पुस्तक समीक्षा: कोलकाता मेरी नजर से
– जलज मिश्र
पुस्तक शीर्षक: कोलकाता मेरी नजर से
रचना-पद्धति: यात्रा-वृत्तांत
लेखक: मनीश वर्मा ‘मनु’
प्रकाशक: नोवेल्टी एंड कंपनी, पटना
कोलकाता नहीं, एक जीवंत अहसास की किताब
आधुनिक हिंदी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत केवल भौगोलिक वर्णन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह सांस्कृतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयामों का भी गहन अन्वेषण करने लगा है। इसी परिप्रेक्ष्य में मनीश वर्मा ‘मनु’ द्वारा लिखित पुस्तक कोलकाता मेरी नजर से एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में उभरती है, जिसमें लेखक ने कोलकाता को बहुआयामी दृष्टि से देखने और समझने का प्रयास किया है। यह कृति पारंपरिक यात्रा-वृत्तांत की सीमाओं को लांघते हुए संस्मरण, सांस्कृतिक अध्ययन और आत्मानुभूति का समन्वित रूप प्रस्तुत करती है।

कोलकाता मेरी नजर से केवल एक शहर का वर्णन नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभूति का साक्षात्कार है। मेरे दृष्टिकोण से यह कृति इस बात का सशक्त उदाहरण है कि किसी भी स्थान का वास्तविक चित्रण उसके भौगोलिक या ऐतिहासिक विवरणों से नहीं, बल्कि लेखक की संवेदनशीलता और आत्मीय जुड़ाव से उभरता है। कोलकाता यहाँ एक निर्जीव नगर नहीं, बल्कि लेखक द्वारा उसका मानवीकरण करते हुये एक सजीव, संवेदनशील और आत्मीय व्यक्तित्व के रूप में उकेरा गया है। लेखक ने इस शहर को एक ऐसे मित्र के रूप में प्रस्तुत किया है, जो धैर्यवान, स्नेही और समझदार है। यह दृष्टि पाठक को शहर से जोड़ती है और उसे केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बना देती है।
लेखक ने बड़े ही सरल शब्दों में कोलकाता शहर के बारे में आत्मिक अनुभवों को अभिव्यक्त किया है। यही कारण है कि पुस्तक पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो हम स्वयं कोलकाता की गलियों, घाटों और चैराहों पर घूम रहे हों। हावड़ा ब्रिज, इंडिया कॉफी हाउस, कालीघाट मंदिर जैसे स्थान केवल स्थल नहीं रह जाते, बल्कि वे भावनाओं और स्मृतियों के केंद्र बन जाते हैं। इस कृति में कोलकाता की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक जीवन का भी अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। बंगाल की परंपराएँ, त्योहार, चाय की दुकानों पर होने वाली चर्चाएँ और फुटबॉल के प्रति लोगों का जुनून ये सभी इस शहर को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। पीली टैक्सी में बैठने का अहसास हो या नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा को संजोए हुये एक विशाल स्मृति भंडार के रूप में शहर का चित्रण हो, शांति निकेतन को जीवन दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करना हो या विभिन्न मंदिरों के माध्यम से धार्मिक विरासत की समृद्धता का वर्णन हो, पारंपरिक शादियों में भव्यता व सांस्कृतिक गहराई का प्रकटन हो या बंगाली आतिथ्य में ‘अतिथि देवो भव‘ का साकार रूप दर्शन हो, यही इस कृति की संवेदनात्मक गहराई व विशेषता है।
मनीश वर्मा ‘मनु’ ने कोलकाता मेरी नजर से में हाथ रिक्शा के प्रसंग को अत्यंत संवेदनशील दृष्टि से प्रस्तुत किया है। कोलकाता के इस यथार्थ को वे केवल एक परिवहन व्यवस्था के रूप में नहीं बल्कि मानवीय श्रम, विवशता और सामाजिक विषमता के प्रतीक के रूप में देखते हैं। यद्यपि कि लेखक ने करुणा और संवेदना को प्रभावी ढंग से उकेरा है, किंतु विश्लेषणात्मक गहराई अपेक्षाकृत सीमित होने पर भी यह वर्णन पाठक को भीतर तक स्पर्श करने में पूर्णतः सफल रहता है।
पुस्तक को पढ़ते समय मुझे बार-बार यह अनुभूति हुई कि यह केवल एक शहर का वर्णन नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव का शब्दचित्र है। लेखक ने कोलकाता को जिस आत्मीयता से देखा है, वह उनकी इस पंक्ति में स्पष्ट झलकता है-“कोलकाता सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक अहसास है। इस शहर की सबसे खास बात यह है कि यह आपको अपनाने के लिये किसी बड़ी शर्त का इंतजार नहीं करता-बस एक शर्त होती है, इसकी भाषा, इसकी आत्मा को समझने और अपनाने की। आपने जहां इसकी भाषा को अपनाया, उसे अंगीकार किया, इसकी आत्मा को समझा फिर तो यह शहर आपके लिये पलक पांवडे बिछा देता है।”
निष्कर्षतः कोलकाता मेरी नजर से एक ऐसी कृति है जो पाठक को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि उसे एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाती है। पुस्तक में कोलकाता का चित्रण केवल एक महानगर के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई के रूप में किया गया है। साथ ही शहरी जीवन की गति और संघर्ष, ऐतिहासिक विरासत और औपनिवेशिक प्रभाव, जनजीवन की संवेदनशीलता, बौद्धिकता एवं साहित्यिक परंपरा आदि सभी पहलुओं को भी एक समग्र दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
मेरी दृष्टि में कोलकाता मेरी नजर से एक ऐसी कृति है जो बाहरी यात्रा को आंतरिक अनुभव में रूपांतरित कर देती है। यहाँ कोलकाता एक
“स्थान” न होकर एक “अनुभव” बन जाता है। लेखक की भाषा में प्रवाह, सहजता और आत्मीयता का अद्भुत संतुलन है। शैली वर्णनात्मक होते हुए भी भावात्मक गहराई से युक्त है। विशेष रूप से यात्रा-वृत्तांत में आत्मानुभूति का प्रभावी समावेश पाठक को जोड़कर रखता है। श्री मनीष वर्मा ‘मनु‘ की यह कृति इस तथ्य को स्थापित करती है कि किसी शहर को समझना उसके भूगोल को जानना नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को अनुभव करना है।
