रविवारीय: ज़िंदगी क्या थी?
– मनीश वर्मा ‘मनु’
ज़िंदगी तब क्या थी और अब क्या है? नई नई नौकरी लगी थी। छोटे शहर से अचानक बड़े शहर में आ गए थे। सामंजस्य बिठाने की कोशिश में लगे हुए थे। पाँच दिन का सप्ताह हुआ करता था। शनिवार और रविवार की छुट्टी। शिद्दत से इंतज़ार रहता था शुक्रवार का। शुक्रवार आते ही हम छुट्टी के मोड में आ जाते थे। दफ़्तर का समय शाम छः बजे तक का था। छ: बजते ही शर्ट पैंट के अंदर से बाहर आ जाया करता था और बाँहें ऊपर चढ़ जाया करती थीं। ऐसा महसूस होता था मानो हम अभी-अभी क़ैद से बाहर निकल आए हैं।
आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है। नौकरी करते हुए लगभग तीन दशक गुज़र गए, पर दिल तो बच्चा है जी के तर्ज़ पर आज भी शुक्रवार का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। सप्ताह के पाँच दिन और हर दिन बीस प्रतिशत नौकरी हो गई। हर दिन इसी अहसास के साथ दिन बीतता है।
एक पुरानी हवेली जो अब काफ़ी जर्जर हो चुकी है। कोई रहता नहीं है उसमें। छतों और दीवारों पर पेड़ उग आए हैं। वो भी अब काफ़ी बड़े हो गए हैं। हवेली को देखकर यह अहसास होता है कि कभी गुलज़ार रही होगी। बनाने वाले ने काफ़ी खर्च कर बड़े शौक़ से बनवाया होगा । आज अपनी क़िस्मत पर आँसू बहा रही है।
ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है—वक़्त रहते इसका लुत्फ उठा लेना चाहिए। कल को किसने देखा है ।
उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ‘ग़ालिब’,
हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है।
ग़ालिब इस शेर में उस वीरान हवेली का ज़िक्र करते हैं, जहाँ मालिक की अनुपस्थिति में दीवारों पर पेड़ उग आए हैं—कहने को तो हरियाली है, पर एक विडंबनापूर्ण बहार, जो भीतर की खालीपन को और गहरा कर देती है।
आपको भी ऐसा लग रहा होगा कि मैं क्या कह रहा हूँ। मैं ऐसा कुछ भी नहीं कह रहा हूँ जो आप समझ नहीं पा रहे हैं। मैं तो बस अपने जज़्बात, अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल रहा हूँ। यह जो मेरे अंदर धड़क रहा है, मैं तो सिर्फ उसकी ही भाषा बोल रहा हूँ। बंधन में रहना किसे पसंद है भला! कुछ मजबूरियाँ होती हैं। आपकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा उस मजबूरी की भेंट चढ़ जाता है ।
खैर! चलते हैं और कुछ और पुरानी यादों को आपसे साझा करते हैं। मुझे आज भी वो दिन याद है। कार्यालय परिसर में बने अतिथि गृह में हम सभी रहा करते थे। कमरे कहाँ थे? एक छोटा सा हॉल और राम सिंह। राम सिंह उस तथाकथित अतिथि गृह का सर्वेसर्वा जिसकी अनुमति के बिना वहाँ रहना मुश्किल। अपनी दुनिया उस परिसर के अंदर ही सीमित थी।
नौकरी के शुरुआती दिनों की बात है। एक शनिवार की सुबह जब हम कार्यालय के समय बाहर निकले तो अचानक से मेरे मुँह से निकला – अरे ! सड़क पर आज छुट्टी के दिन इतनी भीड़ क्यों है? मैं हैरान था। तभी मेरे मित्र ने कहा- अरे भाई तुम्हारी छुट्टी है इसका मतलब यह थोड़े ही है कि पूरा शहर आज छुट्टी पर है ।
बाद में जब हम सभी अतिथि गृह से बाहर निकल फ्लैट में रहने लगे तो शनिवार और रविवार का दिन या तो अपार्टमेंट के भूतल दोस्तों के साथ मिलकर क्रिकेट खेलते हुए समय व्यतीत करते या फिर दिनभर बतकही का दौर चलता रहता था। खाने पीने तक की सुध नहीं रहती थी। पत्नी पीड़ित कहना तो शायद ठीक नहीं होगा, पर कुछ सीनियर भी अपने फ्लैट पर आ जाते थे। दिनभर बकैती का सिलसिला चलता रहता था। अच्छी बात यह थी कि उस वक़्त यह जो सोशल मीडिया नाम की बला है वो नहीं थी। वो दो दिन ऐसे बीतते थे कि पूछो मत।
क्या दिन थे वे? किसी बात की कोई परवाह नहीं। बिल्कुल तनावमुक्त जीवन। हम सभी के लिए जीवन के सुनहरे दिन। काश! वो दिन और वो पल लौट कर फिर आते। गर्मियों के दिन और हममें से किसी के कमरे में पंखा नहीं है। छठे माले का अपार्टमेंट और उसके ऊपर बनी टंकी की छत पर रात में गप्पें मारते हुए सोना । कहाँ से वो दिन वापस आ सकते हैं? सही ही कहा गया है – ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा। जी भर के जी लेना चाहिए। बाक़ी तो मोह माया है। मृगतृष्णा है :-
कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥
कबीर का यह दोहा जैसे जीवन का सार कह देता है।
हम अक्सर सुखों की तलाश दूर-दूर करते रहते हैं, जबकि वे हमारे पास ही होते हैं—हमारी स्मृतियों में, हमारे संबंधों में, और उन छोटे-छोटे पलों में, जिन्हें हम व्यस्तता में अनदेखा कर देते हैं। इसलिए खुल कर जिएँ, ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ़ उठाएँ। स्वस्थ रहें, व्यस्त रहें और मस्त रहें।
