-बृजेश विजयवर्गीय*
क्रांतिकारियों पर अपमानजनक लेखन पर सवाल
जयदयाल–मेहराब खां पर लिखे शब्दों से विवाद
कोटा: कोटा में 1857 की क्रांति के नायक लाला जयदयाल और मेहराब खां से जुड़े एक शिलालेख को लेकर विवाद सामने आया है। इस शिलालेख में इन क्रांतिकारियों के लिए प्रयुक्त शब्दों को आपत्तिजनक बताया जा रहा है और इस पर प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि 1857 का संग्राम भारतीय इतिहास की एक गौरवपूर्ण घटना है, क्योंकि उसी के बाद देश में स्वतंत्रता के संघर्ष का आंदोलन अधिक मुखर रूप में सामने आया था। उस समय कोटा सहित देश के अनेक शहरों और गांवों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह हुआ था और ब्रिटिश शासन तथा उसके सैनिकों से संघर्ष भी हुआ था।
कोटा में इसी विद्रोह के दौरान ब्रिटिश अधिकारी मेजर चार्ल्स ऐनेअस बर्टन और उसके दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अंग्रेजी शासन ने लाला जयदयाल और मेहराब खां को फांसी दे दी थी। यह कार्रवाई बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के की गई थी, क्योंकि उस समय शासन पूरी तरह अंग्रेजों के हाथ में था। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए शिलालेख में “खून पिपासु” और “बदमाश” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाना आपत्तिजनक बताया जा रहा है। इसे उस मानसिकता का उदाहरण माना जा रहा है, जिसने इस शिलालेख को लिखने या लिखवाने का काम किया।

यह भी कहा गया है कि आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान, जब केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर राष्ट्रवादी सरकारें हैं, तब भी कई दिनों तक इस विषय में प्रशासन की ओर से कोई संज्ञान नहीं लिया गया है। इस बीच राजस्थान विधानसभा का सत्र भी चल रहा है और लोकसभा की कार्यवाही भी जारी है। एक प्रमुख समाचार पत्र ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। ऐसे में यदि राजस्थान का प्रशासन इस विषय पर अनभिज्ञ बना रहता है, तो भारत सरकार से हस्तक्षेप की अपेक्षा जताई जा रही है।

भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक निधि (इंटेक) से जुड़े सदस्यों ने अपने साथियों के साथ नयापुरा स्थित उस कब्रिस्तान का दौरा किया, जहां यह शिलालेख मौजूद है। इस दौरान वहां कब्रिस्तान की देखभाल करने वाली विक्टोरिया सिंह से भी मुलाकात हुई और इस विषय पर उनसे चर्चा की गई। उन्हें इस संबंध में अपनी राय से भी अवगत कराया गया।
नयापुरा का यह स्थान ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जाता है, क्योंकि यह उस घटना से जुड़ा है जब भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश अधिकारी के खिलाफ विद्रोह किया था। इसे एक गौरवशाली इतिहास के रूप में देखा जाता है और माना जाता है कि इस इतिहास को नई पीढ़ी तक सही रूप में पहुंचाया जाना चाहिए।
साथ ही यह भी कहा गया है कि भारत सरकार इतिहास के पुनर्लेखन पर काम कर रही है और औपनिवेशिक काल की गलतियों को सुधारने के साथ-साथ गुलामी के चिन्हों को हटाने के प्रयास भी कर रही है। इन प्रयासों को जनता का व्यापक समर्थन भी प्राप्त बताया जाता है। इसी संदर्भ में यह अपेक्षा व्यक्त की जा रही है कि कोटा में मौजूद ऐसे प्रतीकों पर भी सरकार ध्यान दे और गुलामी के चिन्हों को हटाने की दिशा में कदम उठाए।
इंटेक से जुड़े लोगों ने भी इस विषय में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि गुलामी की मानसिकता को दर्शाने वाले ऐसे शिलालेख को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका सुझाव है कि या तो इस शिलालेख में आवश्यक संशोधन किया जाए, या इसके पास ही एक ऐसा नया बोर्ड लगाया जाए जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं की सही जानकारी दी जाए और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान सुरक्षित रखा जाए।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक
