वाराणसी में आज पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
गोमाता को राज्यमाता बनाएँ, शंकराचार्य ने 40 दिन की चेतावनी दी
गोहत्या रोक और राज्यमाता दर्जा नहीं, तो लखनऊ में संत समाज होगा संगठित
वाराणसी: शासन द्वारा उनसे शंकराचार्य होने की प्रमाणिकता प्रस्तुत करने को कहे जाने की पृष्ठभूमि में ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित करते हुए कहा कि- “हमारा प्रमाण पत्र तो आपने माँग लिया, अब मुख्यमन्त्री जी को देना होगा अपने ‘हिन्दू’ होने का प्रमाण”।
आज श्रीविद्यामठ, केदारघाट, वाराणसी में आयोजित विशेष पत्रकार वार्ता में उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वस्तों रामभद्राचार्य आदि के माध्यम से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उनसे शङ्कराचार्य होने का प्रमाण तक माँगा जा रहा है और उनकी छवि को सनातनी जनता के बीच धूमिल करने के तरह-तरह के प्रयास किये जा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रयाग माघमेला क्षेत्र में संतों, बटुकों और महिलाओं के कथित अपमान तथा शासन-प्रशासन की कथित हठधर्मिता से व्यथित होकर शंकराचार्य बिना त्रिवेणी स्नान किए कल काशी स्थित श्रीविद्यामठ लौट आए थे। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने यह विशेष पत्रकार वार्ता आयोजित कर धर्म और सत्ता के बीच खड़े इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से सामने रखा। उन्होंने इसे धर्म और सत्ता के बीच टकराव की निर्णायक कसौटी बताया और स्पष्ट किया कि इन सबसे विचलित न होते हुये वे समस्त सनातनियों के सहित गोरक्षा के अपने सङ्कल्प को दृढतापूर्वक बढाते रहेंगे।
शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश शासन के शीर्ष नेतृत्व को कड़ा संदेश दिया: “मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ जी, आपने हम हमारे पद और परम्परा का प्रमाणपत्र माँगा—हमने सहज भाव से वह आपको सौंप दिया। क्योंकि सत्य को साक्ष्य से भय नहीं होता। किन्तु अब समय ‘प्रमाण’ लेने का नहीं, बल्कि आपके ‘प्रमाण’ देने का है। सम्पूर्ण सनातनी समाज अब आपसे आपके ‘हिन्दू’ होने का साक्ष्य माँगता है। हिन्दू होना केवल भाषणों या भगवे तक सीमित नहीं है, इसकी कसौटी ‘गो-सेवा’ और ‘धर्म-रक्षा’ है।”
शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष दो माँगें रखीं। पहली, उत्तर प्रदेश में गोमाता को ‘राज्यमाता’ का आधिकारिक दर्जा दिया जाए, जैसा कि नेपाल में गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा प्राप्त है और महाराष्ट्र सरकार ने देशी गायों को राज्यमाता घोषित किया है। दूसरी, प्रदेश की भूमि से होने वाले हर प्रकार के मांस निर्यात पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
उन्होंने सरकारी आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश के कुल मांस निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ‘रामराज्य’ की परिकल्पना गोवंश के रक्त से अर्जित विदेशी मुद्रा पर आधारित होगी। शंकराचार्य ने यह भी कहा कि निर्यात का सारा आँकड़ा भैंस के मांस (बफेलो मीट) के नाम पर दर्ज किया जाता है, किंतु यह एक खुला सत्य है कि बिना वैज्ञानिक डीएनए परीक्षण के उसी आड़ में गोवंश को काटा और विदेश भेजा जा रहा है।
उन्होंने राज्य में भैंसों की संख्या और मांस निर्यात की मात्रा के बीच भारी असंगति की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि जब तक प्रत्येक वधशाला और प्रत्येक कंटेनर का वैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक यह स्थिति शासन की मौन स्वीकृति मानी जाएगी। उनके अनुसार यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक उत्तरदायित्व से पलायन का उदाहरण है।
अपनी माँगों पर स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित कर उन्होंने शासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार के लिए 40 दिनों का समय देते हुए चेतावनी दी कि यदि इस अवधि के भीतर गोमाता को ‘राज्यमाता’ का दर्जा नहीं दिया गया और उत्तर प्रदेश से मांस निर्यात पर प्रतिबंध का शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो 10–11 मार्च को लखनऊ में समस्त संत समाज का समागम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उस दिन मुख्यमंत्री को ‘नकली हिन्दू’ घोषित करने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उनके अनुसार जो सरकार गोवंश की रक्षा नहीं कर सकती, उसे हिन्दू कहलाने का नैतिक अधिकार नहीं है, विशेषकर वह सरकार जो गुरु गोरक्षनाथ की परंपरा से जुड़ी होने का दावा करती है।
हाल के दिनों में प्रयाग माघमेला के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पारंपरिक “प्रथम स्नान” की अनुमति नहीं दी गई और इसके बाद उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा गया था। उन्होंने इसे धार्मिक परंपराओं में प्रशासनिक हस्तक्षेप बताया और कहा कि किसी संन्यासी या शंकराचार्य की वैधता का निर्णय शासन नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और शास्त्रसम्मत प्रक्रिया करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य पद की स्थापना वैदिक और शास्त्रीय विधि से होती है और इसे प्रमाणपत्रों से नहीं आँका जा सकता। उनके अनुसार संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और राज्य को आध्यात्मिक पदों की वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि शासन की ओर से भेजे गए नोटिस का उत्तर विधिक प्रक्रिया के तहत उनके अधिवक्ता द्वारा दिया गया है।
प्रेस वार्ता में शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि गोमाता की रक्षा की आवाज उठाने के कारण उनके और उनके सहयोगी गोभक्तों के विरुद्ध दबाव और अपमानजनक कार्रवाइयाँ की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि उनकी छवि को सनातनी समाज के बीच धूमिल करने के प्रयास हो रहे हैं और इन कार्रवाइयों का नेतृत्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने विश्वस्तों, जिनमें रामभद्राचार्य आदि शामिल हैं, के माध्यम से करवा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में गोमाता की रक्षा और गोहत्या पर प्रतिबंध की माँग करना अपराध की तरह बना दिया गया है। 1966 के दिल्ली गोरक्षा आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय अनेक संतों और गोभक्तों पर गोलियाँ चलाई गईं तथा धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज सहित कई प्रमुख सनातनियों को अत्याचार सहना पड़ा। शंकराचार्य के अनुसार आज भी वही परिस्थितियाँ दोहराई जा रही हैं और गोमाता के पक्ष में आवाज उठाने वालों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
शंकराचार्य ने कहा कि यह संघर्ष किसी एक पद या व्यक्ति का नहीं, बल्कि सनातन की आत्मा की रक्षा का प्रश्न है। उन्होंने उत्तराखंड द्वारा ‘राष्ट्रमाता’ का प्रस्ताव और महाराष्ट्र द्वारा ‘राज्यमाता’ का सम्मान दिए जाने का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि भगवान राम और कृष्ण की भूमि उत्तर प्रदेश मांस निर्यात का केंद्र क्यों बनी हुई है। उन्होंने जन-जन से इस विषय पर जागरूक होने और धर्म की रक्षा के लिए संगठित होने का आह्वान किया।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
