लाभ छोड़, सेवा से बनेगा शुभ
जब सेवा का भाव मन में जागता है, तो शिक्षा सिर्फ किताबों की मोहताज नहीं रहती। यह विद्या बनकर जीवन को आलोकित करती है, एक ऐसा जीवन जो स्वार्थ, लालच और खुदगर्जी की बेड़ियों से मुक्त हो। लेकिन आज की शिक्षा! वह तो अक्सर लाभ की भट्टी में तपकर इंसान को स्वार्थी बनाने की कला सिखाती है। ऐसी शिक्षा में सेवा का भाव कहीं खो जाता है। लोग काम को लाभ का सौदा बना लेते हैं, और लाभ, वह सेवा का सबसे बड़ा दुश्मन है। सेवा को निगलने वाला यही लाभ है।
सेवा “शुभ” की मां है। वह हर उस कार्य में बसती है, जो बिना किसी अपेक्षा के, सिर्फ दूसरों के लिए किया जाए। वह प्यासे को पानी पिलाने में है, भूखे को रोटी देने में है, पेड़ की जड़ों को सींचने में है। वह उस क्षण में है, जब आप बिना फल की चाह के बीज बोते हैं, बिना पुरस्कार की लालसा के दुनिया को बेहतर बनाने की राह पर चल पड़ते हैं। सेवा वह चुपके से खिलने वाला फूल है, जो बिना शोर मचाए सुगंध बिखेरता है।
क्या सरकारी नौकरी, निजी कंपनियों का काम, या मंदिरों में मन्नत मांगकर किया गया दान सेवा है? नहीं! सरकार ने “सेवा” शब्द को आर्थिक चादर ओढ़ाकर इसके असली रंग को फीका कर दिया। भगवान को रिश्वत देकर मांगी गई मन्नतें, मंदिरों में बांटा गया भोजन—यह सब व्यापार है, सेवा नहीं। सच्ची सेवा वह है, जो बिना किसी मांग के की जाए। वह प्याऊ है, जो बिना मन्नत के प्यास बुझाता है; वह पेड़ है, जो बिना फल की इच्छा के लगाया जाता है; वह काम है, जो बिना प्रसिद्धि की चाह के किया जाता है। अगर पुरस्कार अपने आप आ जाए, तो उसे ठुकराना नहीं, पर उसकी लालसा सेवा को दागदार कर देती है।
सेवा में लेन-देन की गंध नहीं होती। यह दान नहीं, बल्कि एक साझा निर्माण है, जो प्रकृति और संस्कृति को पालता है। यह वह अमर धारा है, जिसका न आदि है, न अंत। यह देशज है, फिर भी वैश्विक है। यह वह भाव है, जो स्थानीय मिट्टी से उगकर विश्व के आकाश को छू लेता है। जब लोग एक-दूसरे के सेवाकार्य को देखते हैं, तो उनके मन में भी सेवा का दीप जल उठता है। वे स्वयं आगे आते हैं, जैसे नदी की धारा बिना बुलाए समंदर से मिलने दौड़ती है।
मुझे याद है, गोपालपुर गांव में जब मैंने शिक्षा और चिकित्सा का बीड़ा उठाया, तो शुरू में अकेला था। लेकिन नौ-दस महीने बाद, लोग खुद चलकर आए। कोई श्रम देने, कोई अनुदान देने। जब चबूतरे वाले जोहड़ के लिए श्रमदान शुरू हुआ, तो गांव ही नहीं, शहरों और संस्थाओं के लोग भी जुड़ गए। क्यों? क्योंकि मेरा मकसद पैसा या शोहरत नहीं, बल्कि साध्य और सिद्धि था। गोपालपुरा के लोगों ने मेरे मन की यह बात पढ़ ली। मैंने भी ऐसे ही सेवाभावियों को ढूंढा, जो आज भी तरुण भारत संघ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं।
हमने यात्राओं से विद्या अर्जित की है। “जल बचाओ – जोहड़ बनाओ यात्रा” की गूंज आज भी गांव-गांव में सुनाई देती है। “ग्राम स्वावलंबन – स्वराज यात्रा” ने लोगों को आत्मनिर्भर बनने का सपना दिखाया। “पेड़ लगाओ – जंगल बनाओ यात्रा” ने धरती को हरा भरा करने का संकल्प लिया। “राष्ट्रीय जल चेतना यात्रा”, “नदी कूच”, “आओ नदी को जाने यात्रा”, “गंगा अविरलता यात्रा”, “सद्भावना यात्रा”, “विरासत स्वराज यात्रा”—ये यात्राएं सिर्फ कदमों की नहीं, मन की यात्राएं हैं। ये बाढ़ और सूखे से लड़ने की, समाज को सशक्त करने की, और हमारी विरासत को सहेजने की प्रेरणा देती हैं। “शिक्षा को विद्या बनाने वाली यात्रा”, “सीमा और दीवार से मुक्त विद्या यात्रा”, “छो-जूरा-जिंग यात्रा”, “वाकिंग वाटर यात्रा”—ये विश्व भर में विद्या की लौ जलाती हैं। ये यात्राएं सिखाती हैं, सीखती हैं, और सेवा के भाव को जीवित रखती हैं।
ये विद्या यात्राएं हैं, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। ये हमें सिखाती हैं कि सेवा सिर्फ देना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ मिलकर कुछ नया रचने का नाम है। यह वह विद्या है, जो बिना दीवारों के, बिना सीमाओं के, हर दिल तक पहुंचती है। यह वह आलोक है, जो सेवा के भाव से जलता है और दुनिया को रोशन करता है।
*लेखक जल पुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक हैं।

