-स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती*
दस दिन बाद भी सरकार ने ‘असली हिन्दू’ होने का प्रमाण नहीं दिया
श्री विद्यामठ, काशी: आप सब भलीभांति जानते हैं कि विगत प्रयाग माघ मेले के दौरान उत्तर प्रदेश की तथाकथित हिन्दू सरकार ने अपने तथाकथित गेरुआधारी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मुझसे मात्र 24 घंटे के भीतर शंकराचार्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया था। मैंने निर्धारित समयसीमा में वह प्रमाण उन्हें सौंप दिया। इसके उपरांत मैंने उसी सरकार को उसके ‘असली हिन्दू’ होने को प्रमाणित करने के लिए उदारतापूर्वक 40 दिनों का समय दिया। आज 9 फरवरी को उस अवधि के दस दिन पूरे हो चुके हैं।
दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि इन दस दिनों में सरकार और उसके गेरुआधारी तथाकथित महंत मुख्यमंत्री ने अपने ‘असली हिन्दू’ होने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। इसके विपरीत, उनके आचरण और वक्तव्यों से यह संकेत अवश्य मिला है कि वे स्वयं को नकली हिन्दू, अर्थात कालनेमि, के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
इन दस दिनों में उनका पहला कदम यह रहा कि उन्होंने अपने पशुपालन मंत्री से एक लेख पढ़वाया, जिसे मंत्री ने अनेक चैनलों पर बार-बार पढ़कर सुनाया। उसमें यह कहा गया कि उत्तर प्रदेश सरकार गाय नहीं बल्कि भैंस, बकरा और सुअर के वध और व्यापार को मान्यता देती है। यह ऐसी स्वीकारोक्ति है जिसे सुनकर न केवल प्रत्येक सच्चा हिन्दू और संत, बल्कि गुरु गोरखनाथ जी की परंपरा भी लज्जित होती होगी कि उसी परंपरा से जुड़ा व्यक्ति करोड़ों जीवों की हत्या कर मांस व्यापार को वैध ठहरा रहा है।
इसके बाद यह भी कहा गया कि वे मुझे शंकराचार्य नहीं मानते। मुझे स्पष्ट करना आवश्यक है कि शंकराचार्य होने के लिए किसी ऐसी सरकार की मान्यता या अमान्यता का कोई अर्थ नहीं, जो पीठ की स्थापना के हजारों वर्षों बाद अस्तित्व में आई हो। शंकराचार्य को वही नहीं मानता जो स्वयं हिन्दू न हो। जो स्वयं को हिन्दू कहे और शंकराचार्य को न माने, वह स्वतः ही नकली हिन्दू सिद्ध होता है। सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आदि शंकराचार्य ने मठाम्नाय महानुशासन में कहा है कि धर्म ही मनुष्यों का मूल है और वह आचार्य पर अवलंबित है, इसलिए आचार्य अर्थात शंकराचार्य का शासन सर्वोच्च है।
दूसरा कार्य उन्होंने यह किया कि केंद्रीय बजट 2026 का न केवल स्वागत किया, बल्कि उसे ‘ऐतिहासिक’ भी बताया। यह वही बजट है जिसमें मांस निर्यातकों को पहले से बढ़ाकर तीन प्रतिशत अतिरिक्त ड्यूटी-फ्री छूट दी गई है। प्रश्न यह है कि क्या कोई सच्चा हिन्दू और गेरुआधारी महंत अथवा योगी जीव-हिंसा को बढ़ावा देने वाले बजट को ऐतिहासिक विकास का प्रतीक कह सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शासन की प्राथमिकता धर्ममर्यादा नहीं, बल्कि मांस से अर्जित मुद्रा है। पीड़ादायक यह है कि धर्म की नहीं, बल्कि रक्तरंजित धन की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की जा रही है।
दस दिनों के लेखा-जोखा में सुधार नहीं, बल्कि संहार का चित्र सामने आता है। हमने 40 दिन का समय दिया था, किंतु इन दस दिनों में ही शासन का जो स्वरूप दिखाई पड़ा, वह हृदयविदारक है। सच्चा धर्म सत्ता और संपत्ति नहीं, बल्कि शांति और संतुष्टि का मार्ग है, पर आज यह देखकर दुःख होता है कि धर्म को सत्ता और संपत्ति का साधन बना लिया गया है और कालनेमि की भांति धर्म का चोला पहनकर अपना स्वार्थ साधा जा रहा है।
कुछ लोग कहते हैं कि योगी सरकार ने नया कुछ नहीं किया और यह सब पहले से चलता आ रहा था, पर सरकारी आंकड़े भिन्न कहानी कहते हैं। सच्चाई यह है कि वर्ष 2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने से पहले उत्तर प्रदेश में मांस उत्पादन लगभग 7.5 लाख टन था, जो अब बढ़कर 13 लाख टन से अधिक हो चुका है। योगी शासन में वधशालाओं की संख्या भले ही कागजों पर कम दिखाई दे, किंतु पशु वध की मात्रा और गति लगभग 60 प्रतिशत बढ़ गई है। वर्ष 2017 से पहले जिन इकाइयों को अपराधी माना जाता था, अब उन्हें उद्योग का दर्जा देकर 35 प्रतिशत तक की सब्सिडी, अधिकतम पांच करोड़ रुपये तक, प्रदान की जा रही है।
योगी जी के पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश की धरती पर स्वीकृत रूप से 16 करोड़ से अधिक निरपराध जीवों का वध हुआ है, जिसमें घोषित रूप से चार करोड़ भैंसवंश सम्मिलित हैं और करोड़ों गायों के रक्त बहने का अनुमान है। यह वह संहार है जिसे वैध और आधुनिक वधशालाओं के माध्यम से राजकीय संरक्षण प्राप्त है। क्या 16 करोड़ से अधिक पशुओं की चीखें किसी योगी के कानों तक नहीं पहुंचतीं? क्या यही हिन्दुत्व है, क्या यही संतत्व और महंतत्व कहा जा सकता है? जीव तो जीव है, और जो योगी जीवमात्र पर दया की शपथ लेता है, उसके शासन में यदि 16 करोड़ से अधिक जीव कट जाएं, तो यह स्थिति किस प्रकार समझी जाए?
स्पष्ट है कि यह शासन हिन्दूवादी मुखौटे के पीछे केवल वोट के लिए गौ-भक्ति का प्रदर्शन करता है, जबकि राजस्व के लिए वधशालाओं को पाल रहा है।
हैरानी का विषय है कि जहां किसान त्रस्त है, वहीं शासन प्रदेश के कई विशाल कसाईखानों को 35 प्रतिशत पूंजीगत अनुदान और पांच-पांच करोड़ रुपये तक की नकद सहायता दे रहा है। जिस करदाता के धन से गौ-रक्षा होनी थी, उसी धन से वधशालाओं में संहार की मशीनें लगवाई जा रही हैं। जिस किसान का पुत्र खाद और बीज के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है, उसी किसान के कर से उन्नाव और अलीगढ़ की वधशालाओं में पशु-वध मशीनें लगाई जा रही हैं। मैंने यह प्रश्न उठाया है कि क्या यह करुणा के धन से क्रूरता का पोषण नहीं है।
इलेक्टोरल बॉन्ड के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि अल्लाना ग्रुप जैसे मांस निर्यातकों ने सत्तापक्ष को करोड़ों रुपये का चंदा दिया है। प्रश्न यह है कि क्या इन तथाकथित दानों के बदले में इन रक्त-बीजों के लाइसेंस सुरक्षित रखे गए हैं। जब रक्षक ही भक्षक से चंदा लेने लगे, तो मर्यादा का ह्रास निश्चित है।
मैंने पशुपालन मंत्री के वक्तव्य की वैज्ञानिक जांच कराने के संबंध में पांच सूत्रीय पत्र मुख्यमंत्री को भेजा है, जिसका उत्तर अब तक प्राप्त नहीं हुआ है।
इसी बीच, घोर निराशा के वातावरण में गुजरात से एक उदाहरण सामने आया है, जहां एक भाजपा विधायक के विरोध के बाद अहमदाबाद नगर निगम को 32 करोड़ रुपये का बूचड़खाना बजट वापस लेना पड़ा। यदि गुजरात का एक साधारण विधायक यह साहस दिखा सकता है, तो उत्तर प्रदेश के पीठाधीश्वर कहे जाने वाले मुख्यमंत्री वधशालाओं के लाइसेंस निरस्त क्यों नहीं कर सकते।
इन परिस्थितियों में बीते दस दिनों में योगी बाबा की हिन्दू हृदय सम्राट की बनावटी छवि निरंतर धूमिल होती जा रही है। आशा है कि शेष 30 दिनों में वे स्वयं को संभालेंगे और गोमाता को राज्यमाता घोषित करते हुए मांस विक्रय के इस क्रूर कारोबार को बंद करेंगे। उत्तराखंड, हिमाचल और सिक्किम जैसे राज्य बिना मांस निर्यात के भी अपनी अर्थव्यवस्था चला रहे हैं।
एक और गंभीर प्रश्न यह है कि जब कोई संन्यासी और योगी होकर मुख्यमंत्री के रूप में वेतन और सुविधाएं लेता है, तो शास्त्रीय संकट उत्पन्न होता है। सिद्ध सिद्धांत पद्धति के अनुसार संन्यासी के लिए ‘भृति’ अर्थात वेतन विष के समान है। जब एक व्यक्ति महंत के रूप में धर्म की और मुख्यमंत्री के रूप में संविधान की शपथ ले, तो इन परस्पर विरोधी दायित्वों के बीच धर्म-रक्षा कैसे संभव होगी।
इसी कारण शास्त्रीय मर्यादा की सिद्धि और भावी पीढ़ियों की पवित्रता बनाए रखने हेतु शास्त्रार्थ आवश्यक है। 21वें दिन 19 फरवरी 2026 को देशभर में तथा 31वें दिन 1 मार्च 2026 को काशी में अखिल भारतीय संत एवं विद्वद्गोष्ठी आयोजित की जाएगी। इसके बाद 41वें दिन 11 मार्च 2026 को लखनऊ में महा-अभियान का अंतिम निष्कर्ष और आगामी धर्म-शासनादेश सार्वजनिक किया जाएगा।
*उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य। यह लेख आज आयोजित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पत्रकार वार्ता से लिए गए अंशों पर आधारित है।
