उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
गोरक्षा पर टकराव: शंकराचार्य बनाम योगी सरकार
शंकराचार्य का आरोप: गोमाता पर मौन, सत्ता पर मुखरता
वाराणसी: प्रयागराज के माघ मेले में गंगा में प्रथम स्नान की परंपरा को लेकर उत्तर प्रदेश प्रशासन के निर्णय से उपजे विवाद की पृष्ठभूमि में उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच टकराव और तीखा हो गया है। वाराणसी स्थित श्रीविद्यामठ, केदारघाट से जारी वक्तव्य में शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री को स्वयं को ‘असली हिन्दू’ सिद्ध करने के लिए दिए गए 40 दिनों के अल्टीमेटम के 20 दिन पूरे होने का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अवधि में उनके आचरण से हिन्दू होने के नहीं बल्कि ‘कालनेमि’ होने के संकेत मिले हैं। उन्होंने घोषणा की कि 21वें दिन से यह संघर्ष एक नए और निर्णायक चरण में प्रवेश कर गया है।
शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री की गोरक्षा के विषय पर कथित चुप्पी और अन्य मुद्दों पर मुखरता को रेखांकित करते हुए गोवंश की स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनका कहना था कि किसी विरक्त व्यक्ति या महंत का किसी धर्मनिरपेक्ष पद पर पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य करना सन्यास की मर्यादा के प्रतिकूल है और गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले किसी योगी या संन्यासी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मांस व्यापार जैसी गतिविधियों से जुड़ना अधार्मिक है। उन्होंने अखाड़ों, महामंडलेश्वरों और महंतों से आह्वान किया कि वे शास्त्रसम्मत तर्कों के साथ इन कृत्यों की व्याख्या करें और यदि इन्हें शास्त्रसम्मत सिद्ध नहीं किया जा सकता तो इन्हें ढोंग की श्रेणी में क्यों न रखा जाए, इस पर संत समाज अपनी स्थिति स्पष्ट करे।
गोरक्षा के प्रश्न पर उन्होंने सरकार द्वारा प्रतीकात्मक कदम उठाने की ओर भी संकेत किया। इसी संदर्भ में यह तथ्य सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गोवंश संरक्षण और गौहत्या के मुद्दों पर आधारित फिल्म ‘गोदान’ को राज्य में कर-मुक्त घोषित किया है। यह फिल्म 6 फरवरी 2026 को प्रदर्शित हुई थी। शंकराचार्य का कहना है कि ऐसे प्रतीकात्मक निर्णय उनकी मुख्य मांगों—गाय को ‘राज्य माता’ घोषित करने और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध—का विकल्प नहीं हो सकते। उनका तर्क था कि मनोरंजन को करमुक्त करने से कत्लखानों में कटती गोमाता की रक्षा नहीं होगी और सरकार का पहला दायित्व गोमाता को संवैधानिक सम्मान देना था।
शंकराचार्य ने भारत सरकार की 20वीं पशुगणना का हवाला देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में गोवंश की संख्या में 15.18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 3.93 प्रतिशत घटी है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश की गंगातीरी, केनकथा, खैरगढ़ और मेवाती जैसी शुद्ध देशी नस्लें विलुप्ति की कगार पर हैं। उनके अनुसार आंकड़े यह संकेत देते हैं कि जहां धर्म का प्रदर्शन अधिक है, वहीं धर्म का प्रतीक गोमाता घट रही है। इसी क्रम में उन्होंने आरोप लगाया कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की आड़ में उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा मांस निर्यातक राज्य बन गया है और भारत के कुल मांस निर्यात में राज्य की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से अधिक है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गोमाता के सम्मान से ऊपर राजस्व को प्राथमिकता दी जा रही है।
मुख्यमंत्री के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि गोरक्षा पर वे मौन हैं, लेकिन शंकराचार्य पद की शास्त्रसम्मत प्रामाणिकता पर सदन में मुखर होकर प्रश्न उठाते हैं, जिससे पद की गरिमा घटती है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्मपीठ की प्रामाणिकता किसी राजकीय प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं है और मुख्यमंत्री को दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाने के बजाय स्वयं के हिन्दू होने पर बोलने के लिए शब्द जुटाने चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में यह भी कहा गया कि बीते 20 दिनों में उत्तर प्रदेश के दोनों उपमुख्यमंत्रियों और कुछ भाजपा नेताओं ने बयान देकर पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास किया, लेकिन मुख्यमंत्री के रुख के कारण उनके प्रयास निष्फल रहे। अंततः शंकराचार्य ने 11 मार्च 2026 को ‘लखनऊ चलो’ का आह्वान करते हुए कहा कि अब यह आंदोलन गोमाता को उसका अधिकार दिलाकर ही रुकेगा और 1 मार्च को लखनऊ प्रस्थान का विस्तृत कार्यक्रम सार्वजनिक किया जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बयान केवल गोरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि माघ मेले में प्रथम स्नान की परंपरा से जुड़े प्रशासनिक निर्णय के बाद धार्मिक परंपराओं और राज्य सत्ता के संबंधों पर उठते प्रश्नों की एक कड़ी है। इसमें आंदोलन को चरणबद्ध और समयबद्ध रूप में आगे बढ़ाने की रणनीति भी स्पष्ट दिखाई देती है—पहले अल्टीमेटम, फिर प्रतीक्षा, और अब व्यापक जन-संघटन का आह्वान। ‘कालनेमि’ जैसी प्रतीकात्मक उपमा के माध्यम से मुख्यमंत्री की धार्मिक विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाया गया है, जिससे यह विवाद धार्मिक नेतृत्व और निर्वाचित सत्ता के बीच अधिकार और नैतिक वैधता की बहस में बदलता नजर आता है।
इस पूरे मामले पर राज्य सरकार या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। गोरक्षा, धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं से जुड़े प्रश्न इस घटनाक्रम के साथ राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं और उत्तर प्रदेश में धर्म तथा शासन के संबंधों को लेकर नई बहस को जन्म दे रहे हैं।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
