शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
गौरक्षा मांग पर शंकराचार्य का धर्मयुद्ध शंखनाद
असि घाट पर धर्मयुद्ध शंखनाद के समर्थन का कार्यक्रम
राज्यमाता मांग के साथ काशी से लखनऊ अभियान
वाराणसी: लखनऊ में प्रस्तावित “गोप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध शंखनाद” के समर्थन में बुधवार, 11 मार्च को वाराणसी के असि घाट पर दोपहर 2:15 बजे सामूहिक शंखनाद का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार इस कार्यक्रम के माध्यम से काशी के गौभक्त उस अभियान के प्रति समर्थन व्यक्त करेंगे, जिसके तहत ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उत्तर प्रदेश सरकार से गौमाता को “राज्यमाता” घोषित करने और राज्य में पूर्ण रूप से गोहत्या प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे हैं। आयोजकों ने इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के प्रतिनिधियों से कार्यक्रम में समय से उपस्थित रहने का अनुरोध किया है।
इस अभियान की पृष्ठभूमि में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को 40 दिनों की समयसीमा दी गई है, जिसमें गौमाता को राज्यमाता घोषित करने और प्रदेश में पूर्णतः गोकशी बंद करने की मांग की गई है। इसी समयसीमा के 35वें दिन, 6 मार्च को काशी के शंकराचार्य घाट पर छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जबकि समयसीमा के 36वें दिन गौपूजन के साथ काशी से “गोप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध शंखनाद यात्रा” की शुरुआत की गई।
काशी स्थित श्रीविद्यामठ से प्रारंभ हुई इस यात्रा से पहले शंकराचार्य ने विधिवत गौपूजन किया। इसके बाद वे चिंतामणि गणेश मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने दर्शन, पूजन और आरती की। वहां से वे गौभक्तों के साथ संकटमोचन मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने हनुमान जी और श्रीराम दरबार के दर्शन किए। मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक और बजरंगबाण का पाठ किया गया। शनिवार होने के कारण मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे और शंकराचार्य की उपस्थिति पर जयकारों के साथ उनका स्वागत किया गया। बताया गया कि गोरक्षक हनुमान जी के समक्ष इस धर्मयुद्ध में विजय की प्रार्थना भी की गई।
यात्रा के दौरान संतों का एक समूह आगे-आगे शंखध्वनि करते हुए चल रहा था, जिसे इस अभियान के प्रतीकात्मक “शंखनाद” के रूप में प्रस्तुत किया गया। मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय के अनुसार संकटमोचन मंदिर से आगे शंकराचार्य पूर्व निर्धारित मार्गों से लखनऊ के लिए रवाना हुए। उन्होंने बताया कि जिन मार्गों से यात्रा गुजरी, वहां विभिन्न स्थानों पर भक्तों ने पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत और अभिनंदन किया। उनके अनुसार काशी में कई स्थानों पर गौभक्तों, सनातनी जनता और अधिवक्ताओं द्वारा भी स्वागत कार्यक्रम आयोजित किए गए।
मीडिया प्रभारी के अनुसार शंकराचार्य काशी से लखनऊ की ओर बढ़ती इस यात्रा के दौरान मार्ग में पड़ने वाले विभिन्न शहरों में लोगों से संवाद कर रहे हैं और कई स्थानों पर गौसभाओं के माध्यम से गौरक्षा के विषय पर समर्थन जुटाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि शंकराचार्य 11 मार्च को लखनऊ पहुंचकर विजय मुहूर्त में “गोप्रतिष्ठा धर्मयुद्ध” का औपचारिक शंखनाद करेंगे।
इस अभियान की पृष्ठभूमि में 6 मार्च को आयोजित कार्यक्रम में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने विधिवत गंगापूजन किया और छत्रपति शिवाजी महाराज के चित्र पर तिलक कर पुष्प अर्पित किए। उन्होंने उपस्थित लोगों को गौरक्षा का संकल्प भी दिलाया। अपने संबोधन में उन्होंने शिवाजी महाराज को हिंदवी स्वराज्य का संस्थापक बताते हुए कहा कि उन्होंने बाल्यावस्था में ही गौहत्या करने वाले व्यक्ति को दंडित कर गौमाता की रक्षा का उदाहरण प्रस्तुत किया था।
शंकराचार्य ने शास्त्रीय आधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म के ग्रंथों में राजा का कर्तव्य गौ, ब्राह्मण और देवायतनों की रक्षा करना बताया गया है। उन्होंने रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान राम ने भी विश्वामित्र के समक्ष गौ, ब्राह्मण और राष्ट्रहित के लिए जो भी आवश्यक हो उसे पूरा करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान राम, भगवान कृष्ण, आदि शंकराचार्य, महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज जैसे व्यक्तित्वों द्वारा प्रशस्त मार्ग का उल्लेख करते हुए शिवाजी के पुत्र संभाजी महाराज ने अपने ग्रंथ “बुधभूषणम” में लिखा कि जो क्षत्रिय गाय, ब्राह्मण और मंदिरों की रक्षा के लिए प्राण देता है, वह स्वर्ग का अधिकारी होता है और उसकी कीर्ति अनंत काल तक प्रतिष्ठित रहती है।
शंकराचार्य ने कहा कि शिवाजी जयंती के अवसर पर प्रत्येक हिंदू को यह संकल्प करने की आवश्यकता है कि गाय, ब्राह्मण और मंदिरों को नुकसान पहुंचाने के प्रयासों का विरोध किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयासों के विरुद्ध संघर्ष करने का समय आ गया है और इसी उद्देश्य से इस अभियान की शुरुआत की गई है।
कार्यक्रम के दौरान कलाकारों द्वारा शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक लघु नाटिका भी प्रस्तुत की गई, जिसमें गौरक्षा से जुड़े प्रसंगों का मंचन किया गया। इसी अवसर पर अखिल भारतीय सारस्वत परिषद के तत्वावधान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गौरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए “करपात्र गौभक्त सम्मान” से सम्मानित किया गया। संस्था की ओर से यह पहला सम्मान गिरीश चंद्र तिवारी और प्रोफेसर विवेकानंद तिवारी ने संयुक्त रूप से उन्हें प्रदान किया।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
