– प्रशांत सिन्हा
सूर्य का उत्तरायण और जीवन की नई दिशा
सूर्य का उत्तरायण भारतीय जीवन-दृष्टि में केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि परिवर्तन के शाश्वत नियम की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन ही प्रकृति का मूल स्वभाव है और हर नई दिशा अपने साथ आशा, ऊर्जा और नए आरंभ की संभावनाएँ लेकर आती है। उत्तरायण का उत्सव भारतीय संस्कृति में सूर्य के उत्तर की ओर बढ़ने का प्रतीक है, जिसे मकर संक्रांति के रूप में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। संक्रांति का सीधा संबंध सूर्य से है। यह वही समय होता है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और ठंड के दिनों को विदा कहकर ग्रीष्म की ओर संकेत करता है। यह परिवर्तन केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन के हर स्तर पर नई शुरुआत और सकारात्मक सोच का संदेश देता है।
उत्तरायण को मौसमी बदलाव का प्रतीक भर नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवन के नए अध्याय से जोड़ा जाता है। यह विश्वास दिलाता है कि जैसे अंधकार के बाद प्रकाश आता है, वैसे ही कठिनाइयों के बाद अवसर जन्म लेते हैं। मकर संक्रांति, जिसे उत्तरायण की शुरुआत कहा जाता है, पूरे भारत में विविध नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। उत्तर भारत में इसे संक्रांति या पोंगल के रूप में जाना जाता है, वहीं पंजाब और हरियाणा में यह लोहड़ी के रूप में विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस दिन तिल और गुड़ का प्रसाद वितरित किया जाता है, जो सूर्य देव की पूजा और आपसी मधुरता का प्रतीक है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह पर्व कृषि प्रधान समाज के लिए फसल कटाई के उत्सव का भी संकेतक है। खेतों में की गई मेहनत का फल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता इस दिन के उत्सव में साफ झलकती है। मान्यताओं के अनुसार इसी दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत की जाती है, क्योंकि उत्तरायण को शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का काल माना जाता है।
लोहड़ी उत्तरायण का एक सजीव और ऊर्जावान रूप है, जो विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में मनाया जाता है। यह पर्व 13 जनवरी को आग के गोले जलाकर, मूंगफली, तिल और गुड़ बांटकर मनाया जाता है। आग के चारों ओर नाच-गाना, भांगड़ा और ढोल की थाप जीवन की उमंग और सामूहिक उल्लास को प्रकट करती है। लोहड़ी का उल्लेख दुल्ला भट्टी की लोककथा से भी जुड़ा है, जो समाज में कमजोर वर्गों की मदद और न्याय का प्रतीक मानी जाती है। यह उत्सव याद दिलाता है कि सर्दी की कठोरता के बाद गर्मी का आगमन निश्चित है और हर परिवर्तन अपने भीतर नई ऊर्जा समेटे होता है।

उत्तरायण का एक और आकर्षक पहलू पतंगबाजी है, जो विशेष रूप से गुजरात के उत्सवों और मकर संक्रांति के दौरान देखने को मिलती है। रंग-बिरंगी पतंगें जब आकाश में उड़ती हैं तो पूरा आसमान उत्सव का कैनवास बन जाता है। ‘काटो पतंग’ की होड़ में लोग एक-दूसरे की पतंगें काटने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस प्रतिस्पर्धा के पीछे मित्रता, उल्लास और सामूहिक आनंद की भावना निहित रहती है। पतंगबाजी स्वतंत्रता, उड़ान और ऊँचाइयों को छूने की आकांक्षा का प्रतीक बन जाती है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में आने वाली बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ना और नई ऊँचाइयों को छूना संभव है। पुरानी पतंगें कट जाती हैं, लेकिन नई पतंगें फिर से उड़ान भरने को तैयार रहती हैं, ठीक वैसे ही जैसे जीवन में पुराने अध्याय समाप्त होकर नए अवसरों का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
उत्तरायण का संदेश स्पष्ट है कि हर परिवर्तन—चाहे वह संक्रांति का सूर्योदय हो, लोहड़ी की अग्नि हो या पतंगों की उड़ान—नए लक्ष्यों और संभावनाओं के द्वार खोलता है। प्रकृति की तरह जीवन भी चक्रवत चलता है। सर्दी के बाद बसंत आता है और हार के बाद जीत। आज के समय में यह पर्व पर्यावरणीय जागरूकता का भी संकेत देता है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसमी बदलावों का महत्व और अधिक बढ़ गया है। ऐसे में उत्तरायण केवल परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन और जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। उत्तरायण मनाते हुए यह संकल्प लेना आवश्यक हो जाता है कि हम हर बदलाव को खुले मन से स्वीकार करें और नई ऊँचाइयों को छूने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ते रहें।
