इतिहास रचती पदयात्रा
जल सहेलियों की पदयात्रा को बल्लभगढ़ में बल
बल्लभगढ़ (हरियाणा): बुंदेलखंड के पचनद से दिल्ली के वासुदेव घाट तक लगभग 500 किलोमीटर लंबी पदयात्रा पर निकली जल सहेलियों की अविरल–निर्मल यात्रा सोमवार को बल्लभगढ़ पहुँची, जहां स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने उनका स्वागत किया। धरती माँ और यमुना मैया का जल कलश सिर पर रखकर चल रहीं जल सहेलियां अब औपचारिक आयोजनों से आगे बढ़कर संवाद और जनभागीदारी का सशक्त माध्यम बन चुकी हैं। उनकी पदयात्रा विभिन्न समुदायों को जोड़ते हुए जल संकट जैसे विषय को लोकचर्चा का हिस्सा बना रही है।

जल सहेलियां जब आदर्श नगर की ओर बढ़ीं, तो यह दृश्य केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि जल संकट के विरुद्ध सामूहिक चेतावनी की तरह उभरा। बुंदेलखंड के जल संकट से उपजी यह पहल अब हर पड़ाव पर स्थानीय समाज को जल संरक्षण के प्रश्न से जोड़ने का प्रयास कर रही है। बल्लभगढ़ में उनके स्वागत के दौरान जल संकट, यमुना संरक्षण और पर्यावरण संतुलन पर गंभीर विमर्श हुआ, जिसने इस अभियान को स्थानीय समर्थन के साथ व्यापक पहचान भी दी।

इस अवसर पर उपस्थित फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला ने जल सहेलियों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा, “जिस प्रकार झांसी की रानी और अहिल्याबाई होल्कर ने इतिहास में अमिट छाप छोड़ी, उसी प्रकार आज की जल सहेलियां आने वाले इतिहास की नायिकाएं बन रही हैं। आपने घर–परिवार का त्याग कर जिस वैश्विक समस्या—जल संकट—के लिए आवाज उठाई है, वह केवल एक क्षेत्र का नहीं, पूरी मानवता का प्रश्न है।” उन्होंने समाज की उदासीनता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “समाज उस बिल्ली की तरह हो गया है, जो यह सोचकर आंखें बंद कर लेती है कि कबूतर नहीं आएगा, लेकिन कबूतर आकर दाना चुन लेता है। जल संकट हमारे सामने खड़ा है, लेकिन हम उसे नजरअंदाज कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि प्राकृतिक संसाधनों को असीमित मान लेने की प्रवृत्ति खतरनाक है। यदि पेड़ों की कटाई, जलस्रोतों का अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण संतुलन की अनदेखी जारी रही, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।
हालांकि, इस सार्वजनिक समर्थन के केंद्र में वे महिलाएं ही रहीं, जिनकी प्रतिबद्धता और अनुभव इस अभियान की असली ताकत हैं और जिनके श्रम ने इस यात्रा को आकार दिया है, राजा बुंदेला के वक्तव्य ने उपस्थित लोगों के बीच जल संकट की तात्कालिकता पर चर्चा को और तीखा किया। बुंदेलखंड क्षेत्र से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश रैकवार ने कहा कि जल संकट की पीड़ा झेल चुकी बेटियां अब समाधान की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। उन्होंने जल संकट को विकास और पर्यावरणीय असंतुलन से जोड़ते हुए कहा कि समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी से ही टिकाऊ परिणाम मिल सकते हैं। उन्होंने यमुना की अविरलता और निर्मलता को सामूहिक दायित्व बताते हुए जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देने की आवश्यकता पर बल दिया।स्थानीय प्रतिनिधि कृष्णपाल सिंह और समाजसेवी संजय राणा ने भी अभियान को भविष्य की पीढ़ियों के हित से जुड़ा कदम बताया।उन्होंने जल संरक्षण को सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए इस पहल को जनसरोकार का सशक्त उदाहरण कहा। कृष्णपाल सिंह ने इसे जनक्रांति की दिशा में उठाया गया कदम बताया और कहा कि जल संरक्षण ही भविष्य संरक्षण है। समाजसेवी संजय राणा ने कहा कि यमुना केवल एक नदी नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और जीवन की आधारशिला है, और यदि आज जल संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए गए तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।
बुंदेलखंड की तपती जमीन से उठी जल संरक्षण की पुकार अब उत्तर भारत के विभिन्न पड़ावों को छूती हुई जनचेतना का स्वर बन रही है। जल संरक्षण और यमुना की अविरलता–निर्मलता के संदेश के साथ आगे बढ़ रही यह यात्रा अब क्षेत्रीय अभियान से आगे बढ़कर व्यापक जनसंवाद का रूप लेती दिखाई दे रही है। संवाद, संकल्प और सामाजिक भागीदारी से भरा यह पड़ाव अभियान की व्यापक होती स्वीकार्यता का संकेत देता है।
यह लंबी पदयात्रा जल संकट के उस कठोर भूगोल से निकली है, जहां पानी केवल संसाधन नहीं, संघर्ष का पर्याय है। बुंदेलखंड के अनेक गांवों में आज भी जल संग्रहण की पारंपरिक संरचनाएं सूख चुकी हैं और महिलाओं के श्रम पर ही जल आपूर्ति का अनौपचारिक तंत्र टिका है। उसी सामाजिक यथार्थ से निकली जल सहेलियां अब अपने अनुभव को जनसंवाद में बदलते हुए यमुना की अविरलता–निर्मलता और जल संरक्षण को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने का प्रयास कर रही हैं।
जल सहेली पुष्पा कुशवाहा ने कहा कि यह यात्रा प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि बल्कि “जीए हुए यथार्थ” से निकला आह्वान है। “हमने अपने गांवों में सूखे कुएं और खाली हैंडपंप देखे हैं। हम नहीं चाहते कि आने वाली पीढ़ियां भी वही पीड़ा झेलें,” उन्होंने कहा। बुंदेलखंड में जल संकट ने केवल जीवनशैली ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को भी प्रभावित किया है, और पुष्पा ने कहा इसी पृष्ठभूमि ने महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में आने को प्रेरित किया।
जल सहेली लक्ष्मी ने कहा कि जल का प्रश्न केवल उपलब्धता का नहीं, बल्कि न्याय और भविष्य का प्रश्न है। “यदि जल स्रोतों का संरक्षण नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियां हमारे निर्णयों का बोझ उठाएंगी,” उन्होंने कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली के वासुदेव घाट पर पहुंचकर सामूहिक संकल्प के साथ संबंधित प्राधिकरणों को ज्ञापन सौंपा जाएगा, ताकि यमुना संरक्षण के मुद्दे को नीतिगत स्तर पर भी रेखांकित किया जा सके।

सीखरी सामुदायिक भवन में आयोजित विचार–संवाद में जल सहेली समिति के संस्थापक संजय सिंह ने अभियान को मातृशक्ति के नेतृत्व में उभरती सामाजिक चेतना का उदाहरण बताया। उनके अनुसार, जब महिलाएं संरक्षण के प्रश्न को अपने अनुभव से जोड़ती हैं, तो वह आंदोलन केवल प्रतीक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक दायित्व में बदल जाता है।
बल्लभगढ़ में यह पड़ाव केवल स्वागत समारोह भर नहीं रहा, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संवाद में बदल गया, जहां जल संकट को भविष्य की चुनौती के रूप में देखा गया। यह यात्रा अब दिल्ली की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ चल रही बहस और चेतना उससे कहीं आगे तक फैलती दिख रही है। बुंदेलखंड से उठी यह आवाज हर पड़ाव पर यह रेखांकित कर रही है कि जल संरक्षण अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।
–ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
