– डॉ. राजेन्द्र सिंह*
पानी ने बदली हिंसा से समृद्धि तक की कहानी
पानी, परिश्रम और परिवर्तन की मिसाल बना आलमपुर
अरावली की गोद में जल-चेतना का नया अध्याय
आलमपुर का आलम सचमुच निराला है। यह गाँव ग्राम पंचायत जमूरा, तहसील मासलपुर, जिला करौली में तिमनगढ़ किले की तलहटी में बसा हुआ है। लगभग तीन सौ वर्ष पुराने इस गाँव में गुर्जर समुदाय के 45 परिवार निवास करते हैं। आलमपुर से सिंगनपुर तक पक्की सड़क है, जो मासलपुर–आगरा हाईवे से जुड़ती है। खेती और पशुपालन यहां की आजीविका के मुख्य साधन हैं। गाँव में एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय है, जहां बच्चे पढ़ने जाते हैं। इसी गाँव के पास से नहरो नदी की एक उपधारा ‘बैना’ निकलती है।
आज से बीस वर्ष पहले इस गाँव में पानी का बहुत बड़ा संकट था। पशुधन और युवा दोनों ही पलायन करने लगे थे। पशुओं को पानी पिलाने के लिए लोगों को गाँव से तीन किलोमीटर दूर सागर सरोवर जाना पड़ता था। गाँव में तीन कुएं थे, पर उनमें साल के केवल आठ महीने ही पानी रहता था और चार महीने वे पूरी तरह सूख जाते थे। पानी के अभाव में खेती भी सिमटकर मात्र बीस बीघा भूमि तक रह गई थी। खरीफ में केवल तिलहन की फसल होती थी और रबी में बिना पानी की सरसों तथा लगभग दस बीघा में गेहूं की खेती होती थी।
युवा गाँव छोड़कर बाहर जाकर मार्बल के मिस्त्री बनते थे। मार्बल की धूल से कई युवाओं को फेफड़ों की बीमारी हो जाती थी। कुछ लोग खनन कार्य में लग गए और कुछ तिमनगढ़ से मूर्तियों के व्यापार में जुड़ गए। इन गतिविधियों के कारण पुलिस ने उन पर कई धाराएं लगा दीं और कुछ को बागी घोषित कर दिया गया। गाँव में भय और हिंसा का माहौल बन गया था। उमराव सिंह, जगदीश सिंह जैसे नाम हिंसक गतिविधियों से जुड़े रहने लगे। लोग एक जगह बैठने से डरते थे। सामाजिक ताना-बाना टूटने लगा था और गाँव का भविष्य अंधकार में दिखने लगा था।
ऐसी स्थिति में तरुण भारत संघ के कार्यकर्ता गाँव पहुंचे। उन्होंने बार-बार गाँव जाकर लोगों को एक साथ बैठाया और पानी के महत्व को समझाया। जल से होने वाले परिवर्तन के बारे में विस्तार से बताया और ग्रामीणों को तैयार कर तरुण भारत संघ के मुख्यालय पर शैक्षणिक भ्रमण कराए। किसान सम्मेलनों में ले जाकर उन्हें नई दृष्टि दी गई। लगातार तीन वर्षों तक बैठकों के माध्यम से हिंसक रास्ते पर चलने वालों को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया गया और जल संरक्षण के कार्य के लिए गाँव को मानसिक रूप से तैयार किया गया।
इस परिवर्तन की धुरी बनी गाँव की संपत्ति देवी। उन्होंने जल के महत्व को समझकर अपने पति जगदीश गुर्जर और गाँव के उमराव सिंह को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए प्रेरित किया। संपत्ति देवी ने तरुण भारत संघ के सहयोग से गाँव में सबसे पहले ‘बारीन की पोखर’ का निर्माण कराया। वे स्वयं खड़ी होकर इस पोखर के निर्माण कार्य में जुटीं। उन्होंने तीसरा हिस्सा श्रमदान से इकट्ठा कराया और साधनवालों को दिया। पोखर के काम में लगे लोगों के लिए पानी और भोजन की व्यवस्था भी स्वयं की। उनका यह श्रम और त्याग पूरे गाँव के लिए उदाहरण बन गया।
इस पोखर के बनने के बाद गाँव के राम सिंह ने डी.एस. का एनीकट बनवाया? इसके बाद डहरा की पोखर और पांची वाली पोखर का निर्माण हुआ। इन संरचनाओं से पूरे गाँव में पानी फैल गया। चारों ओर हरियाली दिखाई देने लगी। बैना नाला बारहों महीने बहने लगा और उसने नहरो नदी को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया।
एक वर्ष ऐसा आया जब वर्षा बहुत कम हुई और गाँव में सौ बीघा में बोई गई गेहूं की फसल सूखने लगी। तब संपत्ति देवी ने पूरे गाँव को बुलाकर कहा कि उनकी पोखर से सभी लोग अपनी फसल में पानी लें। बिना किसी मूल्य के उनके पोखर से सौ बीघा खेतों में सिंचाई हुई। परिणामस्वरूप पूरे गाँव में 1400 क्विंटल गेहूं की पैदावार हुई। इसके बाद संपत्ति देवी का गाँव में विशेष सम्मान हो गया। आज कोई संकट आता है तो वे सबसे आगे बढ़कर समाधान करती हैं और महिलाओं को पानी की बूंद-बूंद बचाने के लिए प्रेरित करती हैं।
आज गाँव में लगभग तीन सौ बीघा भूमि पर खेती होती है। प्रत्येक पोखर में सिंघाड़े की खेती से एक लाख रुपये तक की आय होती है। सभी लोग खेती और पशुपालन कर रहे हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं और गाँव में वाहन आकर उन्हें विद्यालय ले जाता है। यह गाँव आज समृद्ध, शांतिप्रिय और सहयोगी समाज का उदाहरण बन गया है।
जल संरक्षण से जंगल भी समृद्ध हुए हैं। ईंधन, चारा और पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ी है। गाँव की गोचर भूमि पशुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। महिलाएं जंगलों की निगरानी करती हैं और मोटी लकड़ी ले जाने वालों को रोकती हैं। तरुण भारत संघ ने जगह-जगह पशुओं के लिए जल कुंड बनवाए हैं, जिनमें हमेशा पानी भरा रहता है। अब गाँव के युवाओं का मन लूट-पाट और हिंसा से हट गया है।
तरुण भारत संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह जो भी काम करता है, गाँव की आम सहमति से करता है। बांध और जोहड़ बनाने में गाँव वाले श्रमदान करते हैं। महिलाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं और स्वयं जंगलों तथा बांधों की निगरानी करती हैं। यदि कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है तो वे शोर मचाती हैं। बांधों की मरम्मत भी गाँव वालों ने स्वयं की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि लोगों के मन में इन बांधों के प्रति आस्था है।
तभासं के कार्यकर्ता चमन सिंह बताते हैं कि 2011 से पहले यह क्षेत्र सूखे से ग्रस्त था। पहली पदयात्रा के दौरान उन्होंने निर्णय लिया कि वे इस क्षेत्र में काम करेंगे। एक परिवार से शुरुआत की गई। एनीकट बनने के बाद सूखे कुएं भी जून के महीने में पानी से भरने लगे। धीरे-धीरे सभी परिवार इस कार्य में जुड़ते गए। अब गाँव में बारहों महीने पानी रहता है और पशुओं को हरा चारा सहज उपलब्ध है।
पानी की उपलब्धता से महिलाओं के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन आया है। उनके पास समय बचा है। उन्होंने परिवार के स्वास्थ्य पर ध्यान देना शुरू किया है। घरों में सफाई बढ़ी है, बच्चे नियमित नहाने लगे हैं और छोटी बीमारियों का समय पर इलाज होने लगा है। शौचालय बनने से महिलाओं को खेतों में जाने की मजबूरी से मुक्ति मिली है। गर्भावस्था और मासिक धर्म जैसे समय में अब उन्हें भय नहीं रहता।
महिलाएं मानती हैं कि पानी उनका ईष्ट देव है। वे वरुण देवता से वर्षा की प्रार्थना करती हैं। उनका विश्वास है कि सामाजिक दुराचार बढ़ने से सूखा पड़ता है और देवी-देवताओं को मनाने से वर्षा होती है। वे कहती हैं कि यदि परंपराएं टूटेंगी तो प्रकृति दंड देगी। वैज्ञानिक खोजों के दुष्प्रभाव को वे अपनी अंतर्दृष्टि से देखती हैं। उनका कहना है कि मशीनों और रासायनिक खाद ने शरीर को कमजोर बना दिया है। इसलिए वे कुएं से पानी भरने जैसी मेहनत को जीवन का हिस्सा मानती हैं।
महिलाएं घर में टोंटी नहीं चाहतीं। उनका कहना है कि टोंटी समय की गुलामी है, जबकि कुआं उन्हें स्वतंत्रता देता है। कुएं पर जाकर वे अपनी सखियों से मिलती हैं, सुख-दुख बांटती हैं और परामर्श करती हैं। यह उनके लिए घर से बाहर निकलने का अवसर और मनोरंजन का साधन भी है।
उन्होंने वस्तु-विनिमय की परंपरा आज भी बनाए रखी है। यदि घर में बाजरा नहीं है तो वे पड़ोसिन को गेहूं देकर बाजरा ले आती हैं और शान से बाजरे की खिचड़ी बनाती हैं। उन्हें इस बात का दुख नहीं कि उनके पास पैसा नहीं है, क्योंकि उनके पास सहयोग और सामूहिकता की संपदा है। पुरुष भी महिलाओं की कठिनाई समझते हैं और खेतों में ही शौच जाते हैं ताकि महिलाओं को अधिक पानी न ढोना पड़े।
आलमपुर की यह कहानी बताती है कि जल संरक्षण केवल तकनीकी कार्य नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया है। जब गाँव के लोग पानी को देवता मान लेते हैं, तब हिंसा का रास्ता अपने आप छूट जाता है और शांति, समृद्धि तथा आत्मनिर्भरता का मार्ग खुलता है। यह अरावली की संतान की कथा है, जो अरावली को समझने और संवारने में जुटी है।
*‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात पर्यावरण संरक्षक
