– डॉ राजेंद्र सिंह*
सामुदायिक जल प्रबंधन का उदाहरण: अरवरी अध्ययन
अरावली-अरवरी मॉडल पर सात दिवसीय अध्ययन शिविर
भीकमपुरा (राजस्थान): अरावली पर्वतमाला से निकलने वाली नदियों के संरक्षण और सामुदायिक जल प्रबंधन के अनुभवों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों और विद्यार्थियों का कहना है कि स्थानीय भू-संस्कृति, जल संरचनाओं और समुदाय की भागीदारी को साथ लेकर काम किया जाए तो सूख चुकी नदियों को भी पुनर्जीवित किया जा सकता है। राजस्थान की अरवरी नदी को इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जहां कभी खनन और जल संकट के कारण समाप्त हो चुकी जलधारा जल संरक्षण के निरंतर प्रयासों के बाद फिर से पूरे वर्ष बहने लगी। इसी अनुभव को समझने के लिए आयोजित सात दिवसीय अरावली संरक्षण शिक्षा अभियान प्रशिक्षण शिविर का समापन 14 मार्च को भीकमपुरा स्थित तरुण आश्रम में हुआ।
अरवरी नदी अलवर जिले के अरावली क्षेत्र से निकलकर अनेक गांवों से गुजरती हुई आगे चलकर सैंथल सागर बांध क्षेत्र तक पहुंचती है। इसका पुनर्जीवन 1985 में आरंभ हुए जल संरक्षण कार्यों से जुड़ा है। उस समय झिरी क्षेत्र में खनन के कारण नदी सूख चुकी थी और पूरा इलाका खनन से प्रभावित था। कई खदानें आसपास के कुओं से भी अधिक गहरी हो गई थीं। जल संरक्षण के प्रयास पहले उन गांवों में शुरू किए गए जो खनन क्षेत्र से बाहर थे। कुछ समय बाद वहां के कुओं में जल स्तर बढ़ने लगा, जबकि सक्रिय खनन वाले क्षेत्रों में स्थिति अलग बनी रही। इसके बाद स्थानीय समुदायों ने खनन बंद कराने के लिए संघर्ष किया और उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की गई। 1991 में न्यायालय के आदेश से खदानें बंद हुईं। इसके बाद लगभग दस वर्षों तक चले जल संरक्षण कार्यों, भूजल पुनर्भरण और हरियाली के विस्तार के परिणामस्वरूप 1995 में अरवरी नदी पहली बार पूरे वर्ष बहने लगी और धीरे-धीरे यह सदानीरा धारा के रूप में स्थापित हो गई।
नदी के पुनर्जीवन के बाद 1996 में मत्स्य विभाग द्वारा मछली पकड़ने का ठेका दिए जाने पर स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि नदी का पुनर्जीवन सामुदायिक प्रयासों से संभव हुआ है, इसलिए इसमें मछली पकड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके बाद ठेका रद्द हुआ और अरवरी नदी से जुड़े 72 गांवों के लोगों ने मिलकर ‘अरवरी संसद’ का गठन किया। यह मंच नदी के उपयोग, संरक्षण और जल संसाधनों के सामुदायिक प्रबंधन से जुड़े नियम तय करने का कार्य करता है और क्षेत्र में खनन गतिविधियों को रोकने के प्रयासों में भी सक्रिय रहा है। आज अरवरी नदी को सामुदायिक जल प्रबंधन के एक दीर्घकालिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

इसी अनुभव को समझने के लिए अहमदाबाद स्थित अनंत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और शिक्षकों का एक दल मार्च के पहले पखवाड़े में अरवरी नदी क्षेत्र में अध्ययन के लिए पहुंचा। इस अध्ययन को प्रो. अनुनय चौबे, प्रो. पुनीत कुमार और प्रो. स्वाति मंगरूलकर के शैक्षणिक मार्गदर्शन में संचालित किया गया, जबकि क्षेत्रीय स्तर पर गोपाल सिंह और छोटेलाल मीणा सहित स्थानीय सहयोगियों ने विद्यार्थियों को जल संरचनाओं और गांवों के सामाजिक अनुभवों से परिचित कराया। अध्ययन से पहले क्षेत्र के कई गांवों में संपर्क कर ग्रामीणों को निर्धारित बैठकों के लिए आमंत्रित किया गया था ताकि संवाद और अनुभव साझा करने की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल सके।
दल को दो समूहों में विभाजित किया गया था। एक समूह निर्धारित गांवों में रुककर ग्रामीणों के साथ संवाद करता रहा, जबकि दूसरा समूह नदी के उद्गम से लेकर नीचे सैंथल सागर तक क्रमशः क्षेत्र का भ्रमण करता रहा। इस दौरान नदी क्षेत्र की वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी और स्थानीय लोगों के साक्षात्कार किए गए।
अध्ययन के क्रम में सेवा का गुवाड़ा स्थित ज्याखाली जोहड़ी सहित कई जल संरचनाओं का निरीक्षण किया गया। ये संरचनाएं उन सैकड़ों जल संरक्षण प्रयासों का हिस्सा हैं जो 1985 से लेकर 2020 तक विभिन्न गांवों में बनाए गए और जिनके माध्यम से वर्षा जल को रोककर भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया को मजबूत किया गया। हाल की वर्षा के कारण इनमें पर्याप्त पानी भरा हुआ था। क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना ऐसी है कि वर्षा का जल तेजी से जमीन के भीतर समा जाता है और इससे आसपास के कुओं का जल स्तर बढ़ जाता है। छोटे जोहड़, तालाब और मिट्टी-पत्थर के बांध वर्षा के पानी को रोककर धीरे-धीरे उसे जमीन में समाने देते हैं, जिससे भूजल भंडार भरते हैं और सूखी नदियों के स्रोत फिर सक्रिय होने लगते हैं। विद्यार्थियों ने तरुण ताल सहित अन्य संरचनाओं का भी निरीक्षण किया, जहां पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की प्रक्रियाओं और उनके पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा हुई।
इस अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों को यह भी समझाया गया कि जल संरक्षण का प्रभाव केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। पहाड़ी क्षेत्रों में जल संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल को रोकने से स्थानीय पर्यावरणीय तापमान में औसतन लगभग तीन डिग्री सेल्सियस तक कमी देखी गई है। इस अवधारणा को “पानी ही जलवायु है और जलवायु ही पानी है” के विचार के रूप में समझाया गया। इसी संदर्भ में लाल गर्मी, पीली गर्मी और हरी गर्मी की अवधारणाओं पर भी चर्चा की गई, जिनके माध्यम से भूमि, वनस्पति और जल के पारस्परिक संबंधों को समझाया गया।
अध्ययन दल ने भांवता, कोल्याला, जूमोली, हमीरपुर, देव का देवरा, जैतपुर गुर्जरां, कालेड़ और आसपास के गांवों में ग्रामीणों से बातचीत की। ग्रामीणों ने बताया कि लगभग तीन दशक पहले क्षेत्र में पानी की भारी कमी थी, लेकिन जल संरक्षण प्रयासों के बाद खेती, पशुपालन और वनस्पति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जल उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
विद्यार्थियों ने क्षेत्र की कई प्रमुख जल संरचनाओं—जैसे सांकड़े का तालाब, सांवतसर-डूमोली क्षेत्र की संरचनाएं, भीड़ वाला ताल, खजूरी बांध, भोजकला एनिकट और सैंथल सागर बांध—का निरीक्षण किया। सैंथल सागर बांध में उस समय लगभग 27 फीट पानी भरा हुआ पाया गया, जबकि इसकी अधिकतम क्षमता 29 फीट है। सांकड़े के तालाब के अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों ने जाना कि अधिक जल दबाव को ध्यान में रखते हुए इसे उत्तल (कन्वैक्स) डिजाइन में बनाया गया था। यह वही स्थान है जहां पहले ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स भी आ चुके हैं।

क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों ने जल, भू-आकृति, वन, जीव-जंतु, कृषि, आजीविका, सांस्कृतिक परंपराएं और सामाजिक संरचना जैसे आठ प्रमुख भू-सांस्कृतिक आयामों के बीच संबंधों को समझने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने साक्षात्कार, अवलोकन, फोटोग्राफी और परसेप्शन मैप के माध्यम से क्षेत्र का भू-सांस्कृतिक मानचित्रण तैयार किया। अध्ययन के दौरान अरावली क्षेत्र की वनस्पति, स्थानीय वन्यजीव और जैव विविधता के संकेतों का भी अवलोकन किया गया, जिससे यह समझने का प्रयास किया गया कि जल, जंगल और भूमि के परस्पर संबंध किस प्रकार क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को प्रभावित करते हैं।
अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों ने भानगढ़ किले, सरसा माता मंदिर और नारायणी माता मंदिर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का भी भ्रमण किया। भानगढ़ किले के संदर्भ में क्षेत्र से जुड़ी तीन अलग-अलग परंपराओं—भक्तमाल के उल्लेख, ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय लोककथाओं—का भी उल्लेख किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में प्राकृतिक और सांस्कृतिक इतिहास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार अरावली पर्वतमाला की तलहटी में स्थित भानगढ़ नगर की स्थापना 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आमेर राज्य के शासक राजा भगवंत दास ने अपने पुत्र माधो सिंह के लिए कराई थी। उस समय यह एक सुव्यवस्थित नगर के रूप में विकसित हुआ था, जिसमें राजमहल परिसर, बाजार, आवासीय बस्तियाँ और अनेक मंदिर स्थापित थे। आज भी किले के अवशेषों में गोपीनाथ, सोमेश्वर और केशव राय जैसे मंदिरों के ढांचे, प्राचीन बाजार मार्ग, राजमहल के खंडहर तथा जल संरचनाओं के अवशेष दिखाई देते हैं, जो उस समय की नगरीय संरचना और सामाजिक जीवन की झलक देते हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय परंपराओं और लोककथाओं में भानगढ़ के उजड़ने से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें एक कथा संत बालूनाथ से संबंधित है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने किले के निर्माण की अनुमति इस शर्त पर दी थी कि नगर की किसी भी इमारत की छाया उनके तपस्थल पर नहीं पड़नी चाहिए; लोकमान्यता के अनुसार इस शर्त के उल्लंघन के बाद नगर का पतन हुआ। एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा राजकुमारी रत्नावती और एक तांत्रिक से जुड़ी है, जिसके श्राप को भी भानगढ़ के उजड़ने से जोड़ा जाता है। यद्यपि इन कथाओं का ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है, फिर भी वे स्थानीय स्मृति और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन चुकी हैं।
इस प्रकार ऐतिहासिक अभिलेखों, संत परंपराओं और लोककथाओं के संयुक्त उल्लेख से यह संकेत मिलता है कि अरावली क्षेत्र में प्राकृतिक भू-दृश्य, ऐतिहासिक बसावट और लोकसांस्कृतिक स्मृतियाँ एक-दूसरे के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र का अध्ययन केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भू-सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
फील्ड अध्ययन के समापन पर प्रतिभागियों ने अपने अनुभवों और अवलोकनों के आधार पर यह निष्कर्ष रखा कि अरवरी नदी केवल एक जलधारा नहीं है, बल्कि सामुदायिक जल प्रबंधन की एक ऐसी प्रक्रिया का परिणाम है जो अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिक स्थिति से गहराई से जुड़ी है। वन, जल स्रोत और प्राकृतिक संरचनाएं सुरक्षित रहने पर ही नदी का प्रवाह और उससे जुड़ा सामाजिक-आर्थिक जीवन दीर्घकाल तक टिकाऊ रह सकता है। इस दृष्टि से अरावली पर्वतमाला और उससे निकलने वाली नदियों का संरक्षण क्षेत्रीय पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
*प्रख्यात पर्यावरणविद् एवं जल संरक्षण विशेषज्ञ, ‘जलपुरुष’।
