-ज्ञानेन्द्र रावत*
हर बूंद पर संकट, भविष्य पर बड़ा सवाल
विश्व जल दिवस के अवसर पर यह कड़वी सच्चाई और भी स्पष्ट होकर सामने आती है कि जल संकट अब केवल एक संभावित खतरा नहीं, बल्कि खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी वास्तविकता है। जल का हमारे जीवन पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव इतना व्यापक है कि इसके बिना जीवन की कल्पना ही असंभव है। इसके बावजूद आज पानी की कमी दुनिया के लोगों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गई है। इसका प्रभाव केवल दैनिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि उत्पादकता, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य तक पर गंभीर खतरे के रूप में उभर रहा है। जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, जिसके कारण वैज्ञानिकों और आम लोगों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा भारत सहित नौ देशों में किए गए सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ है कि 47 प्रतिशत लोगों ने सूखे और पानी की कमी को अन्य खतरों की तुलना में दोगुना बड़ा खतरा बताया है। वहीं 56 प्रतिशत लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से उन्हें व्यक्तिगत रूप से अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका में लगभग दस में से सात लोगों की यही राय है, जबकि तुर्की में यह अनुपात एक तिहाई के आसपास है। इसके विपरीत, बहुत ही कम लोगों का यह मानना था कि मौसम, बाढ़, तूफान या समुद्र का बढ़ता जलस्तर उनके लिए प्रमुख खतरा है। 2015 के बाद इंडोनेशिया, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की में सूखे को अपनी सबसे बड़ी समस्या और चिंता बताने वालों की तादाद में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
जहां तक पानी का सवाल है, यह संकट केवल हमारे देश तक सीमित नहीं है, बल्कि समूची दुनिया के सामने विकराल रूप में खड़ा है। हकीकत यह है कि दुनिया में पेयजल की समस्या दिनों-दिन गंभीर होती चली जा रही है। दैनंदिन कार्यों की बात छोड़ दें, तो इसकी भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया में लगभग 4.4 अरब लोग केवल पीने के साफ पानी से ही महरूम हैं। स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ एक्वाटिक साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्ययन के अनुसार यह स्थिति बेहद भयावह और अस्वीकार्य है कि इतनी बड़ी आबादी को साफ पानी तक पहुंच ही नहीं है। सवाल यह है कि आखिर इसके बावजूद दुनिया की सरकारें पेयजल को बचाने और जल संचय के प्रति गंभीर क्यों नहीं हैं?
विडम्बना यह है कि हर वर्ष लगभग 4000 अरब घनमीटर वर्षा जल हमें प्राप्त होता है, लेकिन उसका समुचित संचयन नहीं हो पाता। यही वह मूल कारण है, जिसने जल संकट को इतना गंभीर बना दिया है। यदि इस वर्षा जल का सही तरीके से संचयन कर लिया जाए, तो काफी हद तक इस संकट से निजात मिल सकती है। फिर भी इस दिशा में अपेक्षित प्रयासों का अभाव समझ से परे है।
संयुक्त राष्ट्र बरसों से चेतावनी देता आ रहा है कि जल संकट समूची दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन जाएगा। यदि अभी से पानी की बढ़ती बर्बादी पर अंकुश नहीं लगाया गया और जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो हालात और खराब हो जाएंगे, जिनकी भरपाई करना असंभव हो सकता है। दुनिया अपने बुनियादी लक्ष्यों को हासिल करने में भी पीछे रह रही है, जो चिंता का विषय है। 2015 में निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों के तहत 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित और किफायती पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन मौजूदा हालात इस लक्ष्य को दूर होता हुआ दिखा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, साफ पानी की पहुंच से दूर आबादी के मामले में दक्षिण एशिया शीर्ष पर है, जहां 1200 मिलियन लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। इसके अलावा उप-सहारा अफ्रीका में 1000 मिलियन, दक्षिण-पूर्व एशिया में 500 मिलियन और लैटिन अमेरिका में 400 मिलियन लोग आज भी स्वच्छ पानी से वंचित हैं। एशिया की लगभग 61 प्रतिशत आबादी साफ पानी के संकट से जूझ रही है। इन क्षेत्रों में पानी में दूषित पदार्थों की मौजूदगी एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जो इस संकट को और जटिल बना रही है।
भारत में स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। नीति आयोग के अनुसार देश की 60 करोड़ से अधिक आबादी की साफ पानी तक पहुंच नहीं है। देश के दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो अलग है, राजधानी दिल्ली में भी लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई स्थानों पर टैंकर ही एकमात्र सहारा बन गए हैं, लेकिन वहां भी एक बाल्टी पानी के लिए लोग एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। नए इलाकों के साथ-साथ पुराने क्षेत्रों में भी पानी की भारी कमी लोगों को बेहाल कर रही है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पर्याप्त जलापूर्ति न मिलने पर लोग सबमर्सिबल पंपों के जरिए बड़े पैमाने पर भूजल का दोहन करने लगते हैं। दिल्ली जल बोर्ड) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार राजधानी में लगभग 22,000 से अधिक अवैध सबमर्सिबल पंप संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा निजी संस्थान, छोटे व्यवसाय, निजी अस्पताल, कार्यशालाएं, वाहन धुलाई केंद्र और निर्माण कार्यों में भी भूजल का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। ऐसे हालात में भूजल स्तर का गिरना स्वाभाविक है। National Green Tribunal (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) द्वारा लुप्त हो चुके जल निकायों की बहाली के निर्देश दिए जाने के बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है।
इस संकट के लिए केवल सरकारों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। हमारी जीवनशैली में आया बदलाव भी इसके लिए उतना ही जिम्मेदार है। अधिक अन्न उत्पादन की लालसा में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता उपयोग और साठ के दशक में डीजल पंपों के जरिए भूजल के दोहन ने जमीन की उर्वरता को नुकसान पहुंचाया और भूजल भंडार को लगातार कम किया। परिणामस्वरूप जमीन बंजर होती गई और भूजल स्तर नीचे जाता गया। आज भूजल में कुल घुलित ठोस और क्लोराइड की मात्रा कई क्षेत्रों में निर्धारित सीमा से अधिक हो चुकी है।
यह भी एक विडम्बना है कि हम नदियों को मां का दर्जा देते हैं और उन्हें जीवन का आधार मानते हैं, लेकिन व्यवहार में उनका संरक्षण नहीं कर पाते। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश की 271 नदियों में 296 स्थानों पर उनका पानी प्रदूषित पाया गया है, जबकि विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र का दावा है कि देश की लगभग 465 नदियां प्रदूषित हैं। यह स्थिति केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं।
सरकारों ने अमृत सरोवर और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन भ्रष्टाचार और कमजोर क्रियान्वयन के कारण वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं। यदि इन योजनाओं पर ईमानदारी से काम किया गया होता, तो जल संकट की स्थिति में काफी सुधार संभव था।
अब सवाल यह उठता है कि इस वैश्विक समस्या के लिए जिम्मेदार कौन है। स्पष्ट है कि इसके पीछे मानवीय गतिविधियां, लोभ, स्वार्थ और भौतिकवादी जीवनशैली प्रमुख कारण हैं। आज भी दुनिया में लगभग दो अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। 43.6 करोड़ बच्चों—जिनमें भारत के 13.38 करोड़ शामिल हैं—को अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो 2050 तक भारत के जल संसाधनों का 40 प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो सकता है। जल संकट के प्रति अति संवेदनशील देशों की सूची में भारत का शामिल होना इस चिंता को और बढ़ाता है। आखिर तब क्या होगा—यह प्रश्न आज सबसे अधिक गंभीर रूप से हमारे सामने खड़ा है।
ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जाए। खेतों में तालाब बनाना, वर्षा जल संचयन को अपनाना, पारंपरिक जल स्रोतों—तालाब, पोखर और कुओं—को पुनर्जीवित करना और जल की बर्बादी पर अंकुश लगाना समय की मांग है। इसके लिए व्यापक जनजागरण की भी आवश्यकता है।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट केवल एक संसाधन का संकट नहीं रहेगा, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा—और तब हर बूंद का महत्व जीवन और विनाश के बीच की अंतिम रेखा तय करेगा।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
