खेजड़ी का वृक्ष।फोटो सौजन्य वौइस् ऑफ़ नेचर।फेसबुक
मुद्दा: खेजड़ी की पुकार
– बृजेश विजयवर्गीय*
क्या हर पेड़ के लिए आंदोलन जरूरी है?
क्या आंदोलनों की बात ही सुनती हैं सरकारें?
कोटा: राजस्थान सरकार ने गत रात बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन के तहत चल रहे महापड़ाव में यह घोषणा की कि खेजड़ी पर कानून बनने तक कुल्हाड़ी नहीं चलेगी। यह फैसला निश्चय ही स्वागत योग्य है। किंतु इससे भी अधिक संतोष और प्रसन्नता तब होती, जब सरकार यह भी कहती कि राज्य में कानून बनाकर सभी प्रकार के पेड़ों की कटाई पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाएगा और जंगलों, पहाड़ों, तालाबों तथा नदियों को भी बिना किसी आंदोलन की मजबूरी के संरक्षित किया जाएगा।
खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि मरुस्थलीय राजस्थान की जीवनरेखा है। इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में उपयोग होती हैं, इसकी फलियां ‘सांगरी’ भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इसकी छाया व जड़ें भूमि को उपजाऊ बनाए रखती हैं। इसके बावजूद सड़क, खनन, सौर ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य तथाकथित विकास कार्यों के लिए इसे लगातार काटा जा रहा है, जिससे स्थानीय आजीविका और पर्यावरण दोनों पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
आज राजस्थान के हर कोने में कहीं शाहाबाद बचाओ आंदोलन की गूंज है, कहीं अरावली को बचाने के लिए यात्राएं निकल रही हैं, कहीं औरण संरक्षण की मांग उठ रही है, तो कहीं गाय बचाने की आवाजें बुलंद हैं। यह कोई अचानक उठा दर्द का स्वर नहीं है। लंबे समय से अंधे विकास के नाम पर अनियोजित विकास और प्रकृति के शोषण का जो सिलसिला चला आ रहा है, उसके खिलाफ जनता अब संगठित होकर बोल रही है। बीकानेर के लोगों को इसलिए नमन किया जाना चाहिए कि उन्होंने सामूहिक रूप से यह आवाज उठाई।
अब प्रश्न यह है कि क्या राजस्थान में हर जगह आंदोलन होगा तभी सरकार सुनेगी? दूसरा सवाल यह भी है कि क्या शांतिपूर्वक अपनी मांग रखने वालों की बात को अनसुना कर देना चाहिए? सरकार को यह समझना होगा कि शांतिप्रिय जनता को आंदोलन की आग में झोंकने की आवश्यकता ही क्यों पड़े। क्या सत्ता में बैठे लोगों को यह बोध नहीं है कि पेड़ और प्राकृतिक संपदा जीवन-मूल्यों के लिए अनिवार्य हैं, जिनकी रक्षा के लिए संवैधानिक व्यवस्था भी मौजूद है? हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में भी पेड़, प्रकृति, वन और वन्यजीवों के संरक्षण की बात कही गई है।
देश के माननीय प्रधानमंत्री ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान चला रहे हैं और साधु-संत भी पूरे देश में प्रकृति संरक्षण की चेतना जगा रहे हैं। खेजड़ी के लिए अमृता देवी का बलिदान विश्वविख्यात है। 1730 ई. में जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी ने अपने तीन सौ से अधिक साथियों सहित खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए शाही सैनिकों के सामने खड़े होकर प्राणों की आहुति दी थी, जिसे विश्व का पहला संगठित पर्यावरणीय बलिदान माना जाता है।
ऐसे में सरकार में बैठे समझदार लोगों को यह सोचना चाहिए कि खेजड़ी ही नहीं, बल्कि पीपल, बरगद, नीम, आंवला, कदम, तुलसी, आम, इमली, अर्जुन, चुरैल जैसे लगभग सभी वृक्ष भारतीय संस्कृति में पूज्य हैं। अमरूद, आम, पपीता, अनार, संतरा, बेर जैसे फलदार वृक्ष न केवल पर्यावरण सुधारते हैं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग हर पेड़-पौधे का औषधीय महत्व भी है।
आज जलवायु परिवर्तन की विभीषिका झेल रहे राजस्थान में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे समय में केवल नए पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जो प्राकृतिक जंगल और पहले से लगे हुए वृक्ष हैं, उन्हें बचाना कहीं अधिक जरूरी है। साथ ही, नए पेड़ लगाना हमारी आदत में शामिल होना चाहिए। तभी प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखा जा सकता है।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि सरकार में बैठे लोग इन तथ्यों से अनजान हैं। खेजड़ी को बचाने के लिए सोलर एनर्जी पैनल नहरों और नाड़ियों पर लगाए जा सकते हैं। इसी प्रकार शाहाबाद के जंगल को काटने की क्या आवश्यकता है, जब खनन मलबे के पहाड़ों पर हाइड्रो पावर प्लांट लगाए जा सकते हैं?
जब हमारे सामने पर्यावरण को बचाते हुए विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने के विकल्प मौजूद हैं, तो फिर निर्णय क्यों नहीं हो पा रहा? क्या अरावली को उजाड़कर ही जनता का भला होगा? कारपोरेट जगत को इतना अंध समर्थन भी नहीं दिया जाना चाहिए कि सरकार स्वयं उनकी बंधक बन जाए। विकास तभी सार्थक होगा जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, न कि उसे नष्ट करके।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
