क्रांति गौंड
– पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’*
जब क्रांति की गेंदों ने लिखी पाक पर जीत की कहानी
बुंदेलखंड की धूल भरी गलियों से कोलंबो के आर. प्रेमदासा स्टेडियम तक, जहां भारत-पाकिस्तान की सदी-पुरानी रंजिश हवा में तनी थी, क्रांति गौंड ने एक ऐसी कहानी लिखी, जो हर उस इंसान को प्रेरित करती है, जिसने कभी सपनों को हालात के तूफानों में लड़खड़ाते देखा।
मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के घुवारा गांव की इस लड़की ने, जिसके पास बचपन में न जूते थे, न पूरे कपड़े, न पेट भर खाना, भारत को आईसीसी महिला विश्व कप क्रिकेट 2025 में पाकिस्तान पर 88 रनों की शानदार जीत दिलाई। 10 ओवर में 20 रन देकर 3 विकेट लेने वाली क्रांति को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ चुना गया, और उनकी गेंदों ने न सिर्फ पाकिस्तानी बल्लेबाजों को धराशायी किया, बल्कि हर उस ताने को चुप कराया, जो कभी उनके सपनों पर हंसे थे। यह जीत भारत की पाकिस्तान पर 12वीं लगातार वनडे जीत थी, जिसमें विश्व कप में पांच मुकाबले शामिल हैं – 1997 में क्राइस्टचर्च में पूर्णिमा राउ का पांच विकेट, 2000 में न्यूजीलैंड में तीन विकेट की रोमांचक जीत, 2005 में कोलंबो में नौ विकेट की धमाकेदार जीत, 2009 में सिडनी में 28 रनों की रक्षा, और 2017 में डर्बी में सात विकेट की जीत। पर इस दिन, कहानी क्रांति की थी, एक ऐसी साधारण लड़की की, जिसने असाधारण जज्बे से अपने सपनों को हकीकत में बदला। जिसने अपने गांव की मिट्टी को गर्व से सिर उठाने का मौका दिया।
11 अगस्त 2003 को जन्मी क्रांति का बचपन अभावों की आग में तपा। उनके पिता, एक पुलिस मुंशी, जिन्हें कुछ अपरिहार्य कारणों से सस्पेंड कर दिया गया था। परिवार बड़ा था, छह भाई-बहनों में वह सबसे छोटी थी। एक वक्त ऐसा भी था जब पहनने के लिए पूरे कपड़े और पांव में जूते तक नहीं होते थे और खाना अधूरा था। पर उनकी आंखों में एक चमक थी – क्रिकेट की दुनिया में नाम कमाने की। गांव वाले ताने मारते, “लड़की होकर लड़कों के साथ क्रिकेट? कौन ब्याहेगा इसे?” पर क्रांति ने इन बातों को हवा में उड़ा दिया। उसके पिता उसके बाद कभी खेतों में मजदूरी करके भी परिवार का भरण पोषण करते और क्रांति के क्रिकेट के जुनून को जिंदा रखते थे।

जब बाकी लड़कियां रसोई के काम में लगी होती थीं, वह मैदान में लड़कों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेला करती थी। उस पर परिवार और समाज के ताने ऐसे गिरते थे जैसे सावन में बिना छतरी के खड़ा हो कोई। लेकिन कहते हैं, “आंधियों से डर कर कभी परिंदे उड़ना नहीं छोड़ते।” क्रांति ने भी नहीं छोड़ा। उनकी दोस्त विकासा ने गर्व से कहा, “क्रांति में हमेशा बहुत जज्बा रहा है। वे किसी से भी डरती नहीं थी। हम लोग तो लड़कों के साथ नहीं खेलते लेकिन क्रांति लड़कों के साथ टेनिस बॉल से मैच खेलती थी। जिससे उसके परिवार और पड़ोस के लोग नाराज होते थे। लेकिन वो किसी की नहीं सुनती थी। ऐसा लगता था जैसे उसने ठान लिया हो कि, मुझे क्रिकेटर ही बनना है। आज उसे भारत के लिए खेलते हुए देखते बहुत गर्व महसूस होता, आज वो हम सबके लिए प्रेरणा है।”
कोच राजीव विल्थारे ने बताया, “वह फटे-पुराने कपड़े और साधारण जूते पहनकर आई थी। मैंने उसे स्पाइक्स खरीदने के लिए 1600 रुपये दिए थे।” उस छोटे से मदद ने क्रांति को पहला कदम बढ़ाने का हौसला दिया।उसके बाद मेहनत, पसीना और संघर्ष का ऐसा दौर शुरू हुआ कि दिन-रात की पहचान मिट गई। कहते हैं कि “लोहा जितना तपता है, उतना ही निखरता है।” क्रांति भी तपती रही, निखरती रही। खेल के मैदान पर उसकी गेंदें अब बल्लेबाजों को हिला देती थीं। कोच और साथी खिलाड़ी उसकी रफ्तार और सटीकता को देख दंग रह जाते थे।
2024 में वह मुंबई इंडियंस की नेट बॉलर बनीं, फिर 2025 में यूपी वॉरियर्स ने उन्हें आईपीएल के लिए चुना। मेहनत और पसीने ने दिन-रात को एक कर दिया, और उनकी गेंदें अब बल्लेबाजों को चकमा देती थीं।

2025 क्रांति के लिए सपनों का साल बना। 11 मई को श्रीलंका के खिलाफ पहला वनडे, 13 जुलाई को इंग्लैंड के खिलाफ पहला टी20, और फिर 5 अक्टूबर को कोलंबो में भारत-पाकिस्तान का यह हाई-वोल्टेज मुकाबला। इस मैच से पहले ही तनाव की लहरें उठ रही थीं, जैसा पिछले महीने यूएई में पुरुषों के एशिया कप में हुआ था। टॉस के लिए जब कप्तान हरमनप्रीत कौर और फातिमा सना आमने-सामने आईं, तो न हाथ मिले, न मुस्कान बिखरी – बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया के निर्देश पर भारतीय खिलाड़ियों ने हैंडशेक से परहेज किया। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस बार आईसीसी में शिकायत नहीं की, पर यह खामोशी मैदान से बाहर की कड़वाहट को चीख-चीख कर बयान कर रही थी। फिर टॉस का ड्रामा हुआ – फातिमा ने टेल्स बोला, सिक्का हेड्स पर गिरा, लेकिन रेफरी शांद्रे फ्रिट्ज ने गलती से हेड्स को कॉल मान लिया और पाकिस्तान को पहले गेंदबाजी का मौका दे दिया। सोशल मीडिया पर “टॉस फिक्सिंग” का शोर मच गया, जैसे सिक्का दोनों देशों की सियासत का प्रतीक बन गया हो। मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी की, और 50 ओवर में 247/9 का स्कोर बनाया। हरलीन देओल की 46 रनों की संयमित पारी, जेमिमा रोड्रिग्स की 32 रनों की जुझारू पारी, और रिचा घोष की नाबाद 35 रनों की ताबड़तोड़ पारी ने स्कोर को मजबूती दी। 27वें ओवर में ड्रामा हुआ – जेमिमा, 2 रन पर, दीया बैग की गेंद पर विकेटकीपर सिद्रा नवाज को कैच दे बैठीं। पाकिस्तानी खिलाड़ी खुशी से उछल पड़े, लेकिन स्क्वायर-लेग अंपायर ने नो-बॉल का इशारा किया – गेंदबाज का पैर लाइन के पार था। तीसरे अंपायर ने फैसला पलटा, और जेमिमा ने फ्री-हिट पर चौका जड़ा। 20वें ओवर में मच्छरों का एक झुंड मैदान पर छा गया, जैसे कोलंबो की नमी ने कोई जादू बिखेरा हो। खिलाड़ी भागे, मैदानकर्मी कीटनाशक लेकर दौड़े, और फातिमा सना ने खुद स्प्रे छिड़ककर इस अनचाहे हमले को रोकने की कोशिश की। 15 मिनट की रुकावट के बाद भारत ने पारी को संभाला, और स्कोर 247 तक पहुंचा।
पाकिस्तान की पारी शुरू होते ही क्रांति ने कमाल दिखाया। सलामी बल्लेबाज मुनीबा अली (2) उनकी गेंद पर एलबीडब्ल्यू की अपील से बचीं, लेकिन दीप्ति शर्मा के थ्रो ने उन्हें रन-आउट कर दिया – बल्ला हवा में था, जैसे सपनों का बोझ उसे नीचे नहीं आने दे रहा। फातिमा सना ने चौथे अंपायर से तीखी बहस की, लेकिन तीसरे अंपायर केरिन क्लास्टे ने फैसला बरकरार रखा। सिद्रा अमीन ने 106 गेंदों में 81 रन बनाकर लड़ाई लड़ी, लेकिन स्नेह राणा ने उन्हें हरमनप्रीत के हाथों कैच कराया। क्रांति ने सादफ शमास, आलिया रियाज और नताली परवेज को आउट कर 3/20 लिया, जबकि दीप्ति शर्मा ने 3/45 लिया। पाकिस्तान 43 ओवर में 159 पर ढेर हो गया। मैच खत्म होने पर कोई हैंडशेक नहीं हुआ, जैसे एशिया कप की तल्खी यहाँ भी छायी रही। हरमनप्रीत ने कहा, “बहुत खुशी है, यह हम सभी के लिए बड़ा मैच था। देश में सब खुश होंगे।” फातिमा सना ने हार का विश्लेषण किया, “पावरप्ले और डेथ ओवरों में हमने बहुत रन दिए।”
पर असली सितारा क्रांति थी। प्लेयर ऑफ द मैच बनने के बाद उन्होंने कहा, “आज हमारे गांव के लोगों ने मैच देखने के लिए बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई। सब गौरव कर रहे होंगे। अब वक्त है कुछ लौटाने का, मैं चाहती हूँ कि लड़कियां बिना पैसा की चिंता किए खेल सकें। सच कहूं तो मैं इंडिया-पाकिस्तान की बातों पर ध्यान नहीं देती। मैं बस अपने काम पर ध्यान देती हूं, मेरी ड्यूटी गेंदबाजी करना है, और मैं वही करती हूँ।”
एक कहावत है “जहां चाह, वहां राह।” क्रांति के जीवन ने इस बात को बिल्कुल सच कर दिखाया। क्रांति की कहानी हमें सिखाती है कि हालात चाहे जैसे हों, अगर दिल में आग हो, तो कोई तूफान आपको रोक नहीं सकता। उनकी ज़िंदगी एक जीती-जागती मिसाल है उस कहावत की – “कठिनाइयों की धूप में जो पसीना बहाते हैं, वही सफलता की छांव पाते हैं।” आज जब वो तिरंगे के नीचे खड़ी होती है, तो उसका गांव, उसका परिवार और उसकी मिट्टी गर्व से सिर उठाकर कहती है, “ये हमारी बेटी है।”
9 वनडे में 5.14 की इकॉनमी से 18 विकेट और 12 टी20 में 8.55 की इकॉनमी से 6 विकेट – यह क्रांति की शुरुआत है। वह अब बुंदेलखंड की बेटियों की उम्मीद है, जो मां-बाप को कहते हैं, “देखो, क्रांति जैसा बनो।”
भारत, श्रीलंका पर 59 रनों की जीत के बाद, अब दो जीत के साथ पॉइंट्स टेबल के शीर्ष पर है, और 12 अक्टूबर को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अगला मुकाबला उनके सेमी-फाइनल सपने को और चमकाएगा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत से हारकर, बिना पॉइंट्स के तालिका में सबसे नीचे है, और 9 अक्टूबर को वेस्टइंडीज के खिलाफ जीत ही उनकी उम्मीद जगा सकती है।
बुन्देलखंड की धरती सदियों से वीरता और संघर्ष की गाथाओं से सराबोर रही है। रानी लक्ष्मीबाई की तलवार और महाराजा छत्रसाल की रणनीति-वीरता ने इतिहास में जो स्थान पाया, आज उसी मिट्टी की एक और बेटी ने अब खेल के मैदान पर देश का परचम लहराया है। मुझे निजी तौर पर बहुत गौरव है कि क्रांति का गांव मेरी जन्मभूमि रजौला, सागर, मध्यप्रदेश से महज 50 किलोमीटर दूर है।
*स्वतंत्र लेखक






