– निखिल
अरावली विरासत जन अभियान: चार राज्यों के पर्यावरणविदों ने खनन रोकने और पर्यावरण संरक्षण पर उठाई आवाज़
जयपुर: जब अरावली सूखी और नग्न पड़ी थी, तब नदियाँ भी सूख गई थीं। इसी बेचैनी ने देशभर के लोगों को जयपुर के राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में “न्याय निर्माण मेला” के दौरान आयोजित “अरावली बचाओ सम्मेलन” में एक साथ ला खड़ा किया। सम्मेलन में बैठे हर व्यक्ति को यह बात याद थी — वह समय, जब अरवरी, रूपारेल, भागाणी, जहाजवाली और महेश्वरा जैसी नदियाँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थीं। आज भी इस भय की परछाईं मौजूद है, क्योंकि खनन रुकने से जब ये नदियाँ पुनर्जीवित होकर दोबारा बहने लगी हैं, तो खनन दोबारा शुरू होने की आशंका ने बेचैनी बढ़ा दी है।
जल संरक्षक और जलपुरुष के नाम से विख्यात डॉ राजेंद्र सिंह ने सम्मेलन को निर्णायक मोड़ दे दिया। उन्होंने कहा, “माननीय उच्चतम न्यायालय ने अरावली का खनन बंद कराया था; अब अचानक ऐसा क्या हुआ कि वही उच्चतम न्यायालय अरावली पर्वतमाला में खनन की अनुमति देने जैसा निर्णय दे रहा है? इस पर उच्चतम न्यायालय को पुनः विचार करना चाहिए, ताकि भारत की विरासत बचे और भारत समृद्ध बने।” उन्होंने सबको याद कराया कि यहाँ की प्रकृति और संस्कृति के योग से ही हम विश्वगुरु बने।
सभी ने सबसे पहले अरावली आंदोलन को राष्ट्रीय अभियान बनाने पर सहमति जताई। अभियान का नाम “अरावली विरासत जन अभियान” रखने का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ और यह भी तय किया गया कि इसी अभियान का संचालन चारों राज्यों के कई साथी मिलकर करेंगे। अरावली के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ अरावली तथा वहाँ के लोगों के स्वास्थ्य संबंधी संवाद किए जाएंगे। अरावली को खनन मुक्त रखने की योजना बनाकर काम करेंगे। कारण स्पष्ट है — अरावली की हरियाली ही चारों राज्यों की खाद्य सुरक्षा और जलवायु सुरक्षा में मदद करती है। यह बात सम्मेलन में सभी ने स्वीकार की और इसे सभी के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बताया। हर वक्त यह स्मरण दिलाते हुए कि हम सब का स्वास्थ्य अरावली के स्वास्थ्य से जुड़ा है।
अरावली के केंद्र जयपुर में स्थित पद्मश्री लक्ष्मण सिंह ने इन बातों का समर्थन करते हुए कहा कि अरावली हमारी जीवनरेखा है और इसे बचाना हमारे लिए जरूरी है। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि यदि हमारी सरकार और न्यायपालिका हमारी आवाज़ नहीं सुन रही हैं, तो अरावली के लिए पर्यावरण-यज्ञ करना होगा। उन्होंने खुलकर घोषणा की कि वह संपूर्ण समर्पित भाव से “अरावली विरासत जन अभियान” के साथ पुनः जुड़ गए हैं। उनके स्वर ने सम्मेलन की ऊर्जा और दृढ़ता दोनों को और मजबूत किया।
अहमदाबाद (गुजरात) से आई कुनिका नामक बहन ने बताया कि हमारे गुजरात में खनन के साथ-साथ पर्यटन बढ़ाने के नाम पर बहुत बड़ा विनाश हुआ है। वह बोलीं कि शामलाजी से लेकर हिम्मतनगर तक खनन के दुष्प्रभाव को समझाने के लिए विद्यालयों, कॉलेजों और महाविद्यालयों में अभियान चलाया जाएगा। स्मृति केडिया (उदयपुर) ने कहा कि अब उदयपुर क्षेत्र में अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों को 6 करोड़ में खरीदकर वहाँ होटल बनाकर और खनन बढ़ाकर बड़ा नुकसान किया जा रहा है। कविता श्रीवास्तव ने कहा कि अरावली के बच्चे बड़े जन-संगठन और पर्वतों को बचाने में मदद कर सकते हैं। यहाँ के किसान संघठन खनन विरोधी है। वे भी इस अभियान के साथ है।
छत्तीसगढ़ के गौतम उपाध्याय की चिंता सम्मेलन में गहरी गूँज की तरह महसूस हुई। उन्होंने कहा कि अरावली के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से हम सभी चिंतित हैं। हमारे उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र के सभी साथी चिंतित हैं कि जो निर्णय आया है वह खान माफिया के पक्ष में है और न्यायालय ने भी उन्हीं के पक्ष में निर्णय दिया है, जिससे हमारी पारिस्थितिकी और नदियाँ नष्ट हो जाएँगी तथा हमारी स्वास्थ्य-सुरक्षा दूभर हो जाएगी। एडवोकेट अमन ने भी यह बात दोहराई कि पर्वतों को बचाना बहुत जरूरी है; यदि इसे नहीं बचाया गया तो अरावली के आसपास का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। यही समय है कि हम संविधान की रोशनी में पुनः उच्चतम न्यायालय जाएँ।
नीलम अहुवालिया ने साफ-साफ कहा कि यह लड़ाई कानूनी है और हम सब मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ेंगे; अब यह केवल ई-मेल, व्हाट्सएप आदि डिजिटल माध्यमों तक सीमित नहीं रह सकती। अब हम पूरी अरावली में जन-अभियान चलाएंगे। गाँव से लेकर जिला, राज्य और देश स्तर पर अरावली के लिए चेतना-तंत्र खड़ा करेंगे। उच्चतम न्यायालय में भी जाएंगे और गाँवों में भी जागरूकता फैलाएंगे। अरावली को बचाना हम सबका कर्तव्य है।
जयपुर की उस शाम सम्मेलन खत्म हुआ, पर भावना नहीं — अरावली विरासत जन अभियान अब शुरू हो चुका है। उपस्थित लोगों के चेहरों पर थकान की जगह निर्णय की चमक थी, जैसे हर कोई दिल में एक ही वचन लेकर घर लौटा हो: अरावली को बचाना है, क्योंकि जब अरावली सुरक्षित है, तभी हमारी नदियाँ, हमारा स्वास्थ्य और हमारा भविष्य सुरक्षित है।
*लेखक जल बिरादरी सवयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता हैं।
