दिल्ली: रविवार 8 जून 2025, की सुबह थी, जब दिल्ली की हवाओं में गर्मी और उमस एक-दूसरे से गलबहियां कर रही थीं। हमने जगतपुर से रामघाट, वजीराबाद बैराज तक यमुना के किनारे पदयात्रा शुरू की। यह सिर्फ एक सैर नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अनुभव था, जो आंखें खोल देता है। यमुना, जिसे कभी मां कहकर पुकारा जाता था, आज अपनी बदहाली पर चुपके से आंसू बहा रही है।
कदम बढ़ाते ही खादर क्षेत्र में मलबे के ढेर ने स्वागत किया। वह मिट्टी, जो कभी हरियाली की गोद में पलती थी, अब कूड़े-कचरे और निर्माण के अवशेषों से दबी पड़ी है। फिर भी, इस तबाही के बीच सब्जियों की खेती अपनी जिद्दी हरियाली से मुस्कुरा रही है, मानो कह रही हो कि मैं अभी जिंदा हूँ। लेकिन पानी की हालत देखकर दिल बैठ जाता है। काला, गंदला, बदबूदार पानी यमुना की नियति बन चुका है। फिर भी, भैंसें उसमें तैरती और किनारे चरती दिखीं, जैसे उन्हें इस गंदगी से कोई फर्क ही न पड़ता। कहीं-कहीं जलकुंभी ने भी अपना साम्राज्य जमा लिया है, मानो यमुना को चुनौती दे रही हो।
गंदगी में डूबी यमुना, फिर भी जय मां!
रामघाट पहुंचे तो माहौल कुछ और था। वहां झील-सा दृश्य बन गया था। पक्के घाट, उनके इर्द-गिर्द मंदिरों की रौनक, और पंडितों की चौकियां सजी थीं। श्रद्धालु गंदे पानी में डुबकी लगाते, पूजा-पाठ और कर्मकांड करते दिखे। यह देखकर मन सवाल उठाता है कि यह आस्था है या अंधविश्वास का खेल? पानी यहां भी साफ नहीं था, और बीच-बीच में आती बदबू नाक को चुनौती देती थी। फिर भी, लोग उसी पानी में स्नान कर रहे थे, जैसे यह कोई पवित्र सरोवर हो।
यमुना मां बीमार, दिल्ली कब सुनेगी पुकार?
यमुना की यह हालत देखकर मन उदास हो जाता है। नई पीढ़ी को यमुना को जानना होगा, उसे देखना होगा, समझना होगा। इसके लिए जरूरी है कि वे इसकी असलियत से रूबरू हों। दिल्ली में यमुना पल्ला से ओखला तक किस हाल में है? यह वही दिल्ली है, जहां सत्ता, प्रशासन, न्याय, बड़े-बड़े अधिकारी, नेता, और देश-दुनिया के पदाधिकारी बसते हैं। राष्ट्रपति भवन, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, एनजीटी, नदियों के प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, और न जाने कितने दफ्तर यहां मौजूद हैं। केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, सब सक्रिय हैं। फिर भी, यमुना की सांसें फूल रही हैं।
यमुना की व्यथा: गंदा पानी, हरी उम्मीद!
नागरिक स्तर पर कुछ कोशिशें हो रही हैं, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है। सौ दिन चलकर भी अढ़ाई कोस का सफर तय होता है। पैसा खूब खर्च हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात। यमुना में अपने पानी की एक बूंद का बहाव तक नहीं बचा। नाले महादशा बनकर बह रहे हैं। घरों का कचरा, औद्योगिक अवशेष, सब कुछ यमुना को समर्पित है। दिखावा खूब है। बड़े-बड़े दावे, होर्डिंग्स, और प्रचार पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। लेकिन कथनी और करनी का फासला साफ दिखता है।
यमुना में साफ जल का बहाव कब लौटेगा? वह स्नान करने लायक कब बनेगी? बदबू और कचरे से मुक्त कब होगी? यमुना आईसीयू से कब बाहर आएगी? यमुना मां कब फिर से स्वस्थ दिखेंगी? कब वह कब्जे से आजाद होगी? ये सवाल हर कदम पर मन को कचोटते हैं। फिर भी, जैसी भी है, यमुना मैया की जय तो बनती है।




