$5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाम प्रकृति का भविष्य
प्रयागराज: पर्यावरणविद् और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने मानव सभ्यता के विकास के क्रम को पारिस्थितिक “धोखा” करार देते हुए कहा कि आधुनिक प्रगति का मॉडल प्रकृति और समाज दोनों को गहरे संकट की ओर ले जा रहा है। यह विचार उन्होंने मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी), प्रयागराज में स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर द्वारा आयोजित “इकोलॉजी इन्क्लूसिव इकोनॉमी” विषयक व्याख्यान में व्यक्त किए।
छात्रों और शिक्षकों से खचाखच भरे सभागार को संबोधित करते हुए डॉ. जोशी ने आधुनिक जीवनशैली की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि मानवता आज अपनी जीवनदायी पारिस्थितिकी का सौदा एक क्षणभंगुर और उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था के साथ कर रही है। उन्होंने डिजिटल व्यसन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज हमने “प्राकृतिक बुद्धिमत्ता” (नेचुरल इंटेलिजेंस ) को “कृत्रिम बुद्धिमत्ता” (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से बदल दिया है। उन्होंने टिप्पणी की, “यदि आपका फोन एक दिन के लिए आपसे छीन लिया जाए, तो आपकी सांसें फूलने लगती हैं,” जो इस बात का संकेत है कि वर्तमान पीढ़ी प्रकृति और अपनी जड़ों से कितनी दूर होती जा रही है।
डॉ. जोशी ने मानव सभ्यता के विकास की ऐतिहासिक यात्रा को भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा। उन्होंने शिकार और संग्रहण से कृषि की ओर हुए संक्रमण को बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और शारीरिक गिरावट की शुरुआत बताया। उन्होंने आधुनिक प्रगति की विडंबना की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जहां मानव आबादी आठ अरब से अधिक हो चुकी है, वहीं जिराफ और भेड़िये जैसे वन्यजीव विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने प्रकृति के व्यवसायीकरण पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पानी, जो कभी प्रकृति का मुफ्त उपहार था, अब प्लास्टिक की बोतलों में बंद होकर एक विलासिता की वस्तु बन गया है। उन्होंने आगाह किया, “हम $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की ओर तो भाग रहे हैं, लेकिन हम महासागरों में प्लास्टिक के पांच ट्रिलियन टुकड़ों की ओर भी बढ़ रहे हैं।”

डॉ. जोशी ने शैक्षणिक समुदाय से आह्वान किया कि वे केवल डिग्री और ऊंचे ‘पैकेज’ तक सीमित न रहें। उन्होंने “समावेशी पारिस्थितिकी” की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रगति का वास्तविक पैमाना उपभोग नहीं, बल्कि नदियों और मिट्टी का स्वास्थ्य होना चाहिए।
कार्यक्रम में “प्रकृति नमन दिवस” पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए पर्यावरणविद् रामबाबू तिवारीरामबाबू तिवारी ने बताया कि यह दिवस वर्ष 2023 से वसंत पंचमी के अवसर पर मनाया जा रहा है। पहले वर्ष यह पांच राज्यों के 190 स्थानों पर आयोजित हुआ। वर्ष 2024 में सात राज्यों के 214 स्थानों पर, वर्ष 2025 में दस राज्यों के 278 स्थानों पर और वर्ष 2026 में देशभर के 291 स्थानों पर प्रकृति नमन दिवस मनाया जा रहा है।
रामबाबू तिवारी ने कहा कि वसंत पंचमी का पर्यावरणीय महत्व भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के पुनर्जागरण, जैव विविधता और संतुलन का प्रतीक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एमएनएनआईटी के कार्यवाहक निदेशक प्रो. वी. के. श्रीवास्तव ने की, जबकि संचालन डॉ. समीर श्रीवास्तव ने किया। इस अवसर पर प्रो. रवि प्रकाश तिवारी, प्रो. मनीषा सचान, प्रो. दीपेश पटेल, प्रो. लक्ष्मीकांत मिश्रा, डॉ. श्रवण मिश्रा, अमित तिवारी और डॉ. शैलेंद्र मिश्रा सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
