भगवान पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू
– विवेकानंद सिंह*
सत्ता, संस्कृति और भारत-नेपाल संबंध
अभी कुछ ही दिनों पहले भारत के पड़ोसी देश नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में भ्रष्टाचार के विरुद्ध उभरे जेन-ज़ेड (1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) युवाओं के व्यापक आन्दोलन को दबाने के लिए की गई पुलिस फायरिंग में लगभग 20 युवा आंदोलनकारी शहीद हो गए, जबकि सैकड़ों अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। इस वीभत्स घटनाक्रम ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया।
इस आन्दोलन की तीव्रता इतनी प्रचंड थी कि नेपाल मानो ज्वालामुखी की आग में झुलस उठा। आंदोलनकारियों ने संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास सहित कई प्रमुख संस्थानों पर हमला किया। इनमें से कुछ भवनों को आग के हवाले कर दिया गया, जबकि कुछ को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
इस उग्र जनांदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली को, अपने मंत्रिमंडल के पाँच सदस्यों के साथ, पद छोड़ना पड़ा। हालात इतने असामान्य हो गए कि प्रधानमंत्री ओली को सेना के हेलीकॉप्टर से देश छोड़कर बाहर निकलना पड़ा। संकट की गंभीरता को देखते हुए भारत-नेपाल सीमा को सील कर दिया गया और काठमाण्डू स्थित त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया।
इस राजनीतिक अस्थिरता और व्यापक जनआक्रोश के बीच नेपाल में 5 मार्च को आम चुनाव होने हैं, जिन्हें सत्ता के वैध हस्तांतरण और संस्थागत स्थिरता की दृष्टि से निर्णायक माना जा रहा है। ऐसे समय में चुनावी प्रक्रिया का शांतिपूर्ण, सुचारु और विश्वसनीय ढंग से संपन्न होना नेपाल ही नहीं, पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। इसी संदर्भ में हाल ही में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने नेपाल को चुनाव की तैयारियों के लिए वाहन और अन्य आवश्यक सामग्री सौंपी है। नेपाल के गृह मंत्री ओम प्रकाश आर्याल ने यह सहायता भारतीय राजनयिक राकेश पांडेय से औपचारिक रूप से ग्रहण की। नेपाली दैनिक द काठमाण्डू पोस्ट के अनुसार, मंत्री आर्याल ने इस सहयोग के लिए भारत का आभार जताते हुए कहा कि यह दोनों देशों के बीच पारस्परिक विश्वास और मित्रता की गहराई को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 से भारत लगातार नेपाल को चुनावी सहायता देता आ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी सहायता और राजनीतिक सहयोग के ये प्रयास इस तथ्य की ओर भी संकेत करते हैं कि नेपाल में उत्पन्न मौजूदा संकट केवल सरकार या सत्ता के ढांचे तक सीमित नहीं है। इस आन्दोलन ने समाज के भीतर गहरे स्तर पर मौजूद असंतोष को उजागर किया है, जिसने नेपाल की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित किया है। भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को देखते हुए यह स्वाभाविक है कि नेपाल में घटित कोई भी बड़ा सामाजिक या राजनीतिक घटनाक्रम भारत पर भी अपना प्रभाव छोड़ता है।
हिमालय की गोद में बसा, भगवान पशुपतिनाथ की कृपा से संपन्न और कभी हिन्दू राष्ट्र रहा नेपाल, भारत के साथ आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण है। जनकपुर—जहाँ माता सीता और भगवान श्रीराम का विवाह हुआ—लुम्बिनी—जहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ—और भारत में उत्तर प्रदेश का गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मठ, इस साझा विरासत के स्थायी प्रतीक हैं।
इतना ही नहीं, भारत-नेपाल सीमा से लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न समुदायों तथा दोनों देशों के अनेक राजघरानों के बीच पीढ़ियों से वैवाहिक संबंध स्थापित होते रहे हैं। ऐसे में नेपाल में घटने वाली कोई भी बड़ी घटना भारत के असंख्य परिवारों की चिंता बन जाती है।
भारत और नेपाल के शाही तथा प्रतिष्ठित घरानों के बीच हुए वैवाहिक संबंध इस ऐतिहासिक निकटता को और सुदृढ़ करते हैं। नेपाल के शाह और राणा वंश के अनेक सदस्यों के विवाह भारतीय राजघरानों में हुए हैं।
नेपाल नरेश श्री 5 महाराजाधिराज त्रिभुवन वीर विक्रम शाह देव की पुत्री राजकुमारी भारती राज्य लक्ष्मी देवी का विवाह 1951 में तत्कालीन उड़ीसा (अब ओडिशा) के मयूरभंज राजघराने के महाराजा प्रदीपचंद्र भंज देव से हुआ था।
इसी क्रम में बलिया जनपद के ग्राम रतसड़ (अब रतसर) के पूर्व ज़मींदार राय साहब ठाकुर सच्चिदानंद सिंह के पौत्र सुरेश्वरानंद सिंह—जो पद्मश्री मेजर-जनरल शारदानंद सिंह के पुत्र थे—का विवाह 1956 में पाल्पा ज़िले के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, पूर्व फ़ील्ड मार्शल और पश्चिमी कमांडर-इन-चीफ़ रुद्र शमशेर जंगबहादुर राणा की पौत्री मीनाक्षी राणा से संपन्न हुआ।
ग्वालियर राज्य के पूर्व महाराजा जीवाजीराव सिंधिया और महारानी विजया राजे सिंधिया की पुत्री उषा राजे सिंधिया का विवाह 1967 में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और फ़ील्ड मार्शल श्री 3 महाराजा सर मोहन शमशेर जंगबहादुर राणा के पौत्र पशुपति शमशेर जंगबहादुर राणा से हुआ।
राजस्थान की जैसलमेर रियासत के पूर्व महाराजाधिराज महारावल बृजराज सिंह का विवाह 1993 में नेपाल के सहदेव शमशेर जंगबहादुर राणा की पुत्री रासेश्वरी देवी से हुआ।इसी प्रकार सीकर (राजस्थान) के राव राजा विक्रम सिंह और रानी बिपुला सिंह की पुत्री हिमानी सिंह का विवाह वर्ष 2000 में नेपाल के पूर्व युवराज पारस शाह से हुआ।
ये उदाहरण केवल शाही घरानों तक सीमित नहीं हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के असंख्य मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच भी पीढ़ियों से विवाह संबंध स्थापित होते रहे हैं।प्रसिद्ध इतिहासकार और साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी 1956 में प्रकाशित पुस्तक ‘अकबर’ में भारत-नेपाल संबंधों की इस सामाजिक-आर्थिक गहराई को रेखांकित किया है। वे लिखते हैं कि प्राचीन काल में बलिया के बांसडीह, बैरिया और सिकंदरपुर जैसे गाँवों के रौनियार सार्थवाह बैलगाड़ियों पर कपड़े लादकर काठमाण्डू ले जाया करते थे। इनमें खादी के धुले, कोरे और रंगे कपड़े शामिल होते थे। 1850 से कुछ वर्ष पहले जब उनका माल बिक नहीं पाता था और वापस लौटना घाटे का सौदा बन जाता था, तो अनेक व्यापारी वहीं बस गए। आज भी उनके वंशज काठमाण्डू में निवास करते हैं और विवाह संबंधों के लिए बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में आना-जाना करते रहते हैं।
यही ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक ताना-बाना भारत और नेपाल को केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि एक साझा सभ्यता का अभिन्न हिस्सा बनाता है।
*पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी क्षेत्र में 1764 से लेकर 1947 तक की तमाम घटनाओं के ऐतिहासिक संदर्भों पर शोध, लेख एवम् पुस्तक लेखन।
