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February 16, 2026

3 thoughts on “रविवारीय: डिजिटल अरेस्ट

  1. माननीय सर, आपने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे गंभीर और समय-सापेक्ष विषय को अत्यंत स्पष्टता, गहराई और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। लेख केवल समस्या की ओर ध्यान नहीं दिलाता, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामियों और उनकी जड़ों पर भी सटीक प्रहार करता है। विशेष रूप से बुजुर्गों को साइबर अपराध का शिकार बनाए जाने पर आपकी चिंता समाज के प्रति आपकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह लेख जागरूकता के साथ-साथ नीति-निर्माताओं और संबंधित संस्थाओं के लिए भी एक गंभीर आत्ममंथन का संदेश देता है। अत्यंत विचारोत्तेजक और प्रशंसनीय लेख.

  2. श्री वर्मा जी का यह आलेख केवल साइबर अपराध की चर्चा नहीं करता, बल्कि डिजिटल शासन, सामाजिक संरचना और संस्थागत जवाबदेही पर एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। “डिजिटल अरेस्ट” जैसी ठगी का बार-बार सफल होना बताता है कि समस्या केवल अज्ञान या भय की नहीं, बल्कि सूचना-लीकेज, कमजोर प्रवर्तन और बढ़ते सामाजिक एकाकीपन की संयुक्त उपज है।
    सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अपराधी अंधाधुंध नहीं, बल्कि चयनित शिकार करते हैं। जब तक इस पर स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक “सावधान रहें” जैसे संदेश प्रभावहीन रहेंगे। बुजुर्गों का निशाना बनना आधुनिक समाज की एक कड़वी सच्चाई “तकनीकी निर्भरता के साथ सामाजिक दूरी” को उजागर करता है। भय वहीं जन्म लेता है जहाँ संवाद टूटता है, और यही भय अपराधी भुनाते हैं। यह आलेख सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को भी उजागर करता है। शिकायत, मनी-ट्रेल और एफआईआर के बावजूद परिणाम शून्य रहना अपराधियों के हौसले बढ़ाता है। जब तक त्वरित, दृश्य और दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, भय का संतुलन पीड़ित के पक्ष में नहीं लौटेगा।
    यह आलेख एक चेतावनी है कि अब केवल जागरूकता नहीं, बल्कि ठोस नीति, प्रभावी प्रवर्तन और कठोर जवाबदेही की आवश्यकता है। यह आम आदमी के भरोसे और डिजिटल व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है।

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