रविवारीय: बचपन बनाम डिजिटल दुनिया
– मनीश वर्मा ‘मनु’
स्क्रीन के पीछे खोता बचपन
तब सोशल मीडिया ने अपनी दस्तक नहीं दी थी। टीवी पर भी कार्यक्रम 24 घंटे नहीं होते थे। एकमात्र दूरदर्शन हुआ करता था। प्रतिदिन रात के 8:40 का हिंदी समाचार और उसके बाद एक धारावाहिक। बस इतनी-सी ही तो दुनिया थी हमारी। हम लोग रात के खाने के बाद कभी कैरम तो कभी लूडो खेला करते थे। हम और मां एक तरफ और पिताजी और हमारी बड़ी बहन एक तरफ। बड़ा सीरियस गेम हुआ करता था। जीत का मतलब जीत और हार का मतलब हार हुआ करता था। कभी-कभी हमारे बीच शर्तें भी लगा करती थीं। बहुत बड़ी शर्तें नहीं हुआ करती थीं, बस हार और जीत के मायने हुआ करते थे। एक कॉफी या फिर दो सिंघाड़ा। समोसे तो अब हमने बोलना शुरू किया है, जब से बिहार से बाहर निकल आए हैं। बिहार और बंगाल में अब भी सिंघाड़ा शब्द ही प्रचलन में है।
इस तरह की शर्तें हुआ करती थीं, जो हारने वाले की तरफ़ से जीतने वाले पक्ष को दी जाती थीं, पर साझीदार सभी हुआ करते थे। मैंने पहले ही बताया कि सोशल मीडिया क्या बला है, हम नहीं जानते थे। मुझे याद है, शायद हमारी पीढ़ी के सभी को पता होगा कि उस समय अमूमन शाम के वक्त एक-दो घंटे के लिए बिजली चली जाया करती थी। लोड शेडिंग कहते थे। आज की पीढ़ी तो शायद ही इस शब्द से वाक़िफ़ हो। लोड शेडिंग का समय लगभग तय हुआ करता था। सिर्फ़ सब-स्टेशन से स्विच ऑन और ऑफ ही तो करना होता था। लोड शेडिंग के अनुसार ही कार्यक्रम तय हुआ करते थे। कभी-कभार किन्हीं अन्य कारणों से भी बिजली चली जाया करती थी, तब मुहल्ले के किसी युवक को जाकर पोल नंबर के साथ शिकायत दर्ज करानी पड़ती थी।
सोशल मीडिया नहीं हुआ करती थी, तो इस मसले पर सार्वजनिक तौर पर आभासी बहसबाजी में भी हम नहीं उलझते थे। बिजली जाने के बाद हम सभी को ऐसा लगता था मानो अचानक से स्वतंत्रता मिल गई हो। अगर परीक्षा का समय न हुआ तो किताबें अपनी जगह पर और हम सभी घर से बाहर सड़कों पर। क्वार्टर्स में रहा करते थे। सबके अपने-अपने ग्रुप थे। सभी घरों से निकल कर बाहर आ जाया करते थे और शाम, एक तरह से कहें तो बतकही और मटरगश्ती में गुजर जाया करती थी। किसी बात की कोई चिंता नहीं, कोई फ़िक्र नहीं। गर्मियों के दिन में कभी-कभी रात में भी लोड शेडिंग हो जाया करती थी। रात के लगभग 11:00 के बाद फिर से वही कहानी दोहराई जाती थी। किसी बात की कोई चिंता नहीं थी। बड़ी ही सहज और सरल ज़िंदगी थी हमारी।
पहले भी दिन भर के चौबीस घंटे हुआ करते थे और आज भी हैं। पहले हम समय का रोना नहीं रोया करते थे। आज अचानक से हमें समय की कमी महसूस होने लगी है, क्योंकि हमारी दिनचर्या में यह जो सोशल मीडिया है, उसने दखल बना ली है। हमारा जो क्वालिटी टाइम था, अब वह सोशल मीडिया ने ले लिया है, और यह एक नशा है—आप जैसे ही इसमें उतरते हैं, आप उतरते ही चले जाते हैं। इससे बच पाना बहुत ही मुश्किल है। बहुत ही संयम की ज़रूरत होती है। अपने आप पर नियंत्रण की ज़रूरत होती है। अगर आपने अपने आप को नियंत्रित कर लिया तो बहुत अच्छी बात है, नहीं तो आप इसमें उतरते चले जाएंगे और परिणाम बहुत सार्थक नहीं मिलने वाला। हमारी पीढ़ी के लोगों ने समाज और अपने खुद के अनुभवों से काफ़ी कुछ सीखा है। बड़े-बुजुर्गों का ज्ञान और उनका अनुभव हमारी थाती हुआ करता था। आज के जैसे हम सोशल मीडिया पर बहसों में नहीं उलझा करते थे।
अब तो वक्त काफ़ी आगे निकल चुका है। सोशल मीडिया ने आम लोगों की ज़िंदगी के हर कोने में अपनी जगह बना ली है। उसने एक ऐसा मायाजाल हमारे इर्द-गिर्द बुन दिया है कि इस मायाजाल रूपी महाजाल से बाहर निकल पाना बहुत ही मुश्किल है।
खैर! हर रात की एक सुबह होती है। जब तक चीजें पराकाष्ठा पर नहीं पहुंचतीं, तब तक उनका नीचे आ पाना या उनके नीचे आने के बारे में सोचना भी मुश्किल ही नहीं, असंभव दिखाई पड़ता है।
अब शायद वक्त आ गया है। सोशल मीडिया पर निर्भरता के नकारात्मक प्रभाव लोगों को समझ आने लगे हैं। उन पर बातचीत शुरू हो गई है। लोगों को, खासकर बच्चों को, इसके नकारात्मक प्रभाव से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। जागरूकता अभियान भी साथ-साथ चलाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया को अपनाएं, पर उस पर अपना नियंत्रण रखें, न कि उसके नियंत्रण में आप रहें। आपको चीजों को फ़िल्टर करना आना चाहिए। क्या लेना है और क्या नहीं लेना है, फर्क समझ में आना चाहिए।
“जब जागो तभी सवेरा”!
