– डॉ. राजेन्द्र सिंह*
उच्चतम न्यायालय ने अरावली के लिए समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया
उच्चतम न्यायालय, उच्चतम है। सिद्धांत ही सदैव उच्चतम होता है। अतः न्यायालय पहले अरावली के सिद्धांत स्वीकार करें। फिर प्रशासनिक विकास और अन्य व्यवस्थाओं के सवालों पर काम करने के लिए समिति को कार्यभार दिया जाएगा, तो अरावली और हमारा जीवन सुरक्षित रहेगा। हम अपने उच्चतम न्यायालय के प्रति समर्पित भाव से सहयोग करें तो यह अच्छी बात होगी। अरावली के बेटे-बेटियां उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही में धैर्यपूर्वक सहयोग करें। नक्से और सीमाओं की परिभाषा को अरावली पर्वतमाला की जलवायु-पारिस्थितिकी-पर्यावरणीय समग्रता का सिद्धांत स्वीकार करके ही यह कार्य आगे बढ़े।
पर्वतमालाएं जलवायु को निर्मित करती हैं। पहाड़ एक बार नष्ट होने पर पुनः निर्मित नहीं होते। इनको बचाने हेतु अब दुनिया में कानून की आवश्यकता है। जलवायु, पारिस्थितिकी और पर्यावरण का समग्र दर्शन कराने वाली पंचमहाभूत निर्मित पर्वत श्रृंखला, भगवान रूपी भारत की प्राचीनतम् प्रकृति-संस्कृति का संपूर्ण योग, ‘अरावली’ कहलाती है। इसे ऊँचाई, दूरियाँ या सीमाओं में बाँटा नहीं जा सकता। इसे बाँटने और तोड़ने का कार्य खनन और इसके जीवन-विपरीत गतिविधियां करती हैं। सतत खनन से यह पर्वत श्रृंखला स्थायी रूप से समाप्त हो जाएगी। इसे बचाने की भावना के चलते सम्मानीय उच्चतम न्यायालय ने 29 दिसंबर 2025 को अस्थाई राहत प्रदान की। इस राहत ने अरावली की परिभाषा, ऊँचाई और सीमाओं पर प्रश्न उठाए।
न्यायालय ने कहा है कि अरावली पहाड़ियाँ और पर्वतमाला, जिन्हें प्रायः उत्तर-पश्चिम भारत के ‘हरित फेफड़े’ के रूप में वर्णित किया जाता है, सदियों से विविध पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण करती आ रही हैं और अनेक समुदायों की आजीविका का आधार रही हैं। यह क्षेत्र की अनिवार्य पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक रीढ़ के रूप में कार्य करती हैं तथा शुष्क उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल और शेष भूभाग के बीच प्रमुख भौगोलिक अवरोध का कार्य करती हैं।
अपनी प्राचीन भूवैज्ञानिक उत्पत्ति के कारण अरावली में देश के कुछ सबसे महत्वपूर्ण खनिज भंडार पाए जाते हैं। इसके ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्व के बावजूद बार-बार आरोप लगाया गया है कि अरावली पर मानवीय लालची दबाव निरंतर बढ़ रहे हैं। दशकों से अनियंत्रित शहरीकरण, योजनाबद्ध वनों की कटाई और तीव्र प्राकृतिक संसाधन शोषण ने इस स्वाभाविक रूप से नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक दबाव डाला है।
तरुण भारत संघ और भारत सरकार केस न. 509/97 के माध्यम से अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों और इसकी नाजुक पारिस्थितिकी के संरक्षण की आवश्यकता से जुड़े मुद्दों पर उच्चतम न्यायालय ने 1992 से सक्रिय रूप से विचार किया और 7 मई 1992 को सम्पूर्ण अरावली को बचाने हेतु कानूनी पहल कराई। ऐतिहासिक रूप से, केंद्रीय स्तर पर एकरूपता के अभाव में, प्रत्येक राज्य—दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात—ने अरावली पर्वतमाला की क्षेत्रीय सीमा निर्धारित करने के लिए अपने-अपने व्याख्यात्मक मानदंड और भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ अपनाईं। अरावली हमारी पारिस्थितिकी तंत्र बनाती है। जहां यह पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की समग्र भूमिका में नहीं है, ऐसे खानों की खोज करना ही आगे की अरावली यात्रा बनती है।
परिभाषात्मक असंगति का यह मुद्दा अनियंत्रित खनन गतिविधियों के संदर्भ में पुनः उच्चतम न्यायालय के समक्ष उठाया गया, जिससे प्रत्येक राज्य द्वारा अपनाए गए मानदंडों में अंतर और एक ‘समान परिभाषा’ की तत्काल आवश्यकता उजागर हुई। इस न्यायालय ने 09.05.2024 के आदेश द्वारा ‘अरावली पहाड़ियाँ और पर्वतमाला’ की अधिक सटीक परिभाषा की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए एक समिति के गठन का निर्देश दिया, जिसका उद्देश्य एक समान परिभाषा तैयार करना था।
समिति के गठन और दायित्व से संबंधित आदेश में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा तय करने हेतु अधिकारियों/प्रतिनिधियों की समिति गठित की गई। इसमें सभी सरकारी अधिकारी शामिल थे। भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव, दिल्ली NCT, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन विभाग के सचिव अध्यक्ष रहे। भारतीय वन सर्वेक्षण का प्रतिनिधि, केंद्रीय सशक्त समिति का प्रतिनिधि और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का प्रतिनिधि भी सदस्य थे। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त सचिव समिति के संयोजक रहे। यह पूर्णतः सरकारी समिति थी। इसने अरावली को समग्र पारिस्थितिकी के रूप में नहीं देखा बल्कि अरावली माई से कमाई ही देखी।
समिति ने 03.10.2025 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें ‘अरावली पहाड़ियाँ और पर्वतमाला’ की परिभाषा दी गई। ‘अरावली पहाड़ियाँ’ वह भू-आकृति होंगी, जिसकी स्थानीय ऊँचाई से 100 मीटर या अधिक ऊँचाई हो। स्थानीय ऊँचाई का निर्धारण उस न्यूनतम समोच्च रेखा के संदर्भ में किया जाएगा, जो उस भू-आकृति को चारों ओर से घेरती हो। उक्त न्यूनतम समोच्च से घिरे क्षेत्र के भीतर स्थित संपूर्ण भू-आकृति, जिसमें पहाड़ी, उसकी सहायक ढलानें और संबंधित भू-आकृतियाँ शामिल होंगी, उनके ढाल की परवाह किए बिना, अरावली पहाड़ियों का हिस्सा मानी जाएँगी। ‘अरावली पर्वतमाला’ दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियों से बनेगी, जो न्यूनतम समोच्च रेखा की बाहरी सीमा के सबसे बाहरी बिंदु से मापी गई दूरी के आधार पर 500 मीटर की निकटता में स्थित हों।
समिति ने सिफारिश की कि नव-निर्धारित ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं’ में कोई नई खनन लीज़ प्रदान न की जाए। समिति की रिपोर्ट की व्यापक समीक्षा के पश्चात न्यायालय ने 20.11.2025 को समिति के निष्कर्षों और परिभाषा को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। इसके परिणामस्वरूप आदेश में कहा गया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दी गई परिभाषा और समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया जाता है। मुख्य/अस्पर्शनीय क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध सहित, अरावली क्षेत्र में सतत खनन और अवैध खनन की रोकथाम हेतु उठाए जाने वाले कदमों को भी स्वीकार किया जाता है। मंत्रालय को निर्देश है कि संपूर्ण अरावली क्षेत्र के लिए मानक पर्वत संरक्षा मानचित्र तैयार करे। एमपीएसएम के अंतिम रूप तक कोई नई खनन लीज़ नहीं दी जाएगी; उसके पश्चात खनन केवल उन्हीं क्षेत्रों में अनुमन्य होगा जहाँ सतत खनन संभव हो। पहले से संचालित खानों में खनन गतिविधियाँ समिति की रिपोर्ट के पैरा 8 के अनुसार जारी रहेंगी।
उपर्युक्त निर्णय के विरुद्ध अनेक अंतरिम आवेदन और विविध याचिकाएँ दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में समिति के निष्कर्षों और न्यायालय द्वारा दी गई स्वीकृति को चुनौती दी गई है तथा कुछ निर्देशों की स्पष्टता मांगी गई है। यद्यपि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस वैज्ञानिक आधार या विशेषज्ञ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, फिर भी प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि समिति की रिपोर्ट और न्यायालय के निर्णय में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्टता का अभाव है।
इसके अतिरिक्त, पर्यावरणविदों के बीच व्यापक असंतोष व्यक्त किया गया है। उन्होंने नई परिभाषा और न्यायालय के निर्देशों की गलत व्याख्या एवं अनुचित क्रियान्वयन की आशंका जताई है। यह असंतोष कुछ शब्दों और निर्देशों में अस्पष्टता के कारण उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है, जिससे अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिक अखंडता को खतरा हो सकता है।
अतः यह उपयुक्त समझा गया कि समिति की रिपोर्ट को लागू करने या 20.11.2025 के निर्णय के पैरा 50 में निहित निर्देशों को क्रियान्वित करने से पूर्व, सभी हितधारकों को सम्मिलित करते हुए निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय प्राप्त की जाए। ताकि निम्नलिखित मुद्दों पर स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सके: क्या 500 मीटर तक सीमित परिभाषा संरक्षित क्षेत्र को अनुचित रूप से संकुचित करती है? क्या इससे ‘गैर-अरावली’ क्षेत्रों का दायरा बढ़ गया है? क्या 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली अरावली पहाड़ियाँ 500 मीटर से अधिक दूरी होने पर भी पारिस्थितिक रूप से सतत संरचना बनाती हैं? क्या राजस्थान में केवल 1,048 पहाड़ियों के 100 मीटर मानदंड पर खरे उतरने संबंधी आलोचना तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है? क्या कोई अन्य प्रणालीगत कमजोरियाँ हैं जिनमें न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता है? तदनुसार, एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव है, जो समिति की रिपोर्ट का समग्र और व्यापक मूल्यांकन करेगी।
भारत संघ तथा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात राज्यों को नोटिस जारी किया जाए, जो 21.01.2026 को प्रत्यावर्तनीय होगा। मामला निर्धारित तिथि को ग्रीन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। अंतरिम रूप से, पूर्ण न्याय के हित में, समिति की सिफारिशों और 20.11.2025 के निर्णय के निर्देशों को स्थगित रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, 09.05.2024 के आदेश के अनुसार, अगले आदेश तक एफएसआई रिपोर्ट (वन एवं पर्यावरण सर्वेक्षण रिपोर्ट) दिनांक 25.08.2010 में परिभाषित ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं’ में न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी प्रकार का खनन—चाहे नई लीज़ हो या पुरानी लीज़ का नवीनीकरण—अनुमन्य नहीं होगा।
सम्मानीय उच्चतम न्यायालय ने अरावली के पर्यावरणीय-पारिस्थितिकी को सम्मान देते हुए 20 नवंबर 2025 के आदेश को स्थगन आदेश दिया। यह न्यायालय की उच्चतम सिद्धांत और संविधान के प्रकाश में पर्यावरण को अरावली की परिभाषा तक सीमित न करने की पहल है। बल्कि पर्यावरण को संविधान का मौलिक कार्य मानकर सरकारों को जिम्मेदारी का अहसास और आभास कराने की प्रक्रिया भी है।
खनन कभी सतत नहीं होता। इस शब्द के भ्रम से सम्पूर्ण अरावली खनन जैसी पर्यावरणीय घातक गतिविधियों का शिकार बन सकती है। इसलिए अरावली की सीमाओं को जलवायु, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विरुद्ध कृत्य में फंसाकर भविष्य के संकट का सृजन कर देगी। ऐसे दुष्कृत्य से अरावली बचना चाहती है। हमारा उच्चतम न्यायालय इसे बचाएगा।
29 दिसंबर 2025 के निर्णय में भी स्पष्टता की आवश्यकता है, क्योंकि समिति के सामने के सवालों में प्रणालीगत कमजोरियों में न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता को उजागर करने की जरूरत है। यह न्यायालय को तय करना है। यदि तय करने का अवसर मिले तो अरावली के बेटे-बेटियाँ निश्चित रूप से अरावली को जीवनीय बनाए रखने हेतु उच्चतम न्यायालय की सहायता के लिए सदैव तैयार रहेंगे।
*जलपुरुष के नाम से विख्यात जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।
