गौसंरक्षण के पक्ष में न्यायिक दृढ़ता: शंकराचार्य ने की न्यायाधीश रिज़वाना की सराहना
वाराणसी: गुजरात में गौहत्या के एक गंभीर मामले में 12 नवंबर 2025 को दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली न्यायाधीश रिज़वाना बुखारी ने उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती से भेंट कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। शंकराचार्य की ओर से जारी वक्तव्य में इस निर्णय को न्याय, धर्म और संविधान के संतुलन का उदाहरण बताया गया है, जिसे समाज के लिए मार्गदर्शक माना गया है।
गुजरात पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत दिया गया यह फैसला राज्य में गौवंश संरक्षण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में देखा जा रहा है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि गौहत्या का अपराध न तो आकस्मिक था और न ही अज्ञानतावश किया गया, बल्कि यह योजनाबद्ध और आर्थिक लाभ के उद्देश्य से अंजाम दिया गया कृत्य था, जिसका प्रभाव केवल कानून तक सीमित नहीं रहकर सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर तक जाता है।
मामला अमरेली जिले से संबंधित है, जहां पुलिस को मिली सूचना के आधार पर छापेमारी की गई थी। जांच के दौरान प्रतिबंधित मांस, वध से जुड़े उपकरण और अन्य साक्ष्य बरामद हुए। फॉरेंसिक रिपोर्ट, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष ने अदालत में यह सिद्ध किया कि आरोपी जानते हुए भी प्रतिबंधित अपराध में संलिप्त थे। विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और आर्थिक दंड की सजा सुनाई।
शंकराचार्य की ओर से जारी प्रेस वक्तव्य में कहा गया कि न्यायाधीश द्वारा दिया गया यह निर्णय केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह समाज को यह संदेश देता है कि कानून और धर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि जब न्याय निष्पक्षता से किया जाता है तो वह सांस्कृतिक मूल्यों की भी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि न्याय के पद पर आसीन व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह किसी भी दबाव से ऊपर उठकर सत्य और विधि के आधार पर निर्णय दे, और ऐसा करने वाला न्यायाधीश राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत बनता है।
उन्होंने कहा: “न्याय के सिंहासन पर विराजमान होकर जब कोई न्यायाधीश सत्य, धर्म और विधि के आधार पर निर्भीक निर्णय लेता है, तो वह केवल दंड नहीं देता, बल्कि राष्ट्र की नैतिक चेतना को सुदृढ़ करता है। गौसंरक्षण से जुड़ा यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि कानून और सांस्कृतिक मूल्य परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसे निर्णय अन्य न्यायिक अधिकारियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनते हैं।”
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि गौवंश भारतीय परंपरा में केवल पशु नहीं बल्कि जीवन, करुणा और संवेदनशीलता का प्रतीक है, और इसके संरक्षण से जुड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन समाज में विधि के प्रति विश्वास को मजबूत करता है। शंकराचार्य ने यह मत भी व्यक्त किया कि ऐसे निर्णय आने वाले समय में अन्य न्यायिक अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।
भेंट के दौरान न्यायाधीश रिज़वाना बुखारी ने शंकराचार्य के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपने न्यायिक दायित्व का निर्वहन संविधान, विधि और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर किया। शंकराचार्य जी महाराज ने उनके इस दृष्टिकोण की सराहना करते हुए इसे गौसंरक्षण, न्याय और नैतिक दायित्व के समन्वय का उदाहरण बताया तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
इस मुलाकात और न्यायिक निर्णय के बाद सनातन धर्मावलंबियों, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कई लोगों का मानना है कि यह फैसला न केवल गौसंरक्षण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका सामाजिक संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहते हुए सशक्त भूमिका निभा रही है।
उक्त जानकारी शंकराचार्य जी महाराज के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय द्वारा दी गई।
– ग्लोबल बिहारी ब्यूरो
