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1 thought on “रविवारीय: बतकही

  1. ‘मनु की बतकही’ वस्तुतः एक पूरी पीढ़ी का जीवंत इतिहास है या कहें तो बदलावों, स्वीकारों और समय की निरंतर गति के बीच मनुष्य की सीखने-अपनाने की क्षमता का साक्षात विवरण है। ढिबरी से अत्याधुनिक लाइट तक, भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक, साबुन की बट्टी से वाशिंग मशीन तक, हर रूपांतरण को आपने जिस सहजता और आत्मीयता से याद किया, वह स्पष्ट करता है कि तकनीक केवल सुविधा नहीं देती, जीवन की सोच, आदतों और दृष्टि को भी बदल देती है। निस्संदेह, हर नई चीज़ को स्वीकारने में समय लगता है। पहले आशंका होती है, फिर सुविधा महसूस होती है, और अंततः वही वस्तु जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। निजता, मशीनें, डिजिटल जगत, ये सब नई चुनौतियाँ लेकर आते हैं, पर मनुष्य अपनी जिजीविषा से इनके साथ तालमेल बैठाना सीख ही लेता है। समग्र रूप से आपका यह अनुभव-वृत्त उस पीढ़ी का मूल्यवान साक्ष्य है जिसने दुनिया को केवल बदलते नहीं देखा, बल्कि बदलते हुए समझा भी है। तकनीक आगे भी करवटें लेती रहेगी, और आपकी ऐसी बतकही आने वाली पीढ़ियों के लिए समय की एक अनुपम धरोहर सिद्ध होगी।

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