ज़िंदगी की भागदौड़ में हमने कभी सोचा नहीं कि सुबह की चाय के लिए खोला गया दूध का प्लास्टिक पैकेट, बच्चों के रंग-बिरंगे खिलौने, या बाज़ार से लाई सब्जियों की प्लास्टिक थैली एक दिन हमारे दिल, दिमाग, और धरती के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी। लेकिन आज यही सच्चाई है। पिछले 28 सालों में पहली बार, दक्षिण कोरिया गणराज्य 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस 2025 को, प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए एक विशाल सम्मेलन आयोजित कर रहा है। दुनिया भर के विशेषज्ञ यहाँ जुटेंगे, ताकि इस संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संधि बन सके। यह सिर्फ एक सम्मेलन नहीं, बल्कि हमारी साँसों, हमारे स्वास्थ्य, और हमारी आने वाली पीढ़ियों को बचाने की एक जंग है।
प्लास्टिक का संकट अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है—यह हमारे शरीर के हर अंग को नुकसान पहुँचा रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इसे अब वैश्विक आपातकाल घोषित करना ज़रूरी है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी लैंगान हेल्थ के एक ताज़ा शोध ने खुलासा किया है कि दुनिया भर में दिल की बीमारियों से होने वाली 3.56 लाख मौतों का संबंध डाय-2-एथिलहेक्सिल फ्थैलेट (डीईएचपी) नामक रसायन से है। यह रसायन प्लास्टिक को लचीला और टिकाऊ बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह खाने-पीने के डिब्बों, बोतलों, माइक्रोवेव में इस्तेमाल होने वाले कंटेनरों, बच्चों के नरम प्लास्टिक खिलौनों, मेडिकल उपकरणों जैसे आईवी ट्यूब और ब्लड बैग, प्लास्टिक पाइपों, कीटनाशकों, डिटर्जेंट, परफ्यूम, नेल पॉलिश, और हेयर स्प्रे में मौजूद है। जब यह रसायन टूटकर सूक्ष्म कणों में बदलता है, तो हमारे शरीर में घुसकर हृदय की धमनियों में सूजन पैदा करता है, जिससे हृदय गति रुक सकती है और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारत में इसकी वजह से सबसे ज़्यादा 1,03,587 मौतें दर्ज हुई हैं, जिसके बाद चीन और जापान का नंबर आता है।
कल्पना करें, हर हफ्ते हम अपने शरीर में एक क्रेडिट कार्ड जितना माइक्रोप्लास्टिक निगल रहे हैं। तुर्की की काकुरोवा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता सेदात गुंडोडु ने 2016 से 2024 तक के अध्ययन में पाया कि हमारे दिमाग में 50% से ज़्यादा माइक्रोप्लास्टिक कण जमा हैं, जो कैंसर, दिल की बीमारियाँ, डिमेंशिया, और अल्ज़ाइमर का कारण बन सकते हैं। मैक्सिको यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैथ्यू कैंपेन ने सनसनी मचा दी, जब उन्होंने कहा कि हमारे दिमाग में 5 से 10 ग्राम माइक्रोप्लास्टिक जमा है—यानी एक प्लास्टिक चम्मच जितना! यह सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हमारा दिमाग, जो हमारी सोच और सपनों का घर है, अब प्लास्टिक का अड्डा बन रहा है।
भारत में इस संकट को गंभीरता से लेते हुए एफएसएसएआई ने सीएसआईआर, आईसीएआर, और कोच्चि के केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ मिलकर माइक्रोप्लास्टिक के विस्तार और दुष्प्रभावों का अध्ययन शुरू किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह काफी है? हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति ने इस संकट को और गहरा किया है। गाँव, कस्बों, और महानगरों में दूध, सब्जी, किराना, तेल, घी, या कोई भी तरल पदार्थ—सब कुछ प्लास्टिक की थैलियों में आता है। गर्म खाना प्लास्टिक के संपर्क में आने पर रासायनिक प्रतिक्रिया से और ज़हरीला हो जाता है, जिससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
प्लास्टिक का कचरा सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, पर्यावरण और पशु-पक्षियों के लिए भी अभिशाप है। यह हज़ारों साल तक विघटित नहीं होता। इसे जलाने से निकलने वाली ज़हरीली गैसें मिट्टी की उर्वरता को नष्ट करती हैं और मवेशियों की मौत का कारण बनती हैं। माइक्रोप्लास्टिक कण मसूड़ों और त्वचा में संक्रमण पैदा करते हैं, और आँखों में चिपककर कॉर्निया को नुकसान पहुँचा सकते हैं। सौंदर्य प्रसाधनों में मौजूद माइक्रोबीड्स त्वचा में छोटे-छोटे उभारों और संक्रमण का कारण बनते हैं। हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कण साँस के ज़रिए फेफड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं। खाद्य श्रृंखला में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी ज़हरीले रसायनों के असर को और बढ़ाती है। टूथपेस्ट, शैम्पू, और हेयर क्रीम के ज़रिए रोज़ाना 2.4 माइक्रोग्राम माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर में पहुँच रहा है। कार के टायरों से हर 100 किलोमीटर पर 20 ग्राम प्लास्टिक की धूल उड़ती है।
हर साल समुद्र में 5 से 14 मिलियन टन प्लास्टिक पहुँच रहा है, जो माइक्रोप्लास्टिक में बदलकर जलीय जीवों और फिर हमारी थाली तक पहुँचता है। समुद्र में प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक का औसत वार्षिक आँकड़ा 7.5 मिलियन टन है। जलीय पर्यावरण से माइक्रोप्लास्टिक को हटाना बेहद कठिन है, और आने वाले दिनों में माइक्रो और नैनोप्लास्टिक एक विशाल समस्या बनने वाले हैं। अनुमान है कि 2025 तक समुद्र में जलीय जीवों से ज़्यादा माइक्रोप्लास्टिक कण होंगे, और 2050 तक मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक। कोई भी जलीय जीव अब प्लास्टिक के प्रभाव से बचा नहीं है। जब हम मछली खाते हैं, तो ये कण हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं।
दुनिया के 40 देश, जैसे फ्रांस, चीन, इटली, रवांडा, और केन्या, ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन भारत में हर साल 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से केवल 9205 टन ही रिसाइकिल होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, दिल्ली में रोज़ाना 690 टन, चेन्नई में 429 टन, कोलकाता में 426 टन, और मुंबई में 408 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। आयरलैंड ने 2002 में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाकर 95% उपयोग कम कर दिया। वहाँ दुकानदारों ने वैकल्पिक बैग अपनाए, और 2007 में 22% टैक्स लगाकर उस राशि को पर्यावरण कोष में जमा किया गया। लेकिन भारत का रुख अभी समझ से परे है।
प्लास्टिक हर रूप में खतरनाक है—जल, मृदा, और वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण। इसके निर्माण में गुणवत्ता नियमों का पालन नहीं होता, और कचरे के प्रबंधन का सर्वथा अभाव है। पर्यावरण संरक्षण के लिए बने कानून किताबों की शोभा बनकर रह गए हैं। उपभोक्तावाद की संस्कृति ने इस संकट को और गहरा किया है। पेट्रोकैमिकल और जीवाश्म ईंधन उद्योगों से जुड़े देश, जैसे भारत, रूस, ईरान, चीन, सऊदी अरब, क्यूबा, और बहरीन, प्लास्टिक उत्पादन पर सख्त नियमों का विरोध करते हैं, क्योंकि इसका सीधा संबंध तेल और गैस से है। हाई एम्बिशन गठबंधन प्लास्टिक उत्पादन को सीमित करने की वकालत करता है, जबकि ग्लोबल कोएलिशन फॉर सस्टेनेबल प्लास्टिक ग्रुप इसे विकासशील देशों के लिए व्यावहारिक नहीं मानता। लेकिन इस मुद्दे पर वैश्विक सहमति मानवता के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
ज़रा उस माँ की सोचिए, जो अपने बच्चे को प्लास्टिक का खिलौना देती है, बिना यह जाने कि वह उसके नन्हे दिल को बीमार कर सकता है। उस किसान की सोचिए, जिसकी ज़मीन प्लास्टिक कचरे से बंजर हो रही है। उस मछुआरे की सोचिए, जिसकी मछलियाँ अब प्लास्टिक से भरी हैं। यह सिर्फ आँकड़ों की बात नहीं—यह हमारी ज़िंदगी, हमारे अपनों, और हमारी धरती की बात है।
दक्षिण कोरिया में हो रहा यह सम्मेलन हमारे लिए एक सुनहरा मौका है। एक छोटा सा कदम—कपड़े का थैला अपनाना, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को ना कहना, या अपने आसपास जागरूकता फैलाना—हमारी ज़िंदगी बदल सकता है। आइए, अपने बच्चों के लिए एक ऐसी दुनिया बनाएँ, जहाँ साँसें साफ हों, खाना ज़हरमुक्त हो, और समुद्र फिर से नीला हो। क्योंकि अगर हम आज नहीं बदले, तो कल सिर्फ पछतावा बचेगा।
वक्त है जागने का ! प्लास्टिक का यह ज़हर हमारी सभ्यता को निगल रहा है। हमें अपनी आदतें, अपनी सोच, और अपनी ज़िंदगी बदलनी होगी। एक कपड़े का थैला, एक स्टील की बोतल, और एक जागरूक मन—यही हमारा हथियार है। इस जंग में शामिल हों, क्योंकि यह सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य की जंग है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
