू अनेक स्वभावों, अनेक प्रवृत्तियों और विविध भाषाओं से संपन्न है; तू हम सबकी माता है। यहाँ विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय के रूप में देखा गया है। विचार में तनिक भी संकुचितता नहीं। यहाँ के ज्ञानी और विचारवान लोगों ने कभी किसी पर भेद नहीं रखा। यह पूरी भूमि हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यही वह विराट दृष्टि है जो मानवता को सीमाओं से ऊपर उठाती है।
इसी भाव का विस्तार “वसुधैव कुटुम्बकम्” में मिलता है। वेद का एक और शब्द है— विश्वमानुषः। पूरी वसुधा एक परिवार है। यहाँ ‘कुटुम्ब’ नहीं, ‘कुटुम्बकम्’ कहा गया है। ‘कम्’ प्रत्यय से उसका अर्थ छोटा कुटुंब होता है। संकेत यह है कि अनंत तारिकाएँ हैं, अनेक ग्रह हैं, अनेक वसुधाएँ हैं; इसलिए यदि हम अपनी इस एक वसुधा को भी एक परिवार की तरह जीना सीख लें, तो यह बहुत बड़ा नहीं, बल्कि छोटे कुटुंब के निर्माण का ही प्रथम चरण है। यह परिवार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, पशु-पक्षी, वायु, अग्नि और समूची सृष्टि तक विस्तृत है।
आज मानसिक रोगों और सामाजिक असंतुलन के पीछे एक बड़ा कारण यही है कि मनुष्य जमीन से उखड़ता जा रहा है। मैंने पढ़ा कि अमरीका में हर दस व्यक्तियों में से एक मानसिक बीमारी से पीड़ित है। इसका कारण यही है कि वहाँ मनुष्य मिट्टी से, खेती से और प्रकृति से दूर होता गया है। मेरा विचार है कि मनुष्य का जीवन जितना पूर्ण होगा, वह उतना ही सुखी होगा। भूमिसेवा पूर्ण जीवन का अनिवार्य अंग है। खेती से खुली हवा, सूर्यप्रकाश, आरोग्य, मानसिक आनंद और तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है। यह भक्ति का भी साधन है। जितने अधिक लोगों को मिट्टी से जुड़ने का अवसर मिलेगा, समाज में उतनी ही शांति और समाधान रहेगा।
मेरा स्पष्ट मत है कि प्रकृति से जितने दूर हम होते जाएँगे, उतने ही शारीरिक दृष्टि से पंगु होते जाएँगे। एक प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ का मत है कि बाँस के फट्टों से बने मकान अधिक अच्छे होते हैं, क्योंकि उनके छिद्रों से ताजी हवा पूरे घर में फैलती रहती है। बंबई, न्यूयॉर्क और लंदन जैसे महानगरों में लोगों को ताजी हवा तक नहीं मिल पाती। मकान जितना अधिक हवादार होगा, उसका किराया उतना अधिक होगा। यहाँ हम जिस ताजी हवा का आनंद सहज उठा रहे हैं, वही शहरों में महँगे दामों पर मिलती है। कारण स्पष्ट है— हम धरती और प्रकृति से बिलग हो गए हैं। यह बिलगाव दूर कर हमें धरती से नाता जोड़ना चाहिए, धरती पर काम करना चाहिए। यही आदर्श हमें लाभ पहुँचा सकता है। आज डॉक्टर भी बढ़ते जा रहे हैं और रोग भी। होना तो यह चाहिए कि रोग घटें तो डॉक्टर भी घटें। साफ बात है कि लोग प्रकृति से बिलग होते जा रहे हैं। प्रकृति हमारी माता है; उससे संपर्क जितना घटेगा, शरीर उतना ही विकृत होगा।
मैंने अपने जीवन में कृषि की उपासना की है। उसी अनुभव के आधार पर दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि जीने का शुद्धतम साधन कृषि ही है। व्यापार में मुनाफाखोरी समाज का अहित करती है। नौकरी आत्मा की तेजस्विता को कुंठित कर सकती है। इसलिए इन दोनों के सहारे पर टिके रहने के बजाय कृषि को आजीविका का साधन बनाना चाहिए। हाँ, देश का जीवन उद्योग के बिना पूर्ण नहीं बन सकता; इसलिए कुछ लोग ग्रामोद्योग के आधार पर भी जीवन चलाएँगे। पर उनके लिए भी कुछ समय भूमाता की सेवा आवश्यक है, क्योंकि नीति का अधिष्ठान खेती है।
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इसलिए हमें गाँव की रचना ऐसी करनी होगी कि हर व्यक्ति के पास कम से कम चौथाई एकड़ भूमि हो। हर किसी को दिन में दो-तीन घंटे खेत में काम करने का अवसर मिलना चाहिए। शेष समय में वह अन्य उद्योग करे। खेती बुनियादी सेवा है। खेत एक सुंदर उपासना-मंदिर है, एक उत्तम ज्ञान-मंदिर है।
मिट्टी का भी एक रंग होता है और रंग तथा मैल में अंतर है। मैल में जंतु, पसीना और दुर्गंध होती है, जबकि मृत्तिका पुण्यगंध होती है। गीता कहती है— “पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च”। हमारा शरीर मिट्टी से बना है और अंततः मिट्टी में ही मिल जाना है। उसी मिट्टी का रंग किसान के कपड़ों पर होता है। मिट्टी लगने से कपड़े खराब नहीं होते; मिट्टी का रंग गंदा नहीं, पवित्र होता है। शास्त्र कहते हैं— “मृज्जलाभ्यां बाह्यशुद्धिः, सत्यसंयमाभ्यां अन्तःशुद्धिः।” बाहरी शुद्धि मिट्टी और जल से, और आंतरिक शुद्धि सत्य तथा संयम से होती है। इसलिए शरीर पर मिट्टी लगना अच्छा है। ऐसा होगा तो नौकरों की मुक्ति होगी और सच्चा स्वराज्य आएगा।
लोग कहते हैं कि आबादी बढ़ेगी तो जमीन पर भार बढ़ेगा। मेरा मानना है कि पृथ्वी को संख्या का नहीं, पाप का भार होता है। यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है। मिट्टी से जो कुछ लिया जाए, उसे वापस मिट्टी को लौटाना चाहिए— हड्डियाँ, मलमूत्र, सूखे पत्ते, कचरा, सब कुछ। यदि हम संयम से रहें और प्रकृति के ऋण को लौटाते रहें, तो मिट्टी सबका पोषण करने में समर्थ है।
मुझे विश्वास है कि कृषि की सेवा से संतान पवित्र होती है। वेद का मंत्र है— “विप्रासो न मन्मभिः स्वाध्यः, क्षतीनां न मर्या अरेपसः।” जो ध्यानयुक्त होते हैं, वे भगवान के प्रिय बनते हैं, और जो खेती में श्रम करते हैं, वे निष्कलुष रहते हैं। यदि उपासनापूर्वक, कुशलतापूर्वक और विज्ञान की सहायता से खेती की जाए, तो वह केवल अन्न नहीं देती, बल्कि ब्रह्मचर्य, श्रमनिष्ठा, आनंद और चित्तशुद्धि की प्रेरणा भी देती है। शरीर-श्रम से जो आनंद मिलता है, वह इसलिए कि उसमें सृष्टि से सीधा संपर्क बना रहता है। निसर्ग से संपर्क टूटेगा तो राष्ट्र क्षीण होगा; संपर्क बना रहेगा तो चित्त उदार होगा।
एक बार सुबह-सुबह मैं खेतों के बीच से गुजर रहा था। फसल की रखवाली के लिए बने मचान पर एक किसान बैठा था। मैंने उससे कहा, “ये पक्षी फसल खा रहे हैं, तुम्हारा ध्यान उधर है या नहीं?” वह मुस्कराकर बोला, “भाई, यह रामप्रहर है। अभी भगवान सूर्यनारायण आ रहे हैं। थोड़ा-सा खा लेंगे, उसके बाद मैं उन्हें उड़ाऊँगा। उनका भी तो हक है।” यही भारतीय चित्त है— गाँववालों का उदार हृदय। भारत का आधार इसी संवेदना पर टिका है। खाने से पहले तुलसी के पौधे को पानी देना, गाय और कुत्ते के लिए भोजन अलग निकालना— यह भारतीय संस्कृति का विचार है, जिसमें समाज के लिए कुछ न कुछ देने की भावना निहित है।
हमारी भावना है कि यह पृथ्वी परमेश्वर की बैठक है। मानवता के लिए इस पृथ्वी के अलावा दूसरा कोई आधार नहीं। इसलिए हमारी वृत्ति वैश्वानर होनी चाहिए। हमें विश्वमय मनुष्य बनना है। विज्ञान और आत्मज्ञान दोनों संकुचितता पर प्रहार कर रहे हैं। हमें विशाल दृष्टि के साथ जीना होगा, ताकि हर मनुष्य में अपना ही रूप दिखाई दे। मनुष्य को देखते ही यह अनुभूति होनी चाहिए कि मेरा आत्मा ही मुझे मिल रहा है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी का जन्म कम से कम दो सौ करोड़ वर्ष पहले हुआ। और दो सौ करोड़ साल वह आगे भी टिकेगी। फिर उसका विघटन होगा। उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। आकाश में वे टुकड़े घूमेंगे, फिर उनकी हवा बन जाएगी। सूर्य भी दिन-ब-दिन ठंडा हो रहा है। होते-होते वह इतना ठंडा होगा जितनी आज पृथ्वी है। फिर उस पर भी प्राणी, मानव हो सकते हैं। फिर वह और ठंडा होते-होते पृथ्वी की तरह समाप्त होगा। संसार में एक भी पदार्थ ऐसा नहीं मिला जो सदा बना ही रहे। जो बना है, वह नष्ट भी होता है। इस दृष्टि से यह समूची सृष्टि वर्तुलाकार है। वर्तुल का आदि कहाँ है और अंत कहाँ, यह कहना कठिन है। इसलिए समझना चाहिए कि जो अनंत परमेश्वर है, उसका आदि नहीं, वह अनादि है। उसी की लीला चल रही है।
भारतीय वेदों और वैज्ञानिकों के मतानुसार 450 अरब वर्ष पूर्व जल ने पृथ्वी की निर्माण-प्रक्रिया आरंभ की थी। पृथ्वी का आकार बदलता रहा है, लेकिन निर्माण शुरू होने के बाद इस पर जीवन आया।
हमें अपने भीतर यह जीवंत अनुभूति जगानी होगी कि पृथ्वी केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि हमारी माता है; और माता के साथ संबंध उत्सव से नहीं, सेवा, संवेदना और उत्तरदायित्व से निभाया जाता है।केवल पृथ्वी को समझ लेने से काम पूरा नहीं होगा, बल्कि हमें अपने पूरे भगवान— भ (भूमि), ग (गगन), व (वायु), अ (अग्नि), न (नीर) —को समझना होगा। इन्हें समझकर, इनके साथ भगवान जैसा सम्मान, व्यवहार और सदाचार करेंगे, तभी मानवता टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ सकेगी।
जीवन की प्रक्रिया पानी से आरंभ होकर मिट्टी जीवन को निर्मित करती है और हवा जीवन को चलाने में योगदान देती है। सूरज की ऊर्जा उसे बनाकर सदैव जीवित रखने में सहायता करती है। पृथ्वी स्वयं एक निर्माण-प्रक्रिया है।
इस समूची सृष्टि-व्यवस्था के प्रति सम्मान, सदाचार और प्रेम ही मानवता को टिकाऊ भविष्य दे सकते हैं।मनुष्य का असली धर्म किसी औपचारिक उत्सव या घोषणा से कहीं आगे है। जब यह भाव जागेगा कि पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे अस्तित्व का विस्तार है, तभी मनुष्य सच अर्थों में अपने समय के संकट से उबर सकेगा।
हमें पृथ्वी की निर्माण-प्रक्रिया और हमारे जीवन के निर्माण की प्रक्रिया— इन दोनों के रिश्तों को समझकर, उनके साथ सम्मान से जीने और प्रेम की प्रक्रिया को बनाए रखना है। यह मानवीय कर्तव्य है। जब मानव इस कर्तव्य को पूरा करेगा, तभी वह अपने समय के संकटों से उबरकर संतुलित, शांत और टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ सकेगा।
हमारे मन में वास्तविक भगवान के प्रति अपनापन जागे और हम भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर के साथ जीवंत संबंध बनाकर जीवन आरंभ करें, तभी पृथ्वी के साथ हमारा रिश्ता सच अर्थों में सार्थक होगा।
*प्रख्यात जल संरक्षणविद् ‘जल पुरुष’।
