– ज्ञानेन्द्र रावत*
असामान्य गर्मी ने दी बड़े जलवायु संकट की चेतावनी
2050 तक 3.5 अरब लोग झेलेंगे भीषण गर्मी
भारत में गर्मी का बढ़ता संकट अब केवल भविष्य की आशंका नहीं रह गया है, बल्कि इसके संकेत वर्ष 2026 की शुरुआत में ही दिखाई देने लगे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 10 मार्च को अधिकतम तापमान लगभग 35–37 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया, जो सामान्य से करीब 6–7 डिग्री अधिक है, जबकि न्यूनतम तापमान लगभग 18.8 डिग्री सेल्सियस रहा। इसी तरह उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान असामान्य रूप से बढ़ा हुआ है। आगरा में तापमान 37.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि राजस्थान के कई हिस्सों में मार्च की शुरुआत में ही पारा 40 डिग्री के आसपास पहुंचने लगा है। पश्चिमी भारत में भी हालात अलग नहीं हैं—अहमदाबाद में मार्च की शुरुआत में तापमान 41.2 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग सात डिग्री अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी जल्दी तापमान का इस स्तर तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि गर्मी का मौसम इस बार असामान्य रूप से लंबा और तीखा हो सकता है।
दरअसल, यह केवल कुछ शहरों की अस्थायी स्थिति नहीं है। विभिन्न शोध-अध्ययनों से संकेत मिलता है कि भारत के आधे से अधिक जिलों पर अत्यधिक गर्मी का खतरा मंडरा रहा है और देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में इसके जोखिम के दायरे में आ चुकी है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन ‘हाउ एक्सट्रीम हीट इज इंपैक्टिंग इंडिया: असेसमेंट ऑफ डिस्ट्रिक्ट लेवल हीट रिस्क-2025’ तथा ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार देश के 417 जिले उच्च जोखिम और 201 जिले मध्यम जोखिम की श्रेणी में आते हैं। अत्यधिक गर्मी के सबसे अधिक खतरे वाले राज्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरल, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं।
स्थिति का एक नया और चिंताजनक पहलू यह भी है कि उत्तर भारत के पारंपरिक रूप से शुष्क माने जाने वाले क्षेत्रों में अब तटीय इलाकों जैसी उमस महसूस होने लगी है। सिंधु और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में पिछले एक दशक की तुलना में आर्द्रता लगभग 10 प्रतिशत बढ़ गई है। दिल्ली, कानपुर, वाराणसी और जयपुर जैसे शहरों में जहां पहले आर्द्रता का स्तर लगभग 30–40 प्रतिशत के बीच रहता था, वह अब बढ़कर 40–50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे तापमान का प्रभाव और अधिक असहनीय हो जाता है।
भारत में अत्यधिक गर्मी से जुड़ा सबसे चिंताजनक रुझान अत्यधिक गर्म रातों, यानी ‘हॉट नाइट्स’, की बढ़ती संख्या है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब रात का तापमान सामान्य से अधिक बना रहता है तो मानव शरीर को दिनभर की थकान से उबरने का अवसर नहीं मिलता। इससे हीट स्ट्रोक और हृदयाघात की आशंका बढ़ जाती है तथा हृदय रोगों से जुड़ी अन्य जटिलताओं का खतरा भी बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान वृद्धि के ये प्रभाव वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने से पहले ही दिखाई देने लगेंगे। अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में लाखों घरों और कार्यालयों में कूलिंग सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों में वृद्धि हो सकती है।
भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक विकासशील देश भीषण गर्मी के बढ़ते प्रभाव से जूझ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि औद्योगिक युग के बाद वैश्विक औसत तापमान लगभग 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है तो वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग 41 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 3.5 अरब लोग, खतरनाक स्तर की गर्मी का सामना करने के लिए विवश होंगे। वर्ष 2010 में यह आंकड़ा लगभग 23 प्रतिशत था। अध्ययन के अनुसार भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस इस संकट से सर्वाधिक प्रभावित हो सकते हैं, जबकि ब्राजील और दक्षिणी सूडान जैसे देशों में तापमान वृद्धि की गति सबसे तेज रहने की आशंका है। एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के अनुसार फिजी, पापुआ न्यू गिनी और मार्शल द्वीप जैसे कई द्वीपीय देशों में भी भविष्य में गर्मी का खतरा मध्यम से उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी केवल तापमान की समस्या नहीं है, बल्कि यह बहुआयामी संकट बनती जा रही है। इससे अंग विफलता, चक्कर, सिरदर्द और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं तथा कई मामलों में यह मृत्यु का कारण भी बन सकती है। शिक्षा, कृषि, श्रम उत्पादकता, जीवन और विस्थापन पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा है, क्योंकि यह बिना स्पष्ट चेतावनी के धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है। वर्ष 2026 की शुरुआत में ही दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा और जंगलों में आग की घटनाओं ने इस खतरे की गंभीरता का संकेत दे दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट के पीछे कई कारण हैं। वर्ष 1950 के बाद से हीटवेव या लू की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार वृद्धि देखी गई है। इसके साथ ही कई विकासशील देशों में कमजोर बुनियादी ढांचा और सामाजिक-आर्थिक असमानताएं भी जोखिम को बढ़ाती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर आबादी अत्यधिक गर्मी और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि अत्यधिक गर्मी के कारण भारत में श्रम उत्पादकता में भारी कमी आ सकती है और देश की सकल घरेलू उत्पाद पर लगभग 4.5 प्रतिशत तक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने अमेरिका, चीन और भारत में वर्ष के दौरान 23 से 30 अतिरिक्त अत्यधिक गर्म दिनों की संभावना भी व्यक्त की है।
गर्मी का प्रभाव केवल शहरों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों के ग्रामीण जिलों में भी बढ़ती गर्मी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे अधिक असर खुले आसमान के नीचे काम करने वाले खेतिहर मजदूरों पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग फॉर एशिया एंड द पैसिफिक के अनुसार खेतिहर मजदूरों में हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन और गर्मी से जुड़ी बीमारियां अधिक देखी जाती हैं। छाया, स्वच्छ पेयजल और पर्याप्त विश्राम की कमी इन समस्याओं को और गंभीर बना देती है। विशेष रूप से प्रवासी और असंगठित मजदूरों के मामले में पहचान और सामाजिक सुरक्षा का अभाव भी एक बड़ी समस्या है, जिसके कारण उन्हें समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती।
गर्मी के इस बढ़ते संकट के बीच पर्यावरण संरक्षण और विशेष रूप से वृक्षों की भूमिका को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि वृक्ष स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन विकास परियोजनाओं के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है। कहीं सड़क निर्माण, कहीं पर्यटन परियोजनाएं, कहीं रेल लाइन विस्तार और कहीं पनबिजली परियोजनाओं के कारण हर वर्ष लाखों हरे-भरे पेड़ों को काटा जा रहा है। राजस्थान में ग्रीन एनर्जी परियोजनाओं के नाम पर खेजड़ी के पेड़ों की कटाई को लेकर व्यापक विरोध सामने आया है। बीकानेर के नोखा दइया में 18 जुलाई 2024 से और बीकानेर कलेक्ट्रेट परिसर में 18 जुलाई 2025 से किसान इस मुद्दे पर धरने पर बैठे हैं। दो फरवरी से शुरू हुए महापड़ाव में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी और लगभग दस हजार महिलाओं द्वारा कलश प्रदर्शन इस विरोध का प्रतीक माना जा रहा है।
महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार छंगाणी के अनुसार खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के कारण इस क्षेत्र में तापमान लगभग 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। उनके अनुसार हालात इतने बदल गए हैं कि नवंबर तक एयर कंडीशनर और पंखे चलाने पड़े और सर्दियों का मौसम लगभग महसूस ही नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि खेजड़ी के पेड़ों की कटाई इसी तरह जारी रही तो आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में गर्मी की स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है।
इस बीच एक नया खतरा अल्ट्रावायलेट रेडिएशन के रूप में भी सामने आया है। दक्षिण भारत के बंगलूरू में अल्ट्रावायलेट विकिरण के स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जहां तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। यहां अल्ट्रावायलेट रेडिएशन में 10 से 13 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अधिकारियों ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया है कि इसके मद्देनजर केरल के कई जिलों में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अलर्ट जारी किया है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके कारण सनबर्न, त्वचा संबंधी बीमारियां, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं। चेंगन्नूर, मुन्नार, पथानमथिट्टा, कोट्टाकारा, चंगनास्सेरी, ओल्लूर, पट्टानमिथिट्टा, अलपुझा, कोन्नी, थ्रीथला, मनंतावडी, कोझीकोड और पलक्कड जैसे जिलों में अल्ट्रावायलेट रेडिएशन इंडेक्स बढ़कर 7 से 8 तक पहुंच गया है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस बढ़ते संकट को देखते हुए देशों से तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। संगठन के अनुसार मौसम और जलवायु जोखिमों से जुड़ी अधिक सटीक जानकारी को निर्णय प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र में शामिल करना जरूरी है। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर योजना और सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। भारत और अन्य उच्च जोखिम वाले देशों के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि कृषि प्रणालियों को बदलकर उन्हें अत्यधिक तापमान के अनुकूल बनाना अब समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
