– विवेकानंद सिंह*
मोर्स कोड और तार घर: भारतीय टेलीग्राम की कहानी
पुरानी पीढ़ी के लोगों के मस्तिष्क में आज भी भारतीय डाक एवं तार विभाग द्वारा संचालित टेलीग्राम (तार) सर्विस की स्मृतियाँ ताज़ा होंगी। क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व तक किसी को कोई सन्देश भेजने का सर्वसुलभ तरीका था, तार-घर पहुँचकर एक तार (telegram) भेजना। परन्तु कालान्तर में जब एसटीडी फ़ोन सेवा, तदुपरांत इंटरनेट और अंततः मोबाइल सेवा शुरू हो गई, तब तार भेजना पुराने ज़माने की बात हो गई। जिसके चलते भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने 15 जुलाई, 2013 को लगभग 163 वर्ष पुरानी तार सेवा को हमेशा के लिए बन्द कर दिया।
नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ अमेरिकन हिस्ट्री द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार टेलीग्राफ़ के आविष्कारक सैमुअल फिनले ब्रीज़ मोर्स ने 24 मई, 1844 को वाशिंगटन, डी. सी. से लगभग 44 मील दूर बाल्टीमोर, मैरीलैंड में अपने सहयोगी, अल्फ्रेड वेल को जब पहला टेलीग्राम, जिसमें लिखा था, “What hath God wrought?” (बाइबिल, संख्या 23:23: “ईश्वर ने क्या किया है?”), भेजा, तब दुनियाभर में तहलका मच गया था।
कोलकाता के सोहम चंद्रा के ब्लॉग वांडर्लस्ट में उपलब्ध विवरणानुसार तत्कालीन गवर्नर-जनरल ऑफ़ इण्डिया, जेम्स एंड्रयू ब्राउन-रामसे, फ़र्स्ट मार्क्वेस ऑफ़ डलहौसी के आदेशानुसार 1850 में रॉयल इंजीनियर्स के विलियम ओ’शॉघनेसी की देखरेख में अलीपुर, कलकत्ता (अब कोलकाता) से डायमंड हार्बर तक पहली लाइन बिछाने की योजना बनाई गई, जिसके कार्यशाला प्रभारी थे – शिव चंद्र नंदी, जिन्होंने 30 नवम्बर, 1851 तक लाइन बिछवा दी और डायमंड हार्बर से अपना पहला सिग्नल भेजा, जिसे ओ’शॉघनेसी ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में लॉर्ड डलहौसी की उपस्थिति में प्राप्त किया। तत्पश्चात् काम आगे बढ़ा और 27 अप्रैल, 1854 को बॉम्बे (अब मुम्बई) से पूना (अब पुणे) के लिए पहला टेलीग्राम (जिसे बाद में तार कहा जाने लगा) भेजा गया।
प्रारम्भिक दिनों में भारत में टेलीग्राम, यानी तार का प्रयोग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के महकमों, कम्पनी की सेना, इंपीरियल पुलिस या खुफ़िया विभाग के संदेशों को देश के विभिन्न हिस्सों में पहुँचाने के लिए किया जाता था। केविन स्टैंडेज के ब्लॉग, टेलीग्राफ़ मेमोरियल, दिल्ली द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1857 की देशव्यापी क्रांति को दबाने में अंग्रेज़ो की सफलता का श्रेय जिन कारकों को दिया जाता है: उनमें से एक प्रमुख कारक था – इंपीरियल टेलीग्राफ़ डिपार्टमेंट द्वारा संचालित तार-संचार माध्यम का उपयोग। यदि भारतीय क्रांतिकारियों ने इसके सामरिक महत्व को पहले ही पहचान लिया होता और इसके संचालन को पूर्णतया ध्वस्त कर दिया होता, तो भारत में ब्रिटिश शासन 1947 से नब्बे वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया होता। 10 मई, 1857 को जब मेरठ में उक्त क्रांति की शुरुआत हुई, तब दिल्ली के टेलीग्राफ़ ऑफ़िस के प्रबंधक चार्ल्स टॉड, अपने दो सहयोगी सिग्नलर्स – विलियम ब्रेंडिश और जॉन पिल्किंगटन के साथ ऑफ़िस में बैठे थे। चूंकि उस दिन रविवार था, अतः ऑफ़िस भोर से सुबह नौ बजे तक ही खुला था, ऑफ़िस बंद होने से कुछ देर पूर्व, दिल्ली से 40 मील (64 कि. मी.) उत्तर-पूर्व में स्थित मेरठ से आए एक संदेश में मेरठ छावनी में उत्पन्न अशांति का वर्णन किया गया था, दोपहर चार बजे टॉड ने पाया कि मेरठ जानेवाली टेलीग्राफ़ लाइन काट दी गई थी। उधर मेरठ में शाम को क्रांति भड़क उठी, लेकिन टेलीग्राफ़ लाइन कट जाने के कारण ख़बर दिल्ली तक नहीं पहुँच सकी। हालाँकि, आधी रात को मेरठ के पोस्टमास्टर ने आगरा में अपने रिश्तेदार को भेजे गए एक निजी टेलीग्राम में क्रांति की चेतावनी दे दी। जिसे आगरा के लेफ़्टिनेन्ट-गवर्नर, सर जॉन कॉल्विन को दिखाया गया और उन्होंने तत्कालीन राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) में बैठे गवर्नर-जनरल ऑफ़ इण्डिया, लॉर्ड कैनिंग को इसकी सूचना दे दी।
अगली सुबह, यानी 11 मई को मेरठ के क्रांतिकारी यमुना नदी पारकर दिल्ली आए और यूरोपीय बस्तियों को जला दिया और अनगिनत अंग्रेज़ों की हत्या कर दी, जिसकी सूचना ब्रेंडिश ने अम्बाला छावनी को भेज दी, उसने भेजे गए तार में लिखा कि “हमें दफ़्तर छोड़ना होगा। सारे बंगले आग की चपेट में हैं, जिसे मेरठ के सिपाहियों ने जला दिया है, हम जा रहे हैं।” बाद में यह सूचना पंजाब स्थित सभी छावनियों को भेज दी गई। चूंकि टेलीग्राफ़ लाइन अभी तक शिमला तक नहीं पहुँची थी, जहाँ भारत के कमाण्डर-इन-चीफ़, जनरल सर जॉर्ज एंसन आराम कर रहे थे। सरहिंद डिवीज़न के कमांडर, मेजर-जनरल सर हेनरी बर्नार्ड ने अपने बेटे, कैप्टन बर्नार्ड को टेलीग्राम की प्रति के साथ घोड़े पर शिमला भेजा। सूचना मिलते ही ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद, एंसन तुरन्त राहत बल की तैयारी हेतु अम्बाला के लिए रवाना हो गए। क्रांति, जिसे अंग्रेज़ों ने विद्रोह की संज्ञा दी थी, के दमन के बाद चीफ़ कमिश्नर ऑफ़ अवध, सर रॉबर्ट मोंटगोमरी ने कहा कि ‘इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ़ ने भारत को बचाया है।’ उनकी यह उक्ति दिल्ली के म्यूटिनी टेलीग्राफ़ मेमोरियल में एक शिलापट्ट पर अंकित है।
ख़ैर, 1947 में देश आज़ाद हुआ और तार सेवा, यानी टेलीग्राम, दूरसंचार सेवा की रीढ़ बन गई। चाहे जन्म, मृत्यु, शादी, नौकरी, युद्ध या दुर्घटना की सूचना हो, टेलीग्राम ने भारतीयों के जीवन के हर पहलू को छुआ। लेकिन अफ़सोस, स्मार्टफ़ोन, ईमेल और इंटरनेट के युग में, डाक सेवा की तरह टेलीग्राम भी बेमानी हो गया और अन्तत: 14 जुलाई, 2013 को रात्रि 9 बजे तक अपनी आख़िरी सेवा देने के बाद तार सेवा काल के गाल में समा गई। 16 अगस्त, 2013 को राज्यसभा में डॉ. योगेन्द्र प्रेमकृष्ण त्रिवेदी (राज्यसभा सांसद महाराष्ट्र) द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, विधि एवं न्याय मंत्री, कपिल सिब्बल (सांसद चाँदनी चौक, एनसीटी) ने बताया कि तार सेवाएँ दिनांक 15 जुलाई, 2013 से बन्द कर दी गई हैं, क्योंकि संचार के नये साधनों की उपलब्धता के कारण तार सेवा के उपयोग में कमी आ गई थी, अतः निगम को भारी घाटा का सामना करना पड़ रहा था।
तो आइए! मिलकर डेढ़ सदी पुरानी, बेहद लोकप्रिय स्वर्गीय तार सेवा को स्मरण करें और अपनी भावी पीढ़ी को बताएँ कि तार-घर क्या था?, मोर्स कोड क्या था?, इसके साथ ही तार भेजने के लिए एक फ़ॉर्म भरना पड़ता था और तार लानेवाले को डाकिया नहीं, बल्कि मैसेंजर कहा जाता था आदि-इत्यादि।
*1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लिए धन संग्रहण हेतु प्रथम मंचारोहण, विद्यालीय मंचों के साथ ही अन्य मंचों पर सक्रिय तथा रंगमंच, लोकगीत तथा लोक परंपराओं के संरक्षण हेतु प्रयत्नरत। 1857 के प्रथम चिंगारी, अमरशहीद मंगल पाण्डे की जीवनी, 1942 में हुए भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान हुई बलिया जनक्रान्ति और भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से लेकर 1947 तक की तमाम घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेख एवम् पुस्तक लेखन।
