रविवारीय: पूर्व का अंगकोर वाट उनाकोटि
– मनीश वर्मा ‘मनु’
उनाकोटि — स्थानीय भाषा में जिसका अर्थ है “एक करोड़ से एक कम” — त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से सड़क मार्ग से लगभग 190 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण, रहस्यमयी और मनोरम ऐतिहासिक शैव तीर्थ स्थल है। आप यहाँ रेलमार्ग से भी जा सकते हैं । निकटतम रेलवे स्टेशन धरमनगर है जो उनाकोटि से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है ।प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण घने जंगलों के मध्य अवस्थित यह स्थल पर्यटन की दृष्टिकोण के साथ ही साथ पुरातात्त्विक दृष्टि से भी अद्भुत माना जाता है। अपनी विशाल चट्टानी नक्काशियों और दिव्य वातावरण के कारण उनाकोटि को प्रायः “पूर्व का अंगकोर वाट” भी कहा जाता है।

यह स्थान विशेष रूप से चट्टानों पर उकेरे गए विशाल देवी-देवताओं के पैनलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ रॉक-कट कार्विंग तथा पत्थर की मूर्तियाँ दोनों ही प्रमुख आकर्षण हैं। अधिकांश नक्काशियाँ एक सुंदर, आकर्षक और शांत प्राकृतिक नज़ारे के बीच स्थित हैं, जहाँ चारों ओर फैली हरियाली उनाकोटि की आध्यात्मिक और कलात्मक भव्यता को और भी बढ़ा देती है। यहाँ प्राप्त प्रतिमाएँ मुख्यतः दो प्रकार की हैं — रॉक-कट आकृतियाँ तथा स्वतंत्र पत्थर की मूर्तियाँ। रॉक-कट नक्काशी में भगवान शिव का विशाल मुख तथा गणेश की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

उनाकोटि की सबसे अद्भुत कृतियों में “काल भैरव” के नाम से प्रसिद्ध शिव का विशाल शिरोभाग है, जिसकी ऊँचाई लगभग 30 फीट मानी जाती है। इसके ऊपर बना अलंकृत मुकुट लगभग 10 फीट ऊँचा है। इस विशाल शिल्प के दोनों ओर पूर्ण आकार की स्त्रैण प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं—एक ओर सिंह पर आरूढ़ दुर्गा की आकृति और दूसरी ओर एक अन्य स्त्री मूर्ति। इसके अतिरिक्त नंदी बैल की तीन विशाल मूर्तियाँ भी यहाँ आंशिक रूप से धरती में दबी हुई अवस्था में पाई गई हैं। उनाकोटि की रॉक-कट नक्काशी की विशिष्टता – इसे भारत की सबसे विशाल बेस-रिलीफ शिल्पकला में गिना जाना है।

हिंदू पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव एक करोड़ देवी-देवताओं के साथ काशी की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने इस स्थल पर रात्रि विश्राम किया। प्रस्थान से पूर्व उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आदेश दिया कि सूर्योदय से पहले तैयार होकर काशी के लिए प्रस्थान करें। किंतु प्रातःकाल होने पर कोई भी देवता समय पर नहीं तैयार हुए परिणामस्वरूप शिव अकेले ही काशी के लिए प्रस्थान कर गए और शेष देवताओं को पत्थर बनने का श्राप दे दिया। कहा जाता है कि उन पत्थर से बनी प्रतिमाओं की संख्या एक करोड़ से एक कम थी, क्योंकि शिव तो काशी की ओर प्रस्थान कर गए । इसी कारण इस स्थान का नाम “उनाकोटि” पड़ा।

एक अन्य स्थानीय लोककथा के अनुसार, कल्लू कुमार नामक एक मूर्तिकार और कुम्हार इन सभी मूर्तियों का सर्जक था। वह माता पार्वती का अनन्य भक्त था और शिव-पार्वती के साथ कैलाश जाने की अभिलाषा रखता था। पार्वती के आग्रह पर शिव ने उसे एक शर्त पर साथ ले जाने का वचन दिया—यदि वह एक ही रात में शिव की एक करोड़ मूर्तियाँ बना दे। कल्लू ने रातभर जागकर अनथक मेहनत किया, पर प्रभू की माया ,प्रातः होने तक मूर्तियों की संख्या एक करोड़ से एक कम रह गई। भगवान को अब यह बहाना मिल गया । तब शिव उसे और उसकी मूर्तियों को वहीं छोड़कर कैलाश प्रस्थान कर गए।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विद्वानों का अनुमान है कि यह स्थल संभवतः 7वीं से 9वीं शताब्दी के मध्य निर्मित हुआ होगा, किंतु इन भव्य मूर्तियों का वास्तविक निर्माता, निर्माण काल और उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। आस्था, कला और प्रकृति का अद्वितीय संगम लिए यह स्थल शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं दोनों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र है।

यहाँ प्रतिवर्ष अप्रैल माह में ‘अशोक अष्टमी’ के अवसर पर एक विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार उनाकोटि केवल एक ऐतिहासिक स्मारक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, लोककथा, शिल्पकला और प्रकृति के अद्वितीय समन्वय का जीवंत प्रतीक है।
