जंगल की आग हो या शहरों में भड़कती लपटें, इनसे उठने वाला धुंआ अब सिर्फ़ एक धुंधला परिदृश्य नहीं, बल्कि एक खामोश हत्यारा बन चुका है, जो चुपके से लाखों जिंदगियों को लील रहा है। यह धुंआ, जो कभी दूर जंगलों या छोटे-मोटे हादसों तक सीमित था, अब वैश्विक स्तर पर मानव स्वास्थ्य के लिए एक भयावह खतरा बन गया है। ऑस्ट्रेलिया के नेतृत्व में हुए एक गहन अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस डरावनी सच्चाई को उजागर किया है: हर साल दुनिया भर में 15 लाख से अधिक लोग जंगल की आग से निकलने वाले जहरीले धुंए की भेंट चढ़ रहे हैं। इस धुंए में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे तत्व उन लोगों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं, जो लंबे समय तक इसके संपर्क में रहते हैं। यह धुंआ फेफड़ों में घुसकर सांस को बोझिल बना देता है, दिल को कमजोर करता है और कई बार जिंदगी को ही थाम लेता है।
मोनाश यूनिवर्सिटी और वाशिंग्टन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक्स ने मिलकर 2000 से 2019 तक 204 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं: हर साल 15 लाख 30 हजार लोग जंगल की आग से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण असमय काल के गाल में समा रहे हैं। इनमें से 4 लाख 50 हजार मौतें हृदय रोगों से और 2 लाख 20 हजार श्वसन संबंधी बीमारियों से जुड़ी हैं। इस धुंए के सूक्ष्म कण, जो हवा में तैरते हुए फेफड़ों तक पहुंचते हैं, 77.6% मौतों के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि सतही ओजोन 22.4% का कारण बनता है। सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं निम्न और मध्यम आय वाले देश—उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण और पूर्वी एशिया, चीन और इंडोनेशिया—जहां 90% से अधिक मौतें हो रही हैं। यह आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं, बल्कि उन परिवारों की त्रासदी हैं, जिन्होंने अपनों को इस खामोश खतरे के कारण खो दिया।
लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि यह खतरा सिर्फ जंगलों तक सीमित है, तो एक और सच्चाई आपको झकझोर देगी। नेशनल साइंस फाउंडेशन सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि शहरी इलाकों में लगने वाली आग का धुंआ जंगल की आग से कहीं अधिक घातक है। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां जंगल और शहरी बस्तियां एक-दूसरे से मिलते हैं—जिन्हें वन्य-शहरी इंटरफेस (डब्ल्यूयूआई) कहा जाता है। उन्नत कंप्यूटर मॉडलिंग और डेटा विश्लेषण के जरिए वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसी आग से निकलने वाला धुंआ सामान्य जंगल की आग की तुलना में तीन गुना अधिक जानलेवा है। इसका कारण यह है कि यह धुंआ सीधे घनी आबादी वाले क्षेत्रों को अपनी चपेट में लेता है, जहां लोग इसके जहरीले प्रभाव से बच नहीं पाते।
वैश्विक स्तर पर डब्ल्यूयूआई आग से होने वाला प्रदूषण कुल उत्सर्जन का मात्र 3.1% है, लेकिन यह समय से पहले होने वाली 8.8% मौतों का कारण बनता है। इस धुंए की खासियत यह है कि इसमें सिर्फ पेड़-पौधों के जलने से निकलने वाले कण ही नहीं, बल्कि इमारतों, घरों और अन्य मानव-निर्मित संरचनाओं के जलने से उत्पन्न होने वाले जहरीले रसायन भी शामिल होते हैं। ये रसायन हवा में मिलकर एक ऐसा विषैला कॉकटेल बनाते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जानलेवा बन जाता है। आज ये वन्य-शहरी इंटरफेस क्षेत्र दुनिया की कुल भूमि का करीब 5% हिस्सा बन चुके हैं। अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप में इनका विस्तार तेजी से हो रहा है, और इसके साथ ही आग की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।
चीन की हेफेई यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 20 देशों के 3,000 शहरों में बढ़ते तापमान का अध्ययन कर एक गंभीर चेतावनी दी है। अगर आग की घटनाएं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन इसी रफ्तार से बढ़ते रहे, तो सदी के अंत तक यह संकट और भयावह रूप ले लेगा। लाखों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं, और आग मौत का एक प्रमुख कारण बन जाएगी। भारत में भी यह समस्या किसी से छिपी नहीं है। देश का 21% भौगोलिक क्षेत्र वनों से ढका है, जिनमें से कई इलाके सूखे और आग के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि हर साल 30,000 से अधिक जंगल की आग की घटनाएं दर्ज की जाती हैं, जिनका बड़ा हिस्सा हिमालय, जम्मू-कश्मीर और दक्षिण भारत में होता है। हिमालयी क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। यहां ढलानों और कठिन भूगोल के कारण आग तेजी से फैलती है, और इसे बुझाना एक जटिल चुनौती है। देवदार और चीड़ जैसे पेड़ों की पत्तियां और रेजिन आग को और भड़काते हैं। कम बारिश ने इन इलाकों को और अधिक सूखा बना दिया है, जिससे आग का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग इस संकट को और गहरा रहे हैं। जंगल की आग न केवल पर्यावरण को नष्ट कर रही है, बल्कि गर्म होती जलवायु में योगदान भी दे रही है। यह एक दुष्चक्र है—आग जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है, और जलवायु परिवर्तन आग को और भड़काता है। इस चक्र को तोड़ने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। खासकर विकासशील देशों में, जहां स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। मैदानी इलाकों में आग से होने वाले वायु प्रदूषण के प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए जलवायु-अनुकूल नीतियों और प्रभावी उपायों को लागू करना होगा। यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है; यह उन अनगिनत जिंदगियों की कहानी है, जो हर साल इस धुंए की चपेट में आ रही हैं। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह धुंआ और अधिक जहरीला होता जाएगा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा भविष्य छोड़ जाएगा, जहां सांस लेना भी एक खतरे से कम नहीं होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद हैं।
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।

