देशज ज्ञान स्थानीय परंपराओं और आवश्यकताओं से विकसित होकर प्रकृति और प्राणियों को शुभता, सहजता, सरलता, सार्थकता, संतोष, सुख, समृद्धि और सर्व कल्याण से जोड़ता है। देशज ज्ञान और विश्व विद्या के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है प्रकृति-केंद्रित विकास।
यह स्थानीय परंपराओं से उभरता है और वैश्विक मंच तक पहुंचता है। यह आधुनिक दुनिया की जटिलताओं में स्वावलंबन और सामुदायिकता का मार्ग दिखाता है, जैसा कि राजस्थान और हरियाणा में तरुण भारत संघ के कार्य दर्शाते हैं। इसे बढ़ावा देना विश्व विद्या का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए।
देशज ज्ञान प्रकृति और समुदाय को संबल देता है। देशज ज्ञान स्थानीय से वैश्विक स्तर तक उपयोगी है, जो स्थान, मौसम और परिस्थितियों के अनुरूप ढलता है। मेवात, अलवर, जयपुर, धौलपुर, करौली और जैसलमेर में तरुण भारत संघ के जल संरक्षण और सामुदायिक विकास के प्रयास इसकी उपयोगिता को रेखांकित करते हैं। ये कार्य देश के अन्य हिस्सों में प्रेरणा बन रहे हैं, जो छोटे स्तर पर भी आशा और समाधान की किरण जलाते हैं। ये प्रयास विलासिता और असमानता के बीच प्रकृति की ओर ध्यान खींचते हैं। ये समुदायों को स्वावलंबन की राह दिखाते हैं, जो “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की भावना को साकार करते हैं।
आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने नई खोजें और सुविधाएं दी हैं, परंतु भूख, प्रदूषण, बेरोजगारी, हिंसा, द्वैष और अलगाव भी बढ़ा है। विकास को मानव-केंद्रित नहीं, बल्कि प्रकृति-केंद्रित होना चाहिए, जिसमें जीव-जंतु, पेड़-पौधे, भूमि, आकाश, जल, वायु और अग्नि शामिल हों। तरुण भारत संघ के कार्य इस दृष्टिकोण को साकार करते हैं, जो “पूर्णम् अद्, पूर्णम् इदम्” और “त्याग और प्रेम के पथ पर” जैसे उद्धरणों से प्रेरित हैं। “हिम्मत से पतवार संभालो” की भावना समुदायों को सशक्त करती है।
विश्व विद्या के बिंदु—गति और मति, सत्य और असत्य, प्रेम और घृणा, शुभ और लाभ, आवश्यकता और विलासिता, पुरुष और प्रकृति, आत्मा और परमात्मा, पुरातन और आधुनिक, देशज और वैश्विक, हिंसा और अहिंसा, ग्रामीण और शहरी, शिक्षा और विद्या, सामान्य ज्ञान और विज्ञान, श्रमजीवी और बुद्धिजीवी, मानव और प्राणी, खंड और समग्र, क्षेत्रीय और वैश्विक, अणु और परमाणु, अपना और पराया, पास और दूर, बहुजन हिताय और सर्वजन हिताय—देशज और वैश्विक के बीच संतुलन की बात करते हैं। “अति वर्जते” अधिकता के खतरों को चेतावनी देता है। देशज प्रयोगों का अध्ययन, शोध और प्रचार-प्रसार आवश्यक है ताकि यह संदेश विश्व में फैले। “ईशावास्यं इदम् सर्वम्” और “न त्वहं कामये राज्यम्” प्रकृति और करुणा के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।
तरुण भारत संघ जैसे कार्य विकल्पहीन दुनिया में रास्ते दिखाते हैं। इनकी जानकारी लेखन, प्रकाशन और वैश्विक मंचों पर साझा करनी होगी ताकि लोग देख सकें कि पगडंडियां और मार्ग उपलब्ध हैं। यह दृष्टिकोण भारत के प्रकृति-केंद्रित विकास को विश्व विद्या के रूप में स्थापित कर सकता है, जो “सर्वजन हिताय” की भावना को साकार करता है।
*लेखक प्रख्यात गाँधी साधक हैं। प्रस्तुत लेख उनके निजी विचार हैं।

