कोटा चिड़ियाघर
कोटा: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सेंट्रल जोनल बेंच, भोपाल ने कोटा चिड़ियाघर की वन भूमि पर प्रस्तावित खेल परिसर के लिए पेड़ों की कटाई और भूमि अधिग्रहण के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव, कोटा जिला कलेक्टर, कोटा वन विभाग, कोटा विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह कार्रवाई भीलवाड़ा निवासी पर्यावरणविद और पीपल फॉर एनिमल्स के प्रदेश प्रभारी बाबूलाल जाजू की जनहित याचिका पर की गई, जिसे अधिवक्ता लोकेंद्र सिंह कछावा ने दायर किया था। याचिका में कोटा चिड़ियाघर के 105 साल पुराने पेड़ों और हॉर्नबिल, बुलबुल, सनबर्ड, प्रिनिया, विवेर, एग्रेस्ट जैसी लुप्तप्राय व संरक्षित पक्षी प्रजातियों के संरक्षण की मांग की गई है।
चिड़ियाघर का ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्व
याचिकाकर्ता जाजू ने बताया कि कोटा चिड़ियाघर की स्थापना 1905 में कोटा के महाराजा द्वारा की गई थी, और यह हाडोती क्षेत्र का एकमात्र चिड़ियाघर है। 1954 से राजस्थान वन विभाग इसका संचालन कर रहा है। चिड़ियाघर में सैकड़ों 100 साल से अधिक पुराने पेड़ हैं, जो हॉर्नबिल, बुलबुल, सनबर्ड, प्रिनिया, विवेर, और एग्रेस्ट जैसी लुप्तप्राय पक्षी प्रजातियों का निवास स्थान हैं। यह वन क्षेत्र, जो एक सदी से अधिक समय में विकसित हुआ, क्षेत्र की जैव-विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जाजू ने कोटा विकास प्राधिकरण (केडीए) के उस प्रस्ताव को मनमाना, अन्यायपूर्ण और पर्यावरण के खिलाफ बताया, जिसमें चिड़ियाघर की वन भूमि को खेल परिसर के लिए अधिग्रहित करने की योजना है। उन्होंने चेतावनी दी कि पेड़ों की कटाई से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होगी, पक्षियों का बसेरा उजड़ेगा, और क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र, जिसे विकसित होने में सदी से अधिक समय लगा, पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
एनजीटी की कार्रवाई और प्रक्रियात्मक निर्देश
एनजीटी की पीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति शिवकुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और डॉ. अफरोज अहमद (विशेषज्ञ सदस्य) शामिल थे, ने मामले में पर्यावरणीय मुद्दों की गंभीरता को स्वीकार किया। पीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। जवाब ई-फाइलिंग पोर्टल के माध्यम से सर्चेबल पीडीएफ या ओसीआर सपोर्ट पीडीएफ प्रारूप में जमा करना होगा, इमेज पीडीएफ स्वीकार नहीं होगा। याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह नोटिस और याचिका की प्रति प्रतिवादियों को डाक और उपलब्ध ईमेल (यदि कोई हो) के माध्यम से भेजे। साथ ही, याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर समिति और प्रतिवादियों को याचिका और संबंधित दस्तावेज प्रदान करने और सेवा पूर्ण होने का शपथ पत्र दाखिल करने का आदेश दिया गया।
संयुक्त समिति का गठन और जांच
मामले की जांच के लिए एनजीटी ने एक संयुक्त समिति गठित की, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
1. राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा नामित एक प्रतिनिधि।
2. कोटा संभाग आयुक्त, राजस्थान द्वारा नामित एक प्रतिनिधि।
3. राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव द्वारा नामित एक प्रतिनिधि।
समिति को छह सप्ताह के भीतर चिड़ियाघर स्थल का दौरा कर तथ्यात्मक और कार्रवाई रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया। राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को समन्वय और लॉजिस्टिक समर्थन के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त किया गया है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पक्षकार बनाने का आदेश
एनजीटी ने पाया कि याचिका में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को प्रतिवादी के रूप में शामिल नहीं किया गया था। इसे आवश्यक और उचित पक्षकार मानते हुए, बोर्ड को प्रतिवादी संख्या 6 के रूप में तत्काल जोड़ने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता को 26 मई 2025 को इसके लिए आवश्यक कदम उठाने का आदेश दिया गया। मामले की अगली सुनवाई 26 अगस्त 2025 को निर्धारित की गई है।
पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदाय का विरोध
नयापुरा स्थित हरे-भरे कोटा चिड़ियाघर में खेल परिसर बनाने की कोटा विकास प्राधिकरण की योजना का पर्यावरण और वन्यजीव प्रेमियों ने कड़ा विरोध किया है। शुक्रवार 16 मई 2025 को चिड़ियाघर परिसर में एकत्र हुए पर्यावरण प्रेमियों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तत्काल हस्तक्षेप कर इस योजना को रोकने की मांग की थी। उन्होंने इस परियोजना को ऐसी जगह स्थानांतरित करने की अपील की थी, जहां पर्यावरण को नुकसान न हो। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक निधि (इंटैक) के कन्वीनर निखिलेश सेठी ने चिड़ियाघर को ऐतिहासिक और पर्यावरणीय धरोहर बताते हुए सरकार से इसे बचाने की गुहार लगाई थी। उन्होंने घोषणा की थी कि पर्यावरण संस्थाओं का एक प्रतिनिधिमंडल शीघ्र ही लोकसभा अध्यक्ष और जिला कलेक्टर से मिलकर इस योजना को अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग करेगा।
नेचर प्रमोटर ए.एच. जैदी ने बताया कि 105 साल पुराना कोटा चिड़ियाघर सैकड़ों प्रजातियों के हरे-भरे वृक्षों का घर है। नयापुरा के इस हरे-भरे हृदय स्थल पर पुराने वृक्ष शहर के तापमान को नियंत्रित करने में सहायक हैं। शहर को रहने योग्य बनाए रखने के लिए सीमेंट-कंक्रीट संरचनाओं को छोड़कर ऑक्सीजन और नमी प्रदान करने वाले पेड़ों को बचाना होगा। चिड़ियाघर में अनेक विशिष्ट पक्षी, लंगूर, घड़ियाल, और मगरमच्छ बसेरा बनाए हुए हैं।
संस्था के अध्यक्ष डॉ. सुधीर गुप्ता ने सुझाव दिया कि चिड़ियाघर को वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर और मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के बुकिंग स्थल के रूप में संरक्षित किया जाए। अरण्य प्रहरी अधीनस्थ वन कर्मचारी संघ के निर्देशक जसवंत सिंह तंवर ने आश्चर्य जताया कि वन विभाग के अधिकारी इस प्राचीन चिड़ियाघर को बचाने के लिए प्रयास क्यों नहीं कर रहे। उन्होंने कोटा विकास प्राधिकरण को आगाह किया कि यहां सीमेंट-कंक्रीट संरचनाएं न बनाई जाएं। इंटैक के सदस्य अनिल शर्मा ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ जन जागृति अभियान चलाने की बात कही। वरिष्ठ वन्यजीव छायाकार डी.के. शर्मा ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला स्वयं पर्यावरण प्रेमी हैं और पेड़ों को बचाने में सहायक रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि कौन से अधिकारी उन्हें गुमराह कर रहे हैं, जिन्हें बेनकाब किया जाना चाहिए। वन्यजीव छायाकार मनीष आर्य ने कोटा विकास प्राधिकरण की इस योजना को पर्यावरण के लिए घातक बताते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की थी। वैद्य डॉ. सुधींद्र श्रंगी ने बताया कि चिड़ियाघर में कैंट जैसे दुर्लभ औषधीय महत्व के पेड़ हैं। पगमार्क संस्थान के देववृत हाडा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पर्यावरण गतिविधियों के महानगर प्रमुख वेद प्रकाश गुप्ता, डॉ. पृथ्वी पाल सिंह, पूर्व वन अधिकारी बिम्बाधर शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार धीरज गुप्ता, सुशील सिंह, संजय पारीक, डॉ. विनीत महोबिया, आर्किटेक्ट ज्योति सक्सेना, पूर्व अभियंता भुवनेश सिंघल, शेख जुनैद, मनीष त्रिपाठी, और अमित जैन ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने संघर्ष समिति गठित करने और संस्थान की शीघ्र बैठक आयोजित करने की बात कही थी। राष्ट्रीय जल बिरादरी, कोटा एनवायरमेंटल सैनिटेशन सोसाइटी, और बाघ-चीता मित्र जैसे संगठनों के सदस्यों ने भी विचार व्यक्त किए थे।
पर्यावरण संरक्षण का सवाल
कोटा चिड़ियाघर का मामला पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। जाजू की याचिका और स्थानीय पर्यावरणविदों के विरोध ने यह सवाल उठाया कि क्या विकास परियोजनाओं को पर्यावरण की कीमत पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। एनजीटी का यह आदेश और स्थानीय समुदाय का सक्रिय विरोध कोटा की जैव-विविधता और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सकारात्मक कदम है।
*स्वतंत्र पत्रकार


पर्यावरणविद श्री बाबूलाल जाजू और एडवोकेट श्री लोकेंद्र सिंह कछावा को साधुवाद जिन्होंने इस मामले को NGT तक पहुंचाया। हम अपने संयुक्त प्रयासों से कोटा शहर के 120 वर्ष पुराने चिड़ियाघर को बचाने में अवश्य सफल होंगे ।