माघ मेले में 13 को प्रवेश करेंगे शंकराचार्य, गुप्त नवरात्र अनुष्ठान
वाराणसी: माघ मास का आगमन उत्तर भारत में धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई गति देता है। संगम तट की ओर बढ़ते तीर्थयात्री, कल्पवास की तैयारियां और अस्थायी नगर का रूप लेता माघ मेला मिलकर प्रयागराज को कुछ सप्ताहों के लिए भारतीय आध्यात्मिक जीवन का प्रमुख केंद्र बना देते हैं। माघ मेला परंपरागत रूप से संगम स्नान, दान, कल्पवास और धार्मिक प्रवचनों का आयोजन रहा है, लेकिन इसके साथ ही साधना की एक शांत धारा भी यहां चलती रही है, जो भीड़ और उत्सव से अलग, अनुशासन और एकांत पर आधारित होती है।

इस वर्ष मेले के प्रारंभिक चरण में एक अतिरिक्त आयोजन की घोषणा हुई है। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कल १३ जनवरी को माघ मेला क्षेत्र में विधिवत प्रवेश करने जा रहे हैं। उनके आगमन के बाद संगम तट पर स्थित शिविर में माघ मास की गुप्त नवरात्रि से जुड़े विशेष अनुष्ठानों की शुरुआत होगी। यह जानकारी उनके मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय द्वारा आज जारी प्रेस विज्ञप्ति से आई है।
प्रयाग को हिंदू परंपरा में तीर्थराज माना जाता है। यहां त्रिवेणी संगम—गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती—के साथ ही इसे भगवती ललिता देवी का सिद्ध क्षेत्र भी कहा जाता है। शाक्त और तांत्रिक ग्रंथों में ललिता देवी को त्रिपुर सुंदरी के रूप में देखा जाता है, जिसके कारण प्रयाग को शक्ति उपासना की परंपरा से जोड़ा जाता है। माघ मास में पड़ने वाली गुप्त नवरात्रि इसी परंपरा का एक हिस्सा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में चार नवरात्रियां आती हैं। चैत्र और आश्विन की नवरात्रियां प्रकट रूप में मनाई जाती हैं, जहां बड़े पैमाने पर उत्सव, जुलूस और सार्वजनिक पूजा होती है। वहीं माघ और आषाढ़ की नवरात्रियां गुप्त कहलाती हैं। इनमें साधना का स्वरूप गोपनीय, संयमित और अंतर्मुखी होता है। बाहरी प्रदर्शन की जगह व्यक्तिगत अनुशासन, ध्यान और गोपनीय उपासना पर जोर रहता है। धार्मिक ग्रंथों और तांत्रिक परंपराओं में गुप्त नवरात्रि को दस महाविद्याओं की उपासना से जोड़ा जाता है। दस महाविद्याएं—काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—शक्ति के विभिन्न रूप मानी जाती हैं।
इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है। काली समय और परिवर्तन से जुड़ी हैं तथा अज्ञानता के नाश की प्रतीक हैं। तारा ज्ञान और करुणा की देवी हैं तथा मार्गदर्शन और रक्षा से संबंधित हैं। त्रिपुर सुंदरी सौंदर्य, सृजन और तीन लोकों की स्वामिनी हैं। भुवनेश्वरी ब्रह्मांड की रक्षक और पालनकर्ता हैं। भैरवी उग्र शक्ति से शत्रु नाश और आंतरिक बल से जुड़ी हैं। छिन्नमस्ता आत्म-त्याग और कुंडलिनी जागरण का प्रतीक हैं। धूमावती वैराग्य और जीवन की क्षणभंगुरता सिखाने वाली हैं। बगलामुखी वाणी से विरोधियों को स्तंभित करने वाली हैं। मातंगी कला, संगीत और अपरंपरागत ज्ञान की देवी हैं। कमला धन, समृद्धि और भौतिक-आध्यात्मिक संतुलन की प्रदाता हैं।
ये दस महाविद्याएं तांत्रिक परंपरा में महान ज्ञान के रूप मानी जाती हैं। इनकी उत्पत्ति की कथाएं पुराणों और तंत्र ग्रंथों में मिलती हैं, जैसे सती द्वारा शिव को रोकने के लिए इन रूपों का प्रकट होना। गुप्त नवरात्रि में इनकी उपासना को गोपनीय मंत्र, यंत्र और विधियों से जोड़ा जाता है। इस अवधि में साधक सात्विक आहार, मौन, संयमित दिनचर्या और दुर्गा सप्तशती पाठ जैसी प्रथाओं का पालन करते हैं।
ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि यह अनुष्ठान राष्ट्र की सुख-समृद्धि, सनातन धर्म की मजबूती और लोक कल्याण की भावना को समर्पित है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि शक्तिपीठ ललिता देवी के क्षेत्र में होने वाला यह व्रत-पूजन साधकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी रहेगा।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती वर्तमान में काशी में प्रवास कर रहे हैं। काशी को ज्ञान, वैराग्य और शास्त्रीय विमर्श की भूमि माना जाता है, जबकि प्रयाग तपस्या, तीर्थ और संगम की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों स्थलों के बीच का संबंध भारतीय धार्मिक भूगोल में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। माघ मेले के दौरान देश-विदेश से श्रद्धालु प्रयाग पहुंचते हैं। वे दर्शन के साथ आध्यात्मिक, शास्त्रीय और समकालीन विषयों पर मार्गदर्शन की अपेक्षा रखते हैं।
माघ मेला ३ जनवरी से शुरू होकर १५ फरवरी (महाशिवरात्रि) तक चल रहा है। इसमें लाखों श्रद्धालु संगम स्नान, दान और कल्पवास के लिए आते हैं। प्रमुख स्नान तिथियां पौष पूर्णिमा (३ जनवरी), मकर संक्रांति (१४ जनवरी), मौनी अमावस्या (१८ जनवरी) और वसंत पंचमी (२३ जनवरी) हैं। गुप्त नवरात्रि का अनुष्ठान मेले के शुरुआती दिनों में होगा, जो १९ जनवरी से शुरू होकर २७ जनवरी तक चलेगा। यह जानकारी मुख्य रूप से आज जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित है। शंकराचार्य परंपरा माघ मेले में ऐतिहासिक रूप से मौजूद रही है, जो वेदांत, धर्मशास्त्र और सनातन मूल्यों के संरक्षण से जुड़ी है।
इस वर्ष का माघ मेला आस्था के साथ-साथ साधना की उस शांत और गंभीर परंपरा को भी सामने लाएगा, जो बड़े धार्मिक आयोजनों के उत्साह में अक्सर कम दिखाई देती है। यह वह समय है जब बाहरी भक्ति और आंतरिक साधना दोनों साथ-साथ चलती हैं।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
