– बृजेश विजयवर्गीय*
पेड़ों की कटाई और पर्यावरण पर बढ़ता विवाद
शाहाबाद जंगल में परियोजना पर विवाद गहराया
जयपुर/कोटा: राजस्थान के बारां जिले का आदिवासी बहुल शाहाबाद वन क्षेत्र, जिसे अन्नपूर्णा क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है, इन दिनों प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना को लेकर चर्चा में है। इस परियोजना के कारण बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है, जिसे लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और जागरूकता अभियान तेज हुआ है। विभिन्न पक्षों का कहना है कि इसका प्रभाव केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक स्तर पर पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।

पेड़ों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 1.19 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है। कुछ आकलनों में करीब दो लाख पेड़ों की कटाई से भी व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव की बात कही गई है। स्थानीय समूहों का दावा है कि यह संख्या चार से पाँच लाख तक हो सकती है। वहीं, बाढ़-सूखा विश्व जन आयोग के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह ने क्षेत्र का दौरा करने और नापतोल के आधार पर कहा है कि परियोजना लागू होने पर 28 लाख से अधिक पेड़ प्रभावित हो सकते हैं।
यह परियोजना तब चर्चा में आई जब सरकार ने हैदराबाद स्थित ग्रीनको एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को 408 हेक्टेयर वन भूमि पर 1800 मेगावाट क्षमता का जल विद्युत संयंत्र स्थापित करने की अनुमति दी। पिछले वर्ष इस मुद्दे पर एक अभियान चलाया गया, जिसके तहत राजस्थान के नागरिकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को 35 हजार से अधिक पोस्टकार्ड भेजे।
परियोजना के विकल्पों को लेकर भी सुझाव दिए गए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यदि जल विद्युत संयंत्र स्थापित करना आवश्यक हो, तो इसे ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किया जाना चाहिए जहां घने वन न हों। कोटा जिले के रामगंज मंडी और झालावाड़ जिले के भवानी मंडी क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, जहां खनन के कारण बड़े पैमाने पर मलबे के ढेर और गहरी खाइयां बन चुकी हैं। इस प्रकार की भूमि के पुनः उपयोग का उदाहरण देते हुए यह भी कहा गया है कि चीन जैसे देशों में खनन से प्रभावित भूमि को पुनः विकसित कर परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
शाहाबाद का यह प्राचीन और जैव विविधता से भरपूर वन क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे एक महत्वपूर्ण जल पुनर्भरण क्षेत्र भी बताया गया है, जिसे संरक्षित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद विभाग के सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक डॉ. रमेश कुमार भूटिया द्वारा किए गए वनस्पति सर्वेक्षण के अनुसार, देश में पाई जाने वाली लगभग 450 औषधीय पौधों की प्रजातियों में से 332 प्रजातियां इस क्षेत्र में उपलब्ध हैं, जिसे महत्वपूर्ण और विचारणीय बताया गया है।

वन्यजीवों की दृष्टि से भी यह क्षेत्र समृद्ध है। यहां गिद्धों की लुप्तप्राय प्रजातियां ऊंचे पेड़ों पर घोंसले बनाती देखी जाती हैं, और यह आशंका व्यक्त की गई है कि यदि इन पेड़ों को काटा गया तो इन प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा सरीसृपों, पक्षियों तथा तेंदुआ, भालू, लोमड़ी, सियार, नीलगाय, सांभर, चीतल और जंगली सूअर जैसे स्तनधारी जीवों की उपस्थिति भी दर्ज की गई है। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन पर प्रभाव पड़ने और मिट्टी के कटाव की आशंका भी जताई गई है। कुछ आकलनों में यह भी कहा गया है कि यदि इस घने वन क्षेत्र को संरक्षित नहीं किया गया, तो इसका प्रभाव व्यापक पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।

इस परियोजना को लेकर प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा गया है, जिसमें यह आशंका व्यक्त की गई है कि इसका प्रभाव कुनो क्षेत्र में चल रहे चीता संरक्षण कार्यक्रम पर पड़ सकता है। कुनो राष्ट्रीय उद्यान में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीते बसाए गए हैं। यह भी कहा गया है कि लगभग 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ने वाले इन चीतों के लिए विस्तृत क्षेत्र आवश्यक होता है और वर्तमान परिदृश्य उनके लिए सीमित माना जा सकता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के चीता कार्ययोजना के अंतर्गत भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार कुनो से गांधी सागर अभयारण्य तक लगभग 17 हजार वर्ग किलोमीटर का परिदृश्य तय किया गया है, और शाहाबाद का यह वन क्षेत्र इसी गलियारे के बीच स्थित बताया जाता है।
इस बीच यह भी सामने आया है कि कुनो नदी के किनारे प्रस्तावित एक मदिरा निर्माण इकाई को लेकर स्थानीय स्तर पर रोष व्यक्त किया गया है। न्यायिक स्तर पर भी इस मामले में संज्ञान लिया गया है। जोधपुर उच्च न्यायालय ने समाचार रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए 9 अक्टूबर 2024 को आदेश जारी किया। न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति मुनूरी लक्ष्मण शामिल थे, ने कहा कि यह वन क्षेत्र लगभग 22.5 लाख मीट्रिक टन कार्बन अवशोषित करता है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि वनरोपण के लिए जैसलमेर जिले में उपलब्ध कराई गई वैकल्पिक भूमि लगभग 712 किलोमीटर दूर है और उसकी कार्बन अवशोषण क्षमता लगभग 3500 मीट्रिक टन बताई गई है, जो वर्तमान क्षेत्र की तुलना में काफी कम है।
पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में हाल के वर्षों के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। कई बड़े शहरों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने और वायु गुणवत्ता सूचकांक 700 तक दर्ज होने की घटनाएं सामने आई हैं। वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता लगभग 420 भाग प्रति मिलियन तक पहुंच चुकी है, जो पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 151 प्रतिशत अधिक बताई गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 का औसत तापमान भी पूर्व स्तर की तुलना में लगभग 1.48 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।
राज्य के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक दीप नारायण पाण्डेय ने कहा कि अपने कार्यकाल में शाहाबाद और बारां के सोरसन क्षेत्र को संरक्षण के लिए आरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की पहल की गई थी।
वहीं, वर्तमान उप वन संरक्षक विवेकानंद माणिक राव ने कहा कि इस परियोजना से जुड़े सभी निर्णय उनके पदभार संभालने से पहले ही लिए जा चुके थे और सभी स्वीकृतियां पूर्व में ही प्रदान की जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके स्तर पर किसी भी प्रकार की समीक्षा संभव नहीं है।
वन विभाग के अधिकारियों की ओर से इस विषय पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सीमित रही है। जयपुर स्तर पर भी अधिकारी खुलकर बोलने से बचते नजर आए। विभागीय सूत्रों के अनुसार विभाग सरकार की कार्ययोजना के अनुरूप कार्य करता है।
इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। शाहाबाद घाटी बचाओ संघर्ष समिति के संरक्षक प्रशांत पाटनी ने कहा कि इस निर्णय को लेकर क्षेत्र में असंतोष है और लोगों को आंदोलन की ओर धकेले जाने की स्थिति बन रही है। वहीं, स्थानीय शिक्षक मुकेश सुमन ने इस परियोजना की पृष्ठभूमि को लेकर यह प्रश्न उठाया कि वर्तमान में लागू की जा रही योजना पूर्ववर्ती सरकार के समय लाई गई थी।
कुल मिलाकर, शाहाबाद वन क्षेत्र से जुड़ा यह मामला विकास परियोजनाओं, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय हितों के बीच जटिल संबंधों को रेखांकित करता है। इस पर प्रशासन, न्यायपालिका और स्थानीय समुदाय—तीनों स्तरों पर नजर बनी हुई है, जबकि क्षेत्र में चर्चा और प्रतिक्रियाएं लगातार जारी हैं।
*वरिष्ठ पत्रकार
