चमचमाती सड़कों पर हादसे क्या बयां कर रहे हैं?
खूनी सड़कें विकास का दर्पण नहीं हो सकतीं। चमचमाती सड़कें, जिन्हें हम प्रगति का प्रतीक मानते हैं, आज हादसों की चीख बन गई हैं। क्या ये सड़कें, जो यात्रा की दूरी कम करती हैं, वास्तव में आधुनिक मोक्ष मार्ग बन रही हैं? हिमाचल प्रदेश में एक परिवार का इकलौता बेटा, जो रात में काम से लौट रहा था, बाढ़ से टूटी सड़क पर एक ओवरलोड ट्रक की चपेट में आ गया। “वह हमारा भविष्य था,” उसकी माँ रुंधे गले से कहती है, आँखें दर्द से भरी। उत्तराखंड में एक ड्राइवर की गाड़ी भूस्खलन के मलबे में फँसकर पलट गई, और उसकी साँसें हमेशा के लिए थम गईं। ये अनाम चेहरे उन लाखों की पुकार हैं, जो भारत की सड़कों पर मौत का शिकार हो रहे हैं।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी सड़कों की गुणवत्ता को लेकर चिंतित हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसों की बढ़ती संख्या—रोज़ाना लगभग ५०० मौतें—एक गंभीर सवाल उठाती है: क्या हमारी सड़कें जोखिम-मुक्त हैं?
सड़क हादसों का उच्च तकनीकी सड़कों से कोई सीधा संबंध नहीं। सड़कें जोखिम-मुक्त होनी चाहिए, जो महत्वपूर्ण है। जहां सड़कें बनती हैं, वहाँ अनियोजित शहरीकरण के कारण आबादी किनारे सिमट आती है। इस पर कितनी किसी भी सरकारी एजेंसी का नियंत्रण नहीं है।बाईपास पर बाईपास बनते जाते हैं, शहरीकरण का अनावश्यक विस्तार भी इन हादसों का बहुत बड़ा कारण है। हर शहर की यही कहानी है।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, २०२३ में १,७२,००० लोग सड़क हादसों में मारे गए, जिनमें युवा पुरुष (१५-२९ वर्ष) ८६ प्रतिशत और दोपहिया वाहन चालक ५० प्रतिशत थे (केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय २०२३)। विश्व स्वास्थ्य संगठन (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की २०२३ की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर १.१९ मिलियन लोग सड़क हादसों में मरते हैं, जिनमें भारत का हिस्सा १२ प्रतिशत है (विश्व स्वास्थ्य संगठन २०२३)।
बाढ़ और भूस्खलन इस त्रासदी को और गंभीर बनाते हैं। २०२३ में हिमाचल प्रदेश में १,३०० सड़कें बंद हुईं, ४० पुल बह गए, और १०७ मौतें सड़क हादसों से हुईं, ज्यादातर बाढ़ से बने गड्ढों और मलबे के कारण। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के २०२३ के आँकड़ों के मुताबिक भारत में २०२३ में बाढ़ और भूस्खलन से २,०३८ लोग मारे गए, जिसमें बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग सबसे कमजोर थे। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के वर्ष २०२२ के आँकड़ों के मुताबिक २०१७-२०२२ में गड्ढों से १२,०००-१५,००० हादसे और ३,०००-४,००० मौतें हुईं, जो बाढ़ के बाद और बढ़ जाते हैं।
कहते हैं कि सड़कें विकास का दर्पण हैं, लेकिन खूनी सड़कों पर क्या कहें? यह धारणा कि सड़कें बनने से विकास स्वतः होता है, एक भ्रामक झूठ है। सड़क हादसों को रोकने के लिए विकसित तकनीकी समाधान—जैसे हादसा-रोकथाम सेंसर—लगभग फेल हो चुके हैं। नशे में वाहन चालन एक प्रमुख कारण है, और इसे रोकने के लिए सख्त कदम ज़रूरी हैं। सड़कों के किनारे शराब की दुकानें तुरंत बंद होनी चाहिए। टोल नाकों पर उच्च तकनीक सेंसर हैं, तो नशा-जाँच सेंसर क्यों नहीं? कोई वाहन चालक शराब पीकर टोल से न निकल सके, यह सुनिश्चित हो। सड़कों पर आवारा जानवरों का नियंत्रण सरकार की इच्छाशक्ति से संभव है। जब विशिष्ट व्यक्तियों के काफिले निकलते हैं, तो पुलिस जानवरों को खदेड़ने में तत्पर होती है। आम दिनों में यह क्यों नहीं होता? यदि पुलिस इसे नियमित नहीं कर सकती, तो टोल वसूलने वाली कंपनियों को जवाबदेह बनाया जाए कि कोई जानवर या अतिक्रमण सड़क पर न हो।
इसके लिए अतिरिक्त मानव संसाधन की ज़रूरत हो, तो वह लगाया जाए। रेलवे की तर्ज पर, जैसे पटरियों की सुरक्षा के लिए कर्मचारी तैनात होते हैं, वैसे ही सड़कों पर गश्ती कर्मचारी हों। यह न सिर्फ जानें बचाएगा, बल्कि रोजगार के अवसर भी देगा। टोल टैक्स की भारी राशि वसूली जा रही है, तो यात्रियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी सरकार और टोल कंपनियों की है। इन व्यावहारिक कदमों से सड़क हादसों में ५० प्रतिशत कमी आ सकती है, और इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की जटिल तकनीक की ज़रूरत नहीं। रात में यात्रा टालना टालना असंभव है पर ज्यादातर हादसे रात या तड़के होते हैं, जब मदद मुश्किल होती है। दिन में मदद आसान होती है। यह यात्रियों और वाहन चालकों के विवेक पर निर्भर है, क्योंकि सरकार इसमें सीमित भूमिका निभा सकती है। ओवरलोड वाहनों को टोल नाकों पर सख्ती से रोका जाए। अनावश्यक गतिरोधों की समीक्षा हो। मोटर वाहन संशोधन अधिनियम २०१९ ने सजा को सख्त किया, लेकिन गति, नशा, और खराब सड़कों का कहर जारी है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बाढ़ और भूस्खलन के लिए चेतावनी सिस्टम पर काम कर रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कम है।
हर मौत एक परिवार को तोड़ देती है—एक बेटा, जो कभी घर नहीं लौटा; एक ड्राइवर, जिसके सपने मलबे में दफन हो गए। ये सिर्फ संख्याएँ नहीं, टूटे दिलों की गूँज हैं। सरकार कुछ करे या न करे, हम नागरिकों को अपनी सुरक्षा खुद तय करनी होगी। टोल वसूलने वाली कंपनियाँ सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लें। सड़कें जीवन का हिस्सा बनें, मौत का नहीं।
*स्वतंत्र पत्रकार

