– सुरेश भाई*
सूखते जल स्रोतों के बीच उम्मीद की कहानी
परंपरा से ही बचेगा उत्तराखंड का पानी
चाल-खाल से लौट सकता है पहाड़ों का जल
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में इन दिनों जल संरक्षण को लेकर कई प्रेरक पहलें सामने आ रही हैं। कुदाल और फावड़ा उठाकर ग्रामीण, पर्यावरण कार्यकर्ता और स्वयंसेवी संगठन मिलकर पारंपरिक जल संरचनाओं—चाल-खाल—को फिर से जीवित करने में जुटे हैं। कुमाऊं क्षेत्र में चंदन नयाल, जगदीश नेगी, बच्ची सिंह बिष्ट और मोहन चंद्र कांडपाल जैसे लोग इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। दूसरी ओर गढ़वाल क्षेत्र में वनों के कटान को रोककर जल, जंगल और जमीन के अस्तित्व को बचाने के लिए रक्षासूत्र आंदोलन की टीम सक्रिय है। देहरादून में पर्यावरणविद् डॉ० रवि चोपड़ा, त्रिलोचन भट्ट, विजय भट्ट और अनूप नौटियाल जैसे लोग लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहे हैं, जबकि प्रसिद्ध महिला नेत्री कमला पंत भी शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में वनों को कटने से रोकने और पानी बचाने के प्रयासों में सक्रिय हैं।
ये पहलें केवल स्थानीय प्रयास नहीं हैं; वे एक गहरी चिंता और चेतावनी की अभिव्यक्ति भी हैं। क्योंकि पहाड़ों में जल संकट का प्रश्न केवल पानी की उपलब्धता का प्रश्न नहीं है, बल्कि प्रकृति के उस व्यापक संतुलन से जुड़ा है जिसमें जल, जंगल और जमीन एक-दूसरे के पूरक हैं। जल का अस्तित्व अपने आप में स्वतंत्र नहीं है। वह जमीन और जंगल से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए इन तीनों को अलग-अलग संसाधनों के रूप में देखना प्रकृति की मूल संरचना को समझने में भूल करना है।
उत्तराखंड का अनुभव इस सच्चाई को स्पष्ट करता है। बीसवीं सदी के 60–70 के दशक में जब वनों का बड़े पैमाने पर व्यापारिक दोहन शुरू हुआ, तब पर्वतीय क्षेत्रों में प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ने लगा। इस अंधाधुंध कटान के बाद दो गंभीर समस्याएँ सामने आईं। पहली समस्या नदी के जलग्रहण क्षेत्रों में भूस्खलन और धरती में पड़ती दरारों के रूप में दिखाई दी। दूसरी समस्या उससे भी अधिक चिंताजनक थी—जल स्रोतों और तालाबों का धीरे-धीरे सूख जाना।
इन्हीं परिस्थितियों ने उस ऐतिहासिक जनआंदोलन को जन्म दिया जिसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना जाता है। यह आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का संघर्ष नहीं था, बल्कि उन “वृक्षों” को बचाने की पुकार था जो जल और जमीन के अस्तित्व को बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पर्वतीय वनों के बीच रहने वाले लोगों का जीवन सदियों से प्रकृति के साथ संतुलित संबंधों पर आधारित रहा है। उनका मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन था, जिससे उन्हें भोजन और वस्त्र दोनों पर्याप्त मात्रा में मिल जाते थे। पशुपालक स्थायी रूप से एक ही स्थान पर नहीं रहते थे। वे अपने पशुओं के साथ उन स्थानों की ओर बढ़ते थे जहाँ चारे की उपलब्धता होती थी। धीरे-धीरे ऐसे अस्थायी पड़ाव स्थायी बसावटों में बदलते गए और गांवों का रूप लेने लगे।
इन गांवों में लोगों ने अपने और अपने मवेशियों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय भूगोल के अनुरूप जल संरचनाएँ विकसित कीं। कहीं आयताकार गड्ढों के रूप में, तो कहीं भूमि की ढलान के अनुसार “चाल-खाल” का निर्माण किया गया। ये मूलतः छोटे तालाबों की तरह होते थे। इनमें पानी दो प्रकार से एकत्रित होता था—एक तो धरती के भीतर से निकलने वाले जल स्रोतों से और दूसरा वर्षा के जल से। इस प्रकार के सहस्रों छोटे-छोटे तालाब लोगों ने अपने श्रम और अनुभव से बनाए थे, जिनसे पूरे वर्ष पानी की आपूर्ति बनी रहती थी।
समय के साथ जब कृषि का विकास हुआ, तब घाटियों में भी पानी को एकत्रित करने के लिए चाल-खाल बनने लगे, जिनका उपयोग सिंचाई के रूप में भी होने लगा। इसके अतिरिक्त प्रकृति ने भी कई स्थानों पर अपनी प्रक्रिया से झीलों और तालाबों का निर्माण किया। प्राकृतिक उथल-पुथल, हिमनदों का विखंडन और बुग्यालों में जल संचय—ये ऐसे उदाहरण हैं जिनसे प्राकृतिक झीलें और तालाब बने। इनका अस्तित्व मुख्यतः ग्लेशियरों और जैव विविधता के संतुलन पर टिका रहता है।
यदि इस संतुलन का एक भी हिस्सा खतरे में पड़ जाए तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में कई बार यह आशंका जताई जाती रही है कि यदि प्राकृतिक झीलों या तालाबों की संरचना असंतुलित हो जाए तो उनके टूटने से भीषण बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। इस प्रकार पानी तभी तक सुरक्षित है जब तक उसके सभी घटक—जंगल, मिट्टी, हिमनद और जैव विविधता—स्वस्थ और संतुलित बने रहें।
आज भी पर्वतीय गांवों के जंगलों, खेतों और चारागाहों में पुराने समय में बनाए गए चाल-खाल के अवशेष दिखाई देते हैं। लेकिन इनकी स्थिति चिंताजनक है। अधिकांश में गाद भर चुकी है और उनके आसपास के जल स्रोत भी सूख गए हैं। जहां कभी एक गांव में दस जल स्रोत हुआ करते थे, वहां अब केवल दो या तीन ही बचे रह गए हैं।
औद्योगिक क्रांति और खेती में आए आधुनिक परिवर्तनों ने भी इस स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया। गांवों के पारंपरिक तालाब लगभग मृतप्राय हो गए। स्थिति तब और खराब हुई जब पेयजल की व्यवस्था के नाम पर सीमेंट की डिग्गियां और हौज़ बनने लगे। गांवों में पाइपलाइन बिछाई गई और सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण हुआ। इन निर्माणों में सीमेंट का अत्यधिक उपयोग हुआ, जिससे जल स्रोतों का स्वाभाविक प्रवाह बाधित होने लगा।
धीरे-धीरे एक विचित्र विडंबना सामने आई—गांवों तक पानी की पाइपलाइन तो पहुंच गई, लेकिन उनमें बहने वाला पानी कम होता चला गया। इसका कारण यह था कि जल स्रोतों के चारों ओर जिस प्रकार की हरित संरचना और प्राकृतिक आवरण होना चाहिए था, उसकी जगह सीमेंट ने ले ली। इससे जल स्रोतों के प्राकृतिक रास्ते ही अवरुद्ध हो गए। इसी के साथ पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली—विशेषकर चाल-खाल जैसी व्यवस्थाएँ—आधुनिक समय में हाशिये पर चली गईं।
आज की परिस्थितियों में पारंपरिक संरक्षण पद्धतियों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। विशेष रूप से उन ढालदार और वृक्षविहीन स्थानों पर बसे गांवों में, जहां जल स्रोत सूख चुके हैं, वहां जलग्रहण क्षेत्रों में श्रृंखलाबद्ध छोटे-बड़े चाल-खाल बनाकर वर्षाजल को एकत्रित किया जा सकता है। इन संरचनाओं के चारों ओर चौड़ी पत्ती वाले सघन वृक्षारोपण की आवश्यकता है, जिससे संरचनाओं में एकत्रित वर्षा जल को धूप से बचाया जा सके।
ऐसी व्यवस्था का प्रभाव जल्दी दिखाई देता है। भूमि के भीतर नमी बढ़ती है और पुराने जल स्रोतों के पुनर्जीवन की संभावना बनती है। भूमि कटाव भी नियंत्रित होता है। जंगली जानवरों और अन्य जीव-जंतुओं को पीने का पानी उपलब्ध होता है और लंबे समय तक एकत्रित जल की उपस्थिति वातावरण में जल चक्रीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है। इससे वनों में लगने वाली आग को नियंत्रित करने में भी सहायता मिल सकती है।
हालाँकि यह सब तभी संभव है जब पारंपरिक निर्माण पद्धतियों और आधुनिक तकनीक के बीच एक सशक्त समन्वय स्थापित किया जाए। अभियंता, किसान और पशुपालक—इन तीनों की संयुक्त भूमिका गांवों में जल संरक्षण की नई लकीर खींच सकती है। इस प्रक्रिया में सबसे पहली प्राथमिकता पुराने तालाबों में भरी गाद को हटाने की होनी चाहिए।
कभी हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में सघन वन हुआ करते थे और लोग खेती तथा पशुपालन के लिए वनों का संतुलित दोहन करते थे। उन दिनों चाल-खाल में पानी लहराता था और जल स्रोत जीवन का स्थायी आधार बने रहते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। वर्षा कम होने लगी है, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और जैव विविधता भी घट रही है।
ऐसे समय में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि वर्षा के रूप में जो भी पानी धरती पर गिर रहा है, उसकी हर बूंद धरती के पेट में सुरक्षित हो सके। इसके लिए संभावित जलग्रहण क्षेत्रों में अधिक से अधिक जल संरचनाओं का निर्माण आवश्यक है। बदलती जलवायु के कारण इन संरचनाओं में गाद भरने की संभावनाएँ भी बढ़ गई हैं।
यदि जल संरचनाओं से समय-समय पर गाद नहीं निकाली जाएगी, तो धरती के भीतर पानी का संचय संभव नहीं हो पाएगा। इसलिए पारंपरिक ज्ञान के आधार पर गांवों और नगरों की जल समितियों को जल संरचनाओं के निर्माण और संरक्षण के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। यह जिम्मेदारी कल्याणकारी राज्य व्यवस्था को निभानी चाहिए।
उत्तराखंड में चल रहे सामूहिक प्रयास इस दिशा में उम्मीद की किरण दिखाते हैं। यदि समाज, प्रकृति और परंपरा के बीच यह संबंध फिर से मजबूत किया जा सके, तो संभव है कि पहाड़ों के सूखते स्रोत एक बार फिर जीवन से भर उठें—और जल, जंगल और जमीन का वह संतुलन भी लौट आए जो कभी इन पहाड़ों की पहचान हुआ करता था।
लेखक पर्यावरणविद एवं ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
