– डॉ राजेन्द्र सिंह*
खनन मुक्त अरावली: नदियों का पुनरुज्जीवन जरूरी
13 फरवरी 2026 को अरावली पर्वत और उसकी नदियों के संबंध को समझने हेतु दिन भर युवाओं, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के साथ यात्रा की। इस दौरान हमने नदी और पहाड़ के गहरे संबंध को विस्तार से समझा। इस यात्रा की शुरुआत महेश्वरा नदी, जिला करौली, केला देवी वन क्षेत्र के खिजूरा गांव से हुई। पहाड़ नदी के जल स्रोत कैसे बनते हैं, अर्थात् पहाड़ हमारी मां के स्तन की तरह पोषण कैसे करते हैं? यह सब खिजूरा गांव के ताल पर प्रत्यक्ष उदाहरण के माध्यम से समझाया गया।

पर्वत को जब जंगल की हरियाली और मिट्टी की खुशहाली मिलती है, तो उसकी नमी अनेक हरे-भरे जंगलों को पोषित करती है। ये जंगल वर्षा के पानी को अपने पत्तों से रोककर जड़ों में संचित करते हैं। वही पानी पहाड़ियों की झीरों और दरारों से रिसकर नीचे आता है और हमें जीवन व पेयजल के रूप में प्राप्त होता है। जैसे मां के स्तन से दूध निकलकर बच्चे का पेट भरता है, वैसे ही पर्वत वर्षा जल को अपने भीतर सहेजकर भूजल भंडारों को भरते रहते हैं। पहाड़ों के जंगल बादलों को आकर्षित कर वर्षा में सहायक होते हैं; अन्यथा बादल बिना बरसे आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार पहाड़ हमारे पोषण और जलवायु निर्माण में मां के समान भूमिका निभाते हैं।
यह जलवायु पहाड़ों से बनती है और वही जलवायु उन्हें स्वस्थ भी रखती है। प्रकृति की यह पहाड़ी व्यवस्था हमारे जीवन को स्वस्थ रखने में सबसे बड़ी सहायक है। लेकिन जब पहाड़ों को काट दिया जाता है, तो उनके भीतर की जलधाराएं भी कट जाती हैं और हमें पोषण देने वाला जल उपलब्ध नहीं होता। इसलिए पहाड़ों को खनन मुक्त रखकर, हरा-भरा बनाकर और मिट्टी की खुशहाली बनाए रखकर ही हम अपने जीवन को समृद्ध रख सकते हैं। पहाड़ों की हरियाली और हमारे जीवन की खुशहाली का गहरा संबंध है। जब तक पहाड़ों के साथ हमारा प्रेम और सम्मान का रिश्ता बना रहता है, तब तक हमारा जीवन भी सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य से परिपूर्ण रहता है। जब हम लालच में आकर पहाड़ों को काटकर बेचने लगते हैं या सोने का अंडा पाने के लोभ में उनका शोषण करते हैं, तो उसका दुष्परिणाम हमें ही भुगतना पड़ता है। इसलिए पहाड़ों का संरक्षण हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। पुराने पहाड़ों में अनेक खनिज संपदाएं मिलती हैं, जो भूमि के लिए उपयोगी हैं। किंतु जो लोग अगली पीढ़ी के लिए भी प्रकृति को सुरक्षित रखना चाहते हैं, वे खनन से बचते हैं और मानते हैं कि जैसे पहाड़ हमें मिले, वैसे ही आगे सौंपे जाएं।

खिजूरा गांव के ताल पर पहुंचने पर सैकड़ों प्रकार की चिड़ियां, पक्षी, साइबेरियन बर्ड्स और सारस दिखाई दिए। यात्रा में शामिल चालीस लोग यह दृश्य देखकर आनंदित हो उठे। जहां खनन होता है, वहां पक्षी नहीं रुकते। यह क्षेत्र शांतिपूर्ण और खनन मुक्त है, इसलिए साइबेरिया और अन्य देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए यह आश्रय स्थल बन गया है। यह ताल तरुण भारत संघ ने वर्ष 2000 में बनाया था। इस ताल के कारण संपूर्ण महेश्वरा नदी शुद्ध और सदानीरा बनी है, जिससे क्षेत्र में विभिन्न फसलें उगाई जा रही हैं और जीवन समृद्ध हुआ है।
किन्तु अब समस्या यह है कि ऊपर के गांव, जिन्होंने तालाब निर्माण में योगदान नहीं दिया था, वे बैक वाटर को गहरा नाला बनाकर अपने क्षेत्र में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। खिजूरा गांव में दोनों गांवों की बैठक आयोजित हुई, जिसमें पानी पर अधिकार को लेकर लंबी चर्चा हुई। मरमदा गांव के लोग भी मानते हैं कि पानी खिजूरा का है, पर जंगल क्षेत्र में होने के कारण वे कुछ पानी लेना चाहते हैं। जबकि जिस भूमि पर वे खेती का विस्तार करना चाहते हैं, वह वन विभाग की है। इस विषय पर दिन भर गंभीर विचार-विमर्श चलता रहा।

इसके बाद महेश्वरा नदी के निचले हिस्सों की यात्रा की। केला देवी में भोजन के पश्चात सैरनी नदी का अवलोकन किया। भूडखेड़ा में अरावली की पहाड़ियों की भूजल संरचना को प्रत्यक्ष देखा गया। बांध के नीचे स्पष्ट जलधाराएं दिखाई गईं और समझाया गया कि जहां खनन नहीं होता, वहीं जल संरक्षित रहता है। इसके बाद यात्रा केशुपुरा और अरोदा पहुंची। अरोदा में सियाराम ने अपना बांध और चारों ओर लहलहाती फसलें दिखाईं। वहीं लाल पत्थरों से स्वतः फूटते तीन बड़े जलस्रोत भी दिखाए गए, जो खनन न होने के कारण सुरक्षित हैं। समझाया गया कि खनन होने पर वर्षा का जल खदानों में भर जाता है और वाष्पीकरण के कारण उपयोगी नहीं रहता। इससे भूजल, सतही जल और बादलों का जलचक्र प्रभावित होता है। सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि वर्षा जल को सहेजकर धरती माता के गर्भ में सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि पर्वतों से झरने फूटें और नदियां शुद्ध, सदानीरा, अविरल और निर्मल बहती रहें।
जो नदियाँ पुनः बहने लगी हैं, उनके जल का उपयोग वे लोग भी बड़ी मात्रा में करना चाहते हैं, जिन्होंने नदियों के पुनर्जीवन में सहयोग नहीं किया था। अब इस विषय पर बैठकें हो रही हैं। लोग चर्चा कर रहे हैं कि नदी पर सबका अधिकार है, जल पर भी सबका अधिकार है, इसलिए किसी को उसके उपयोग से रोकने का मन नहीं है। पर लोगों की यह भी इच्छा है कि जब चालीस वर्ष पहले इन नदियों को पुनर्जीवित करने के प्रयास शुरू हुए थे और जिन लोगों ने उस समय सहयोग नहीं किया था, वे अब नए कार्यों में सहभागी बनें जैसे नदी किनारे वृक्षारोपण करना, मिट्टी से भर चुके तालाबों की खुदाई कर उन्हें पुनः उपयोगी बनाना, और जल के उपयोग में संयम रखना। पानी का उपयोग त्याग और जिम्मेदारी के भाव से करना ही पुण्य और शुभ माना गया है।
केवल लाभ के लिए पानी को मोड़कर दूसरे रास्तों से अपने खेतों तक ले जाना, पाइप से लिफ्ट कर सिंचाई करना, यह केवल निजी लाभ का कार्य है। परंतु समाज, नदी और शासन सभी के लिए शुभ वही है कि हम प्रकृति से जितना लें, उतना ही अपनी मेहनत से उसे स्वस्थ रखने के लिए लौटाएँ।
इसी संकल्प के साथ यात्रा अरोदा गांव में संपन्न हुई। इस दल में उत्तर प्रदेश सरकार के स्टेट मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत 35 जनपदों के जिला परियोजना अधिकारी मौजूद रहे। कल यहां से यह यात्रा धौलपुर के लिए प्रस्थान करेगी।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरणविद् और जल संरक्षक।
