– बृजेश विजयवर्गीय*
सुरक्षा से घुटन तक: पेड़ों की अनकही कहानी
कोटा में ट्री गार्ड हटे, पेड़ों ने ली नई सांस
कोटा: तलवंडी के सेक्टर-चार की वृंदावन वाटिका में आज रविवार सुबह एक असामान्य लेकिन अर्थपूर्ण दृश्य सामने आया। कुछ लोग पेड़ों के चारों ओर लगे लोहे के ट्री गार्ड सावधानी से खोल रहे थे—ऐसे गार्ड, जिन्हें कभी उनकी सुरक्षा के लिए लगाया गया था। पास ही सोमेश्वर महादेव मंदिर के आसपास भी यही प्रक्रिया चल रही थी। पेड़ों को किसी बाहरी खतरे से नहीं, बल्कि उसी सुरक्षा कवच से मुक्त किया जा रहा था, जो समय के साथ उनके लिए जकड़न बन चुका था।
चम्बल संसद और कोटा एनवायरनमेंटल सेनीटेशन सोसायटी के सदस्यों ने इस अभियान की शुरुआत करते हुए उन ट्री गार्ड्स और कंक्रीट के घेरे को हटाना शुरू किया, जो अब पेड़ों के स्वाभाविक विकास में बाधा बन रहे हैं। इस पहल की विशेषता यही रही कि जहां सामान्यतः ट्री गार्ड लगाना संरक्षण का प्रतीक माना जाता है, वहीं यहां कार्यकर्ता उन्हें हटाकर पेड़ों को “सांस लेने की जगह” दे रहे थे।
चम्बल संसद के अध्यक्ष के.बी. नंदवाना के अनुसार, यह केवल एक स्थानीय गतिविधि नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। उन्होंने बताया कि एक अनुमान के तहत कोटा में करीब 40 हजार पेड़ ऐसे हैं, जो या तो अनावश्यक ट्री गार्ड्स में जकड़े हुए हैं या उनके चारों ओर सीमेंट-कंक्रीट की परतें जमा दी गई हैं। ऐसी स्थिति में जड़ों को हवा और पानी नहीं मिल पाता, जिससे उनका विकास रुक जाता है और कई पेड़ धीरे-धीरे कमजोर होकर नष्ट होने लगते हैं। मौके पर जब कुछ गार्ड हटाए गए, तो कई पेड़ों के तनों पर दबाव के स्पष्ट निशान दिखाई दिए।
अभियान के दौरान मुंगेर (बिहार) से आए वृक्ष संवर्धन अभियान के संचालक नितीश कुमार ने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया। उन्होंने समझाया कि ट्री गार्ड कब तक उपयोगी रहते हैं और कब वे पेड़ के लिए बाधा बन जाते हैं, साथ ही उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाने की प्रक्रिया भी बताई। प्रशिक्षण के दौरान यह बात विशेष रूप से उभरकर सामने आई कि संरक्षण के उपायों की समय-समय पर समीक्षा जरूरी है, ताकि वे स्वयं समस्या न बन जाएं।

मौके पर नगर निगम के सेवा निवृत्त आयुक्त एम.एल. शर्मा, निवर्तमान पार्षद संजीव विजय, पंडित प्रदीप शास्त्री, अनिता गर्ग, बनवारी पंचौली, दत्तात्रेय कोचिंग संचालक प्रदीप सिंह, श्याम शर्मा, प्रेम प्रकाश मदान, एडवोकेट बी.सी. बावेल, सत्येंद्र सिंह, राजीव उपाध्याय और अनुराग गुप्ता सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। किसी ने गार्ड के बोल्ट खोले, किसी ने उसे हटाया, तो कोई पेड़ों के चारों ओर जमी कंक्रीट को तोड़ने में जुटा रहा—यह एक सामूहिक प्रयास था, जो शहर की हरियाली के प्रति साझा जिम्मेदारी को दर्शाता है।
अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि बढ़ती गर्मी और शहरीकरण के दबाव के बीच पेड़ों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि उन्हें इसी तरह जकड़कर रखा गया, तो वे अपनी पूरी क्षमता से विकसित नहीं हो पाएंगे, जिसका असर शहर के तापमान और पर्यावरण पर पड़ेगा। इस स्थिति को उन्होंने “बेमौत मरते पेड़” की संज्ञा दी और इसे तत्काल सुधारने की जरूरत पर जोर दिया।
के.बी. नंदवाना ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर शीघ्र ही कोटा विकास प्राधिकरण और नगर निगम आयुक्त को ज्ञापन सौंपा जाएगा, ताकि शहरभर में ऐसे पेड़ों की पहचान कर उन्हें अनावश्यक ट्री गार्ड और कंक्रीट से मुक्त कराया जा सके।
तलवंडी की इस पहल में एक-एक कर हटते ट्री गार्ड के साथ एक व्यापक संदेश भी उभरता रहा—संरक्षण केवल जोड़ने का नहीं, बल्कि समय आने पर हटाने का भी नाम है। खुली मिट्टी में सांस लेती जड़ों और हल्की हवा में हिलती पत्तियों के बीच यह बदलाव सिर्फ पेड़ों में ही नहीं, बल्कि उन्हें देखने के नजरिए में भी साफ महसूस किया गया।
*वरिष्ठ पत्रकार एवं चम्बल संसद के संयोजक।
