सभी फोटो: अजय शर्मा
– अजय शर्मा*
काशी का मोक्षद्वार और संरक्षण की चुनौती
महाश्मशान की पवित्रता और आधुनिक हस्तक्षेप

वाराणसी: काशी के मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र में स्थित जलासेन घाट भूमि महाश्मशान के मध्य जनाना घाट पर बनी मढ़ी के टूटने की घटना को लेकर इन दिनों अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यहां किसी मंदिर को नहीं तोड़ा गया है।
टूटी हुई संरचना एक मढ़ी थी, जिसकी दीवार में दिवाल की मूर्तियां स्थापित थीं। उस दीवार में माता अहिल्याबाई स्वरूप, गंगा देवी स्वरूप, गणेश जी स्वरूप तथा कुछ कलाकृति स्वरूप मूर्तियां थीं, जो क्षतिग्रस्त हुई हैं। अब इन्हें संरक्षित करने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है।

मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र के समीप यह कार्य बाढ़ के उपरांत लगभग एक से दो माह से चल रहा है। कार्य वाराणसी नगर निगम की देखरेख में हो रहा है। इससे पूर्व भी एक वर्ष पहले सफाई और पत्थर लगाने के कार्य की चर्चा हुई थी, जिसका निर्णय नगर निगम द्वारा ही लिया गया था।
मढ़ी टूटने के बाद हुए विरोध के उपरांत वाराणसी नगर निगम के महापौर अशोक तिवारी और शहर दक्षिणी विधायक नीलकंठ तिवारी ने जनता को आश्वासन दिया है कि कोई भी मंदिर नहीं टूटेगा और स्थल से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होगी। मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र में कोई नया निर्माण नहीं किया जाएगा।

मणिकर्णिका तीर्थ या महाश्मशान घाट में हुई इस घटना को दालमंडी रोड चौड़ीकरण परियोजना से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है। दोनों स्थानों के बीच लगभग आधा किलोमीटर की दूरी है। दालमंडी क्षेत्र में विकास भवनों की खरीद के माध्यम से कार्य किया जा रहा है, जहां किसी धार्मिक स्थल को क्षति नहीं पहुंचाई जा रही। वहां न तो कोई श्मशान है और न ही कोई हेरिटेज स्थल। हेरिटेज क्षेत्र मणिकर्णिका और महाश्मशान घाट ही हैं।

यह प्रश्न बार-बार उठाया जा रहा है कि मणिकर्णिका क्या है—तीर्थ, मंदिर या महाश्मशान? यही वह पवित्र भूमि है जहां सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने पुत्रधर्म और पितृधर्म का पालन किया था। काशीवासी और काशीनाथ के भक्तों को चाहिए कि वे इन तीनों तीर्थ स्थलों की महिमा और उनकी सीमाओं को स्वयं जानें, ताकि तीर्थत्व की रक्षा के लिए आवाज उठा सकें और सनातन शिवनगरी की पवित्र परंपराओं से समाज को अवगत करा सकें।
चन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार,
पै दृढ़ श्री हरिश्चन्द्र का टरै न सत्य विचार।
आनंदवन में मणिकर्णिका में एक बार स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह जीवनभर अन्य सभी तीर्थों में स्नान करने से भी अधिक फलदायी बताया गया है। वेदव्यास ने कहा है कि लिंगों में विश्वेश्वर और तीर्थों में मणिकर्णिका ही श्रेष्ठ है।
काशीखंड में मणिकर्णिका को पृथ्वी की नाभि कहा गया है—केवल पृथ्वी की नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की शुभोदया नाभि। यही वह भूमि है जहां ब्रह्मांड का उदय और लय होता है। श्रीविष्णु ने मणिकर्णिका की सीमा का वर्णन करते हुए बताया कि दक्षिण में गंगाकेशव से लेकर उत्तर में हरिश्चंद्र मंडप, पूर्व में आधी गंगा से पश्चिम में स्वर्गद्वार तक इसका विस्तार है।
पद्मपुराण के काशीरहस्य में कहा गया है कि मणिकर्णिका के तट पर भगवान विष्णु और शिव दोनों सायुज्य मुक्ति प्रदान करते हैं। यहां मृत्यु भी मंगलकारी मानी गई है। देवता स्वयं ऐसी मृत्यु की प्रशंसा करते हैं। इंद्र अपने सहस्र नेत्रों से उस जीव को देखने को आतुर रहते हैं और सूर्य अपनी किरणों से उसका सम्मान करते हैं।
अविमुक्त वाराणसी क्षेत्र के महाश्मशान में राजा हरिश्चंद्र ने अपने धर्म का पालन किया। यही उनकी कर्मभूमि और तपोभूमि रही। वर्तमान समय में इस स्थान को लेकर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में भ्रमपूर्ण प्रचार किया जा रहा है, जो सनातन समाज के हित में नहीं है।
काशीखंड में यह भी कहा गया है कि मणिकर्णिका कुंड के उत्तर हरिश्चंद्र द्वारा स्थापित हरिश्चंद्रेश्वर लिंग और हरिश्चंद्र विनायक स्थित हैं। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक हरिश्चंद्र महातीर्थ में स्नान कर हरिश्चंद्रेश्वर को प्रणाम करता है, वह सत्य से कभी विचलित नहीं होता।
अविमुक्त क्षेत्र की सीमाएं इस प्रकार बताई गई हैं—पूर्व में मणिकर्णिकेश्वर, दक्षिण में ब्रह्मेश्वर, पश्चिम में गोकर्णेश्वर और उत्तर में भारभूतेश्वर। यह क्षेत्र महाफलदायक और सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
काशी में गंगा के आगमन से पूर्व मृतकों की अस्थियों को विसर्जित करने का एक विशेष तड़ाग है, जिसे अस्थिक्षेप तड़ाग (हड़हा-बेनिया) कहा जाता है। गोकर्णेश्वर से हाटकेश्वर होते हुए इस तड़ाग पर कीकसेश्वर का दर्शन किया जाता है। यह परंपरा शास्त्रसम्मत मानी गई है।
दशाहाभ्यन्तरे यस्य गङ्गायामस्थि मज्जति।
तावत् स्वर्गे वसेत् प्रेतो यावत्तत्रास्थि तिष्ठति॥
अर्थात् यदि मृत्यु के दस दिनों के भीतर अस्थियां गंगा में विसर्जित कर दी जाएं, तो मृतात्मा उतने ही समय तक स्वर्ग में वास करती है, जितने समय तक उसकी अस्थियां गंगा जल में रहती हैं।
स्कंदपुराण में वर्णित है कि जो व्यक्ति काशी में दाह-संस्कार प्राप्त करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता और जिसकी अस्थियां गंगा में विसर्जित होती हैं, वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है। काशी में शव यात्रा को मंगल माना गया है और उसे धार्मिक उल्लास के साथ निकाला जाता है।
काशी को पृथ्वी का मनःप्रदेश कहा गया है, जबकि कुरुक्षेत्र को हृदयप्रदेश। चंद्रग्रहण के समय जब सोमांश पर केतु का प्रभाव पड़ता है, तब मानसिक असंतुलन की संभावना मानी गई है। इसी कारण सनातन परंपरा में उस समय स्नान, दान, पूजा और ईश्वराराधना का विधान किया गया है। काशी का पंचकोशात्मक क्षेत्र इस साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में जीवात्मा और परमात्मा को एक ही वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों के रूप में वर्णित किया गया है। एक पक्षी फल खाता है और दूसरा केवल देखता है। यही दृष्टा भाव मोक्ष का मार्ग है।
आज की आवश्यकताओं को देखते हुए मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र और महाश्मशान (जलासेन घाट) का जीर्णोद्धार स्वागतयोग्य है, किंतु सनातन परंपरा में कार्य से पहले स्थान की मर्यादा का ध्यान रखना अनिवार्य है। मणिकर्णिका कोई साधारण घाट या श्मशान नहीं, यह काशी का मोक्षद्वार, शिव की करुणा और तारक मंत्र की साक्षात भूमि है।
निर्माण हो, सुविधाएं हों, पर उस पावन स्थान की ऊर्जा, परंपरा और शास्त्रीय मर्यादा पर आंच न आए। विकास ऐसा हो जो तीर्थस्थान को बदले नहीं, बल्कि उस तीर्थ की पवित्रता की रक्षा और वृद्धि करे। यही सनातन दृष्टि है।
सनातन धर्मशास्त्रों में वर्णित त्रिभुवन श्रेष्ठ मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र में अनेक देव विग्रह और देव लिंग प्रतिष्ठित हैं—महेश्वर महालिंग, महाराजेश्वर महादेव, निष्पापेश्वर (लोधेश्वर), ब्रह्मनालेश्वर, ताड़केश्वर, विष्णु चरण पादुका, कार्तिकेय मूर्ति, स्वर्णज्वालेश्वर, बड़लेश्वर, परार्थलिंगेश्वर, जयेश्वर और विजयेश्वर सहित अन्य देवप्रतिष्ठाएं जैसे पुष्करेश्वर महादेव और सती माता इत्यादि मूर्ति/देवविग्रह।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या ये सभी देव विग्रह यथास्थान सुरक्षित रहेंगे? क्या महाश्मशान भूमि (जलासेन घाट) की पवित्रता यथा स्थान अक्षुण्ण रहेगी?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत और मर्यादित संरक्षण कार्यों से मिलने चाहिए।
सर्वपापहर भस्म दिव्यं ज्योतिसमप्रभम्।
सर्वक्षेमकरं पुण्यं गृहाण परमेश्वर॥
हे महेश्वर! दिव्य ज्योति स्वरूप भस्म सर्व प्रकार के पाप-ताप को हरकर कल्याण प्रदान करे।
*प्रदेश अध्यक्ष, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा एवं सनातन रक्षक दल, काशी
