रविवारीय: डिजिटल अरेस्ट
– मनीश वर्मा ‘मनु’
आज शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब अख़बारों के पन्नों पर यह सुर्ख़ी न दिखे—“डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर अपराधियों ने लाखों रुपये ठग लिए।” चौंकाने वाली बात यह है कि इस तरह की ठगी की रकम कभी हज़ारों में नहीं होती। ज़्यादातर मामलों में यह रकम लाखों में होती है और कई मामलों में तो यह करोड़ों तक पहुँच जाती है।
यह महज़ संयोग नहीं है। यह एक सुनियोजित अपराध है, जो भय, सूचना और तकनीक—तीनों के सहारे अंजाम दिया जाता है। इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि ऐसे मामलों में शिकार बनने वाले लोग अधिकतर बुजुर्ग या सेवानिवृत्त व्यक्ति होते हैं। सवाल यह है कि साइबर अपराधियों को यह जानकारी कैसे मिलती है कि अमुक व्यक्ति के पास लिक्विड मनी है? किसे डराया जा सकता है और किससे मोटी रकम वसूली जा सकती है?
यह मान लेना भोलेपन के अलावा कुछ नहीं कि अपराधी अंधेरे में तीर चला रहे हैं। स्पष्ट है कि कहीं न कहीं हमारी बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में लीकेज है ।कोई न कोई कड़ी ऐसी है जो आम नागरिक की आर्थिक सक्षमता की सूचना इन अपराधियों तक पहुँचा रही है। जब तक इस लीकेज को चिन्हित नहीं किया जाएगा, साइबर अपराध पर लगाम लगाना असंभव है।
यह भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है कि साइबर अपराधियों के निशाने पर ज़्यादातर बुजुर्ग ही क्यों होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण मेरी नज़र में उनका एकाकीपन है। आधुनिक जीवन-शैली ने बुजुर्गों को धीरे-धीरे सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया है। परिवारों की व्यस्तता, सीमित संवाद और भावनात्मक दूरी ने उन्हें अकेला कर दिया है। ऐसे में स्मार्टफोन उनके लिए सुविधा कम और मजबूरी ज़्यादा बन गया है। वे तकनीक पर निर्भर तो हैं, पर उससे परिचित नहीं। यही तकनीकी असहायता और मानसिक भय साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।
यह और भी विडंबनापूर्ण है कि अच्छे-ख़ासे पढ़े-लिखे लोग भी साइबर ठगी का शिकार हो जाते हैं, जबकि सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक का बार-बार स्पष्ट कहना है कि डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई वैधानिक प्रक्रिया नहीं है। भारतीय क़ानून किसी को फ़ोन पर गिरफ़्तार करने या पैसे लेकर छोड़ने की अनुमति नहीं देता, फिर भी लोग डर जाते हैं। क्योंकि जब सामने वाला अदालत, सीबीआई, ईडी और जेल की भाषा में बात करता है, तो तर्क पीछे छूट जाता है और भय आगे आ जाता है।
यह स्थिति हास्यास्पद नहीं, बल्कि बहुत ही खतरनाक है।
सरकार कहती है कि साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत ही टोल-फ्री नंबर पर सूचना दें और थाने में शिकायत दर्ज कराएँ। व्यवहार में स्थिति इससे कहीं अलग है। कुछेक मामलों को अगर छोड़ दिया जाए तो ।
मेरे व्यक्तिगत नज़र में एक ऐसा ही मामला है, जहाँ शिकायत दर्ज हुई, मनी ट्रेल भी मिला, एफआईआर भी लिखी गई, परंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात। जब तक अपराधियों को वास्तव में पकड़ा नहीं जाएगा और उनके नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक उनमें भय पैदा नहीं होगा।
तेज़ी से बढ़ते साइबर अपराध यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि अब केवल जागरूकता अभियानों से काम नहीं चलेगा। अब आवश्यकता है एक ठोस और प्रभावी नीति की—जो मनी ट्रेल के आधार पर त्वरित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करे। जो बैंकिंग तंत्र में सूचना-लीकेज की जवाबदेही तय करे । अपराधियों के साथ-साथ उन्हें सहयोग देने वालों को भी कटघरे में खड़ा करे ताकि किसी व्यक्ति की ज़िंदगी भर की अर्जित पूँजी एक फ़ोन कॉल के डर से चंद मिनटों में न लुट जाए।
यह केवल साइबर अपराध का प्रश्न नहीं है बल्कि यह आम आदमी की सुरक्षा, सम्मान और भरोसे की परीक्षा है।
