विश्व जल दिवस: 22 मार्च
— डॉ. राजेन्द्र सिंह*
पानी जैसा सत्य: मृदु भी, प्रखर भी
संस्कृत में ‘अप्’ शब्द का एक अर्थ पानी है और दूसरा अर्थ श्रद्धा। यह संयोग मात्र नहीं, बल्कि गहरा संकेत है कि सत्य का स्वभाव भी जल के समान होना चाहिए। पानी इतना मृदु होता है कि मनुष्य के शरीर के सबसे नाजुक अवयव—आंखों की पुतलियों—को भी वह नहीं चुभता। उसी के भीतर ऐसी प्रखरता भी निहित है कि वह कठोर पत्थर को भी फोड़ देता है। सत्य का स्वरूप भी यही है—एक ओर वह मन को रिझाने वाला, आनंद देने वाला, शीतल और मृदु हो; और दूसरी ओर जब संशय का छेदन करना हो, तब उतना ही तीक्ष्ण और अडिग। भारतीय ज्ञानतंत्र ने नदी और पानी के आधार पर ऐसी असंख्य कल्पनाएँ की हैं, जिनमें जीवन और सत्य के गूढ़ रहस्य समाहित हैं।
पानी कहीं का भी क्यों न हो, उसकी प्रवृत्ति समुद्र की ओर जाने की होती है। यह आवश्यक नहीं कि हर प्रकार का पानी समुद्र तक पहुँच ही जाए; फिर भी चाहे वह मेरे स्नान का जल हो या गंगा नदी में प्रवाहित जल, दोनों की गति निचान की ओर, अर्थात समुद्र की ओर ही रहती है। दोनों में एक समान नम्रता है—निम्नगतिक स्वभाव। कहीं थोड़ा-सा पानी अपनी सीमित शक्ति के कारण बीच में ही रुक जाए और किसी छोटे वृक्ष को जीवन देने में लग जाए, तो वह उसका तत्कालिक उपयोग हो सकता है; पर उसके स्वभाव और भाग्य की अंतिम दिशा समुद्र ही है। गंगा जैसी महानदियों को समुद्र तक पहुँचने का अवसर अवश्य मिलता है, पर जल का स्वभाव, चाहे वह किसी भी रूप में हो, नीचे की ओर झुकने वाला ही रहता है।
पानी पाँच फुट की ऊँचाई पर हो या पाँच हजार फुट पर, उसकी चेष्टा सदैव यही रहती है कि वह नीचे उतरे। निचले क्षेत्र को लाभ पहुँचाना ही उसका धर्म है। यदि एक लोटा पानी भी समतल भूमि पर डाल दिया जाए, तो वह भी यह प्रयास करेगा कि उससे भी नीचे कोई स्थान मिले और वह वहाँ प्रवाहित हो सके। यदि वह वहाँ तक न पहुँच पाए तो वह उसकी असमर्थता है, पर उसकी प्रवृत्ति में कोई परिवर्तन नहीं आता। इसी प्रवृत्ति को करुणा कहा गया है—अपने को झुकाकर दूसरों को लाभान्वित करना। यह नीचे उतरने की प्रक्रिया ही प्रेम और आनंद की कुंजी है। जो लोग प्रेम और आनंद की अनुभूति करना चाहते हैं, उन्हें भी इसी प्रकार नीचे उतरना सीखना होगा। जिसके लिए यह कला आ जाएगी, उसका जीवन स्वभावतः आनंदमय हो जाएगा।
पानी का एक और स्वभाव है—समानता की स्थापना। कुएँ से यदि एक बाल्टी पानी निकाल लिया जाए, तो वहाँ बने गड्ढे को भरने के लिए आसपास का पानी तुरंत दौड़ पड़ता है और क्षणभर में पुनः संतुलन स्थापित हो जाता है। यदि कुएँ में पानी बढ़ता है, तो वह चारों ओर से समान रूप से बढ़ता है; और यदि घटता है, तो सब ओर से समान रूप से घटता है। इसके विपरीत यदि अनाज के ढेर में से दो-चार सेर अनाज निकाल लिया जाए, तो वहाँ बना गड्ढा यथावत बना रहता है। बहुत हुआ तो कुछ ‘महात्मा’ दाने उस गड्ढे में कूद पड़ें, पर शेष दाने हठपूर्वक अपनी जगह बने रहते हैं और मानो तमाशा देखते रहते हैं। मनुष्य-समाज के लिए जल का यह गुण एक आदर्श है—समाज ऐसा हो जहाँ कमी और अधिकता का संतुलन स्वयं स्थापित हो जाए, जहाँ समता स्वभाव बन जाए।
हमारे देश में पानी के प्रति अत्यंत विलक्षण श्रद्धा है। नदियों को माता के रूप में देखा गया है और जहाँ-जहाँ नदियाँ हैं, वहाँ-वहाँ तीर्थक्षेत्र विकसित हुए हैं। ग्रहण और अन्य पर्वों के अवसरों पर लाखों लोग इन स्थानों पर स्नान करने पहुँचते हैं। कुंभ मेले के समय तो यह संख्या इतनी विशाल हो जाती है कि वह किसी छोटे यूरोपीय राष्ट्र की जनसंख्या से भी अधिक होती है। कुछ लोग इसे मूर्खता मानते हैं—वे कहते हैं कि गंगा में स्नान करने से कुछ प्राप्त नहीं होता, केवल धन और श्रम की हानि होती है; यह सब प्राचीन अंधश्रद्धाओं का परिणाम है। पर विचार करने की बात यह है कि इतने विशाल जनसमूह को क्या एक साथ मूर्ख कहा जा सकता है? यह परंपरा कोई एक-दो शताब्दियों की नहीं, बल्कि हजारों वर्षों—लगभग दस हजार वर्षों—से चली आ रही है। इसलिए इसे केवल ‘सनक’ कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
विज्ञान यह बताता है कि पानी हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का योग है, पर भारतीय लोकमानस इसे राम और लक्ष्मण के योग के रूप में भी देखता है। यह भिन्न दृष्टिकोण हैं, पर दोनों अपने-अपने स्थान पर अर्थपूर्ण हैं। वेदों में एक मंत्र है—
“यासां राजा वरुणो याति मध्ये, सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम्।”
अर्थात् जल में वह सत्ता निवास करती है जो मनुष्यों के सत्य और असत्य को देखती और परखती है। इसी विश्वास के आधार पर हमारे यहाँ कहा जाता है—‘जल हाथ में लेकर बोलो’। इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति जल को साक्षी मानकर वचन देता है, वह असत्य बोलने का साहस नहीं कर सकता। जल की इतनी प्रतिष्ठा इसी कारण है कि वह सत्य और असत्य के बीच भेद करने वाला माना गया है। इस सरल विश्वास को चाहे कितनी ही बार तर्क और विज्ञान से धोया जाए, फिर भी यह मिटता नहीं—जैसे किसी व्यक्ति की त्वचा का रंग बार-बार धोने पर भी नहीं बदलता, वैसे ही यह भोला विश्वास भारतीय मानस में स्थायी है।
भारत में पानी के प्रति इतनी गहरी श्रद्धा क्यों है? इसका कारण यह है कि नदियों को परमात्मा की बहती हुई करुणा के रूप में देखा गया है। नदी के तट पर रहने वाले लोग प्रतिदिन यह अनुभव करते हैं कि नदी का जल निरंतर आगे बढ़ता रहता है और पीछे से नया जल आता ही रहता है। यह एक जीवंत शिक्षा है—देते रहने से ही प्राप्ति होती रहती है। जल को ईश्वर इसलिए माना गया है कि वह किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता। नदी यह नहीं सोचती कि वह केवल गाय की प्यास बुझाए और शेर की नहीं; वह सभी को समान रूप से जल प्रदान करती है। क्योंकि वह करुणा है, और करुणा सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होती है।
“अतिष्ठन्तीनां अनिवेशनानाम्”—जल कहीं ठहरता नहीं, उसका कोई स्थायी निवास नहीं होता। इसी कारण उसे संन्यासी की उपमा दी गई है। संन्यासी सबका होता है, पर किसी का नहीं होता; उस पर किसी का अधिकार नहीं होता। उसी प्रकार जल भी सबके लिए है, पर किसी एक का स्वामित्व नहीं है। यही उसका सन्यास है, यही उसका धर्म है—निरंतर बहना, सबको तृप्त करना, और स्वयं किसी बंधन में न बंधना।
*जल पुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षक।
