कभी घड़ियालों की शान, आज प्रदूषण से जूझती चम्बल
कोटा: कभी कोटा के आसपास चम्बल नदी की पहचान घड़ियालों की मौजूदगी से होती थी। वर्ष 1980 में चम्बल को राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य का दर्जा दिया गया था और उस समय इस क्षेत्र में घड़ियाल स्वाभाविक रूप से पाए जाते थे। चार दशक से अधिक समय बीतने के बाद स्थिति यह है कि अभ्यारण्य का नाम तो रिकॉर्ड में रह गया, लेकिन घड़ियाल कोटा क्षेत्र से पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं। अब चम्बल के अपेक्षाकृत कम प्रदूषित हिस्सों में कभी-कभार मगरमच्छ दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी संख्या भी बेहद सीमित रह गई है। हालिया अधिसूचना के बाद कोटा क्षेत्र में चम्बल को राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य कानून से मुक्त कर दिया गया है, जिससे इसका कानूनी सुरक्षा कवच भी समाप्त हो गया है।
जैसे-जैसे चम्बल पर अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण बढ़ता गया, वैसे-वैसे घड़ियाल पूरी तरह गायब हो गए और मगरमच्छ भी संकटापन्न स्थिति में पहुंच गए। वर्तमान में राजस्थान में धौलपुर के आगे घड़ियालों का एक ब्रीडिंग सेंटर संचालित है, जहां वे प्रजनन कर रहे हैं, लेकिन कोटा और आसपास के क्षेत्र से उनकी उपस्थिति समाप्त हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में चम्बल-यमुना संगम के इटावा स्थित पचनदा क्षेत्र में अभी भी कुछ घड़ियाल देखे जाते हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार घड़ियाल स्वच्छ जल का संकेतक प्राणी है और केवल साफ, प्रदूषण मुक्त नदी को ही अपना आवास बनाता है। यही कारण है कि चम्बल की बिगड़ती जल गुणवत्ता के साथ-साथ यह अत्यंत संवेदनशील प्राणी यहां टिक नहीं सका।
राजस्थान और मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली चम्बल नदी कभी घड़ियाल और मगरमच्छों की शान रही है। कोटा क्षेत्र में यह नदी अब सर्वाधिक प्रदूषित हिस्सों में गिनी जा रही है। इसके चलते जलीय जीवों की आबादी लगातार घट रही है और घड़ियाल तो कोटा के आसपास पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं। ऐसे में चम्बल को प्रशासनिक सुरक्षा कवच प्रदान करने की आवश्यकता और भी गंभीर हो गई है। नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए शुद्धिकरण योजनाएं वर्षों से लंबित हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावी काम नहीं हो पा रहा है। मौजूदा स्थिति में सैकड़ों गंदे नाले बिना किसी उपचार के सीधे चम्बल में गिर रहे हैं।
विडंबना यह है कि चम्बल ही कोटा शहर का प्रमुख पेयजल स्रोत है। अकेलगढ़ जल शोधन संयंत्र के माध्यम से इसी नदी से शहर को पानी की आपूर्ति की जाती है। इसके बावजूद चम्बल के अपस्ट्रीम हिस्से में भी दर्जनों गंदे नालों का पानी सीधे नदी में प्रवाहित किया जा रहा है, जो न केवल जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का भी उल्लंघन माना जा रहा है। इंदौर में जहरीले जल से हुई दुर्घटना के बाद कोटा में भी इसी तरह की आशंका जताई जा रही है।
इसी बीच केंद्र सरकार द्वारा जारी हालिया अधिसूचना में चम्बल के इस हिस्से को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य कानून से मुक्त कर दिया गया है। इसके साथ ही नदी का कानूनी सुरक्षा कवच समाप्त हो गया है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठनों को आशंका है कि कानून के हटने के बाद इस क्षेत्र में मानवीय और व्यावसायिक गतिविधियां तेज होंगी। चम्बल के किनारों पर हैंगिंग ब्रिज तक खनन बढ़ने, नदी के बीच के जंगल साफ होने और अतिक्रमण के खतरे में इजाफा होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चम्बल से किसी भी तरह का खिलवाड़ रोकने के लिए इसके किनारे मौजूद वनों को बचाना और प्रभावी शुद्धिकरण योजना लागू करना अनिवार्य है। नदी किनारे बसी अवैध बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित करने और अनियोजित विकास को रोकने की भी जरूरत बताई जा रही है।

इन्हीं मांगों को लेकर कोटा चम्बल संसद ने हाल ही में नदी के शुद्धिकरण और प्रदूषण मुक्ति के लिए राष्ट्रपति के नाम संभागीय आयुक्त को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में चम्बल को शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाने के लिए ठोस व्यवस्था की मांग की गई। चम्बल संसद के अध्यक्ष के.बी. नंदवाना, संयोजक बृजेश विजयवर्गीय और वरिष्ठ अभियंता आर.सी. गुप्ता ने कहा कि नदी और पेयजल स्रोतों की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है और उन्हें उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस संवैधानिक जिम्मेदारी का पालन करेंगी। संभागीय आयुक्त अनिल कुमार अग्रवाल ने नदी प्रदूषण की गंभीरता को समझते हुए स्थिति की समीक्षा की और अपस्ट्रीम क्षेत्र में नदी किनारे बस्तियों की सीवरेज लाइन और ट्रीटमेंट प्लांट की जांच के लिए नगर निगम और कोटा विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के साथ बैठक किए जाने का आश्वासन दिया है।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो

कोटा की शान चंबल नदी हम सब की जीवन रक्षक और हमारे भविष्य को सुरक्षित रखने और संवारने का एक मात्र माध्यम है । इसकी स्वच्छता के लिए शुद्धिकरण हेतु इसमें पड़ने वाली गंदगी और मैल नालों द्वारा रोकना प्राथमिकता का साथ अत्यंत जरूरी है । कोटा के सभी जन प्रतिनिधि और जागरूक नागरिक इसके लिए आवश्यक कदम उठाए । हमारी चंबल संसद युद्धस्तर पर प्रयासरत है । कृपया इस स्वीकार्य में अपना सर्वस्व झोंक दे ।
शंकर आसकंदानी
सदस्य चंबल संसद एवं जिलाध्यक्ष लोक अधिकार मंच कोटा
संस्थापक सूत्रधार वरिष्ठजन कल्याण समिति कोटा ।