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1 thought on “रविवारीय: ठंड बाहर, सुस्ती अंदर, और  उफ़्फ़ ये दफ़्तर!

  1. श्री वर्मा जी ने सच ही सभी कामकाजी लोगों के मन की बात कह दी है। ठंड का मौसम रजाई और जिम्मेदारी के बीच रोज की जंग बन जाता है। रात में सुबह दूर लगती है, और आँख खुलते ही दफ़्तर का खयाल हथौड़े की तरह पड़ता है। रजाई रोकती है, मन बहाने गढ़ता है, पर आजीविका का तर्क सबसे भारी होता है। सुबह की चाय थोड़ी हिम्मत देती है। सड़क पर हर चेहरा ठंड, नींद और मजबूरी का मिला-जुला प्रतिबिंब दिखता है। दफ्तर पहुँचकर हीटर के पास खड़े होना क्षणिक सुख देता है, काम चलता है, पर मन अब भी घर में ही ठहरा रहता है। यही ठंड और दफ्तर का रिश्ता है, न चाहकर भी निभाया जाने वाला।

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