सामुदायिक संकल्प: झील का कायाकल्प
बेंगलुरु, जिसे कभी झीलों और बगीचों का शहर कहा जाता था, आज अपनी पहचान को धीरे-धीरे खो रहा है। झीलें सूख रही हैं, बगीचे कंक्रीट की चपेट में उजड़ रहे हैं, और शहर का हरा-भरा चेहरा मिटता जा रहा है। फिर भी, इस बदलते परिदृश्य में एक ऐसी कहानी उभरती है, जो उम्मीद की किरण बनकर चमकती है—अक्षयनगर झील की कहानी। यह झील, जो कभी गंदगी और उपेक्षा का शिकार थी, आज सामुदायिक एकता और सेवा भाव का जीवंत प्रतीक बन चुकी है। यह कहानी एक जलाशय के पुनर्जनन की नहीं, बल्कि उन लोगों की है, जिन्होंने अपने संकल्प, श्रम और सामूहिक प्रयासों से प्रकृति को फिर से सांस लेने का मौका दिया।
12 सितंबर 2025 को, मैं जल संरक्षण एवं महिलाओं के सशक्तिकरण में जुटी अपनी स्वयंसेवी संस्था सम्पूर्णा के अन्य सहयोगियों के साथ अक्षयनगर झील देखने आयी थी। हमारे सामने एक ऐसी झील थी, जो किसी चमत्कार से कम नहीं थी। स्वच्छ जल की सतह पर सूरज की किरणें नाच रही थीं, किनारों पर हरी-भरी घास और पेड़ लहलहा रहे थे, और चारों ओर शांति का आलम था। यह वही झील थी, जो कुछ साल पहले तक कचरे, खरपतवार और बदबू के ढेर में दम तोड़ रही थी। स्वागत करने वालों में स्थानीय निवासियों के चेहरों पर गर्व और उत्साह की चमक थी। इनमें एक सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी, श्री रमेश कुमार बीएन, थे, जो अक्षयनगर निवासियों एवं स्थलों मालिक कल्याण समिति के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके नेतृत्व ने इस बदलाव की नींव रखी। उनके साथ थीं श्रीमती सहाना हेगड़े, एक जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जिनके लिए यह झील सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक है। श्री वेंकटेश संघनाल भी थे, जिनके अथक प्रयासों ने झील को जीवंत बनाए रखा।
“कुछ साल पहले यह झील एक गंदा नाला बन चुकी थी,” एक स्थानीय कार्यकर्ता ने बताया। किनारों पर मलबे और निर्माण सामग्री के ढेर लगे रहते थे। नालों का गंदा पानी सीधे इसमें गिरता, और कमजोर बांध पानी को रोक नहीं पाते थे। झील सूखी रहती थी, और आसपास का भूजल स्तर 1200 फीट तक गिर गया था। पेड़ों की कमी ने पारिस्थितिक संतुलन को और बिगाड़ दिया। “पानी की समस्या इतनी गंभीर हो गई थी कि लोग हताश होने लगे थे,” एक अन्य निवासी ने साझा किया। लेकिन फिर, अक्षयनगर निवासियों एवं स्थलों मालिक कल्याण समिति के तत्कालीन अध्यक्ष ने एक असाधारण सपना देखा। उन्होंने युवाओं, बच्चों, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को एकजुट किया। “हमने सोचा, अगर हम साथ आएं, तो इस झील को बचा सकते हैं,” उन्होंने कहा।
सौ लोग एक साथ आए, और झील से कचरा, खरपतवार और मलबा हटाने का काम शुरू हुआ। यह कोई आसान काम नहीं था। पसीने, मेहनत और सामूहिक इच्छाशक्ति ने धीरे-धीरे झील की सतह को साफ किया। पानी की चमक लौटने लगी, और लोगों के दिलों में उम्मीद जागने लगी। “पहले दिन जब हमने कचरा हटाया, तो लगा जैसे झील हमें धन्यवाद दे रही हो,” एक युवा स्वयंसेवक ने हंसते हुए कहा। सफाई के साथ-साथ किनारों पर पौधारोपण शुरू हुआ। जहां पहले मुश्किल से कुछ पेड़ थे, वहां 120 से ज्यादा पेड़ लहलहाने लगे। नालों का गंदा पानी रोकने के लिए पाइपलाइनों को बंद किया गया। वर्षा जल को झील तक पहुंचाने के लिए रेन पिट्स और स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम बनाए गए। बांध को मजबूत किया गया, और किनारों को नया रूप दिया गया। फलदार वृक्ष और तरह-तरह के पौधों ने झील को जैव विविधता का खजाना बना दिया।
“हमने झील को केवल साफ नहीं किया, बल्कि इसे समुदाय का केंद्र बनाया,” एक निवासी ने गर्व से कहा। किनारों पर वॉकिंग ट्रैक, बेंच और बच्चों के लिए खेलने की जगहें बनाई गईं। यह झील अब केवल पानी का स्रोत नहीं थी; यह समुदाय का दिल बन चुकी थी। इस बदलाव के लिए आर्थिक सहयोग भी उसी समुदाय से आया। हर घर से चार हजार रुपये का योगदान लिया गया, जिससे सफाई उपकरण, पौधे और निर्माण सामग्री खरीदी गई। स्थानीय विधायक और सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर योजनाएं बनाई गईं, ताकि झील को सीवेज से हमेशा के लिए मुक्त किया जा सके।
लेकिन झील को साफ-सुथरा और जीवंत बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। इसके लिए “जलनिधि” नाम का एक समूह बना। “हम हर हफ्ते मिलकर सफाई करते हैं, पौधों की देखभाल करते हैं, और पानी की गुणवत्ता की जांच करते हैं,” एक समूह के सदस्य ने बताया। यह समूह स्वेच्छा से काम करता है, और झील को एक सामुदायिक जिम्मेदारी बनाता है। “यह हमारा घर है, और इसकी देखभाल हमारी ड्यूटी है,” उन्होंने जोड़ा।
सहाना हेगड़े की बातें सुनकर लगता है कि यह झील अब केवल पानी का गड्ढा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। “हर साल हम यहां गंगा आरती करते हैं। सैकड़ों लोग आते हैं, और यह आयोजन हमें एक-दूसरे के करीब लाता है,” उन्होंने भावुक होकर कहा। यह आयोजन झील को एक पवित्र स्थान बनाता है, जो लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करता है और उन्हें सामुदायिक एकता की ताकत दिखाता है। सुबह-शाम लोग यहां योग करने, टहलने और एक-दूसरे से मिलने आते हैं। बच्चे हंसते-खेलते हैं, और पक्षियों की चहचहाहट हवा में गूंजती है।
आज अक्षयनगर झील का पानी स्वच्छ है, और इसका भूजल स्तर इतना बढ़ गया है कि आसपास के बोरवेल में कम गहराई पर पानी मिलने लगा है। “पहले हमें पानी के लिए इतना गहरा खोदना पड़ता था, लेकिन अब झील ने हमें राहत दी है,” एक स्थानीय निवासी ने खुशी जाहिर की। यह झील अब केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। यह झील सिखाती है कि एक व्यक्ति का संकल्प और समुदाय का साथ मिल जाए, तो प्रकृति को फिर से जीवंत किया जा सकता है। यह केवल एक झील की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत संभावनाओं की कहानी है, जो तब जन्म लेती हैं, जब लोग बिना स्वार्थ के, सेवा भाव से एक साथ आते हैं।
चार दिन तक चले जल संवाद में, सम्पूर्णा संस्था ने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ सार्थक बातचीत की। “हम चाहते हैं कि हर शहर, हर गांव ऐसी कहानियां रचे,” एक आयोजक ने कहा। अक्षयनगर झील की यह यात्रा बेंगलुरु के लिए एक प्रेरणा है, और उन सभी शहरों के लिए, जहां प्रकृति इंसान के साथ के लिए तरस रही है। यह कहानी हमें सिखाती है कि जब लोग एकजुट होकर, बिना किसी स्वार्थ के, प्रकृति के लिए काम करते हैं, तो सूखी झीलें फिर से मुस्कुरा उठती हैं, और शहर का खोया हुआ हरा-भरा चेहरा लौट आता है।
*संस्थापिका, सम्पूर्णा








