रविवारीय: ठंड बाहर, सुस्ती अंदर, और उफ़्फ़ ये दफ़्तर!
– मनीश वर्मा ‘मनु’
रात में सोते समय ऐसा महसूस होता है मानो सुबह होने में अभी बहुत वक़्त बाकी है। रज़ाई और कंबलों के भीतर दुबका शरीर, हीटर की गरमी, और बंद आँखें! यह सब मिलकर एक प्यारा सा भ्रम रच लेती हैं कि अलार्म की आवाज़ अभी दूर है। सुबह अभी नहीं हुई है। ठंड उस वक़्त उतनी निर्दयी नहीं लगती, जितनी सुबह की कल्पना मात्र से लगने लगती है।
पर सुबह जैसे ही आँख खुलती है, सबसे पहला ख़याल किसी हथौड़े की तरह ज़ेहन पर पड़ता है—अरे यार, समय पर दफ़्तर पहुँचना है। घड़ी की सूइयाँ मानो रात भर दौड़कर अब ठहर गई हों और हमें चिढ़ा रही हों। बाहर अँधेरा अब भी पसरा होता है, हवा में सिहरन घुली रहती है और रज़ाई और कंबलों से बाहर निकलने का विचार ही बदन में सर्द लहर दौड़ा देता है।
ठंड से जितनी सिहरन शरीर को होती है, उससे कहीं ज़्यादा सिहरन ठंड के दिनों में सुबह उठने और दफ़्तर जाने के ख़याल से होती है। यह सिहरन सिर्फ़ बदन की नहीं होती, यह मन की होती है। रज़ाई जैसे पकड़कर रोक लेना चाहती है—‘थोड़ी देर और रुक जाओ’—लेकिन ज़िम्मेदारियों की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही बुलंद होती है। कोई रास्ता नहीं है, कोई छूट नहीं है; चाहकर भी आप इस दिनचर्या से बच नहीं सकते हैं । दफ़्तर जाने की तैयारी करनी हो या फिर अपने व्यवसाय के लिए बाहर निकलना हो, निकलना तो है ही। दाल रोटी का सवाल जो है। खुद का व्यवसाय है तो थोड़ी स्वतंत्रता आपको मिल सकती है, पर छूट नहीं।
चाय बनाते हुए रसोई में भी ठंड पीछा नहीं छोड़ती। भाप उठते कप में कुछ पल की राहत मिलती है, पर बाहर निकलते ही फिर वही सर्द थपेड़े। सुबह-सुबह अख़बार की सुर्ख़ियों में जब पढ़ने को मिलता है कि बीती रात इस मौसम की सबसे ज़्यादा ठंड दर्ज की गई, तो ठंड का अहसास और तीखा हो जाता है। लगता है जैसे आँकड़े नहीं, बल्कि हमारी ही ठिठुरन छपी हो काग़ज़ पर।
सड़कों पर लोग जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाते दिखते हैं, सबके आधे चेहरे मफलरों और गर्म टोपियों में छुपे होते हैं। बस, ट्रेन, मोटरसाइकिल, पैदल या दफ़्तर की गाड़ी में बैठे हर चेहरे पर एक-सा भाव होता है—नींद, ठंड और मजबूरी का मिला-जुला सा भाव। कोई बोलता नहीं, पर सब एक-दूसरे की हालत समझते हैं।
फिर दफ़्तर… हीटर के पास खड़े होने की छोटी-सी खुशी, हाथ सेंकने की चोरी-छुपी कोशिशें और काम में मन लगाने का असफल प्रयास। ठंड बाहर रह जाती है, पर उसकी सुस्ती भीतर तक चली आती है। फिर भी फ़ाइलें खुलती हैं, कंप्यूटर ऑन होते हैं और दिन शुरू हो ही जाता है।
यही है ठंड और दफ़्तर का रिश्ता—न चाहकर भी निभाया जाने वाला, हर साल लौट आने वाला, और हर सुबह हमें हमारी मजबूरियों का एहसास कराता हुआ।
किसी ने सच ही कहा है- नौकरी ना करी और करी तो ना, ना करी॥
चलिए अब उठ जाएं, सुस्ती ना करें वर्ना दफ़्तर को देर हो जाएगी।
